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  • रजनीकांत

निम्मो मौसी


यह भी जीवन का यथार्थ है कि कुछ लोग ताउम्र दिल से निकलते नहीं . खासकर अच्छे लोग तो दिल के कूजे में हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं. मेरे पिताजी सुन्काली में अध्यापक के रूप में अमृतसर से स्थानातंरित होकर आये थे. मकान हमारा किराये का था. सस्ता समय था तब. उस समय समाज में अध्यापकों का सम्मान बहुत ज्यादा था. हमारे घर के समीप थोड़ी दूरी पर ही खड्ड बहती थी. पीने के लिए पानी कुएं अथवा बाबली से ले जाया जाता था. हर चीज़ साफ और प्रदूषण रहित थी. मेरे पिताश्री ने अपनी मेहनत के बल पर आसपास की पांच पंचायतों में भरपूर सम्मान अर्जित कर लिया था जिसके कि वे अधिकारी थे. धीरे-धीरे चीजें व्यवस्थित होती चली गईं. सबको अपना विस्तार मिलता चला गया. पिताश्री गाँव के सरपंच कश्मीर सिंह के यहाँ उनके दोनों बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने जाया करते थे. सरपंच महोदय पिताश्री को बहुत सम्मान दिया करते. कमांद से हमारे लिए गन्ने चूसने के लिया आ जाया करते थे. सरसों का साग, मक्की का आटा, शक्कर, गुड़ समय समय पर कश्मीर सिंह भेज दिया करते. मेरी बहिन रमा की अपनी सहेलियाँ बन गईं. और हमारी माँ ने दो पक्की सखियाँ बना लीं. निम्मो मौसी, गुड्डी की झाई माँ की दो प्रिय और श्रेष्ठतम सखियाँ बन गईं. अपनी बहिनों से बढ़कर गुड्डी मेरी बहिन के साथ पढ़ती थी. इन तीनों सखियों की दोस्ती बड़ी पक्की थी. मुहल्ले के लोग इनके नाम की शर्तें लगाया करते. तीनों इकट्ठी सुबह-सुबह पानी लेने कुएं पर जाती थीं. वहां से तीनों स्नान करके पीपल में पानी डालकर वापिस आ जातीं. अपने दिल के दुखड़े एक दूसरे से रो लेतीं. और महाराज, करवा चौथ के दिन जब सभी औरतें पूजा करने के लिए बैठतीं,यह तीनों सखियाँ आपस में अपनी अपनी थाली बटातीं. उस समय केवल रेडियो ही मनोरंजन का साधन था. किसी ने मूवी देखनी हो तो होश्यारपुर जाना पड़ता था. कभी-कभार प्रोजेक्ट के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के खुले प्रांगण में जनता जनार्दन को पारिवारिक अथवा सामाजिक मूवी दिखाई जाती थी. या सुन्काली में पंडित परसराम की दुकान के पीछे वाली खुली जगह पर बाहर से आई नौटंकी को देखने लोग एकत्र हो जाते . लोगों का मनोरंजन हो जाता. उस समय घर में रेडियो का होना बड़ी उपलब्धि माना जाता था. निम्मो मौसी के घर बड़ा सा रेडियो था. उसमें पावर के नाम पर लाल रंग का बल्ब जगा रहता था. हम बच्चे उस बल्ब को जिज्ञासा की दृष्टि से देखा करते थे. मौसा जी ने बताया था कि यह रेडियो वे होश्यारपुर से खरीद कर लाये थे. भारत और पाकिस्तान के अच्छे-अच्छे प्रोग्राम सुनने को मिलते थे. मैं आपको क्या बताऊँ रेडियो सुनने का मुझे ऐसा चस्का लगा मैं हर रोज़ निम्मो मौसी के घर जाने लगा. मौसा ओमपाल की सुन्काली में स्वर्णकार की दुकान थी. इसके साथ उन्हें आयुर्वेद की औषधियों का अच्छा ज्ञान था. उनके पिता एक प्रसिद्ध वैद्य थे. मुझे स्मरण है कि ओम मौसा जी नाड़ी देखकर दवाई दिया करते थे. दुकान के दोनों ओर बने शो केस में छोटी छोटी शीशियों में मीठी गोल-गोल गोलियां रखी हुई थीं. देखने में यह गोलियां एक जैसी लगतीं. पर एक बार उत्सुकता वश मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि इनमे फ्रीक्वेंसी का अंतर होता है. रोग के कम अथवा अधिक होने पर उसे कम या अधिक मात्रा में दिया जाता है. आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में निदान धीरे धीरे होता है. हम तो भाई रोग को जड़ों से खत्म करने का प्रयास करते हैं. लेकिन अंग्रेजी औषधियाँ रोगी को तत्काल तो ठीक कर देती हैं लेकिन बाद में रोग दुबारा पनपना शुरू कर देता है. निम्मो मौसी की इकलौती लड़की थी. पारो. मरियल सी लड़की, बादामी रंगी, देखने में सुंदर और अपनी आयु से कम की प्रतीत होती. पारो ने मुझे अपना धर्म भाई बना लिया. हर राखी वाले दिन या वह मेरे घर आ जाती अथवा मैं उससे राखी बंधवाने उसके घर चला जाता. निम्मो मौसी हर काम में दक्ष थी. एक चक्कर घिन्नी की भांति दौड़ती फिरती. उसका माथा खिला रहता. उनके घर के पिछवाड़े गोहरण में कुंडे सींगों वाली काले स्याह रंग की भैंस बंधी रहती . जोकि रंभाकर दूध की धाराएँ लेने को कहती. झट निम्मो मौसी बड़ी सी बाल्टी लिए भैंस के थन पकड़ लेती. मुहल्ले में हर प्राणी के घर एक न एक पशु अवश्य बंधा हुआ था. गाय अथवा भैंस हर घर में उपलब्ध थी. चाय तो बड़ी बाद में चली उस समय लस्सी का रिवाज था. मेहमान आने पर उनका स्वागत नमकीन अथवा मीठी लस्सी से किया जाता. गर्मियों की छुट्टियों में आम पकने पर दृश्य बदला होता. बड़े से पात्र में आम डाल दिए जाते. गोल चक्कर में सब बैठ जाते. ज्यादा आम चूसने की प्रतियोगिता शुरू हो जाती. आम चूसने की प्रक्रिया के समाप्त होते ही दूध से बनी मीठी लस्सी उपलब्ध करवाई जाती. यह प्रतियोगिता निम्मो मौसी के घर पर भी आयोजित हो जाती. हम बच्चे जोरों शोरों से इसमें हिस्सा लेते.

निम्मो मौसी दिल की साफ औरत थी. बिन लाग लपेट बात करने वाली. उनकी ली हुई सलाह बिलकुल सटीक होती. आप कह सकते हैं कि निम्मो मौसी एकदम व्यवहार कुशल प्राणी थी. बातों बातों में किसी पराये को भी अपना बना ले. जुबान में शहद घुली मिठास. मेरे प्रति मौसी के अगाध प्रेम ने मुझे उनका मुरीद बना दिया था. मेरी आहट को दूर से पहचान लेती निम्मो मौसी. रविवार को मैं पूरा दिन मौसी के घर रहता. क्योंकि इस दिन रेडियो में कई प्रकार के कार्यक्रम आया करते थे. मौसी मुझे दुपहर का खाना खिला देती, बीच में मौसी दूध पीने को दे दिया करती. मेरी ना नुकर के बाद मुझे दूध का पीतल का बड़ा गिलास जिसके ऊपर खूब मलाई होती पिलाकर छोडती. वह ममत्व और अपनत्व मुझे अभी तक याद है. शायद इसकी वजह पारो के अपना सगा भाई न होना, रहा हो. यह सोचना मेरे लिए बचकाना बात हो सकती है. खैर रविवार को मैं पूरा दिन मौसी के यहाँ जमा रहता. माँ को मैं बोलकर जाता कि मैं निम्मो मौसी के घर जा रहा हूँ, तो माँ को तसल्ली रहती. शादी ब्याह के दिनों में मौसा की दुकान में ग्राहकों की खूब भीड़ रहती. ग्राहक नये नये डिजाईन के आभूषण बनाने के ऑर्डर दे जाते. उनका सधे हुये हाथ के सब कायल थे. बीच-बीच में रोगी उपस्थित हो जाता तो वे उसको भी अटेंड करते. मौसा खुद हंसमुख प्राणी थे. क्रोध तो उन्हें छू तक नहीं गया था. दूसरा क्रोध करता तो वे अपने हास्य व्यंग्य से उसे हवा में उड़ा देते. उनकी चौखट से निराश होकर जाता मैंने कोई प्राणी नहीं देखा. कई लोग निर्धन होने के कारण नकदी नहीं दे पाते थे वे उसके बदले अनाज गेहूं अथवा मक्की दे जाते. ओम मौसा की जुबान में मिठास घुली हुई थी. निम्मो मौसी को कई लोक कथायें, लोकोक्तियाँ, मुहावरे और जन श्रुतियां,मुंह जुबानी याद थीं. गिद्दे की तो वह सरताज थी. शादी ब्याह में खूब नृत्य करती. उसे कई लोकगीत याद थे. निम्मो मौसी का पंचम सुर उन्हें अन्य औरतों से अलग कर देता. मुहल्ले की औरतें उसे छेड़तीं–मूई निम्मो भाखे लगा, शुरू कर. निम्मो मौसी शुरुआत कर देती और शेष औरतें पीछे पीछे गाने लग जातीं. बारात के जाने के बाद जो नचांगड़ा पड़ता, उसकी सूत्रधार निम्मो मौसी होती. अंकल के कोट टाई पहनकर जब मौसी पूरी ऊर्जा के साथ अपनी रौ में आ जाती, गिद्दा नृत्य की तो वह माहिर थीं. विवाहों में उन्हें विशेष रूप से निमन्त्रण देकर बुलाया जाता. हर ताली मौसी के लिए बजती. वह हर काम में माहिर थी. जिस काम को हाथ में लेती दिल से करती. उसका दिल गरीब गुरबे के लिए पसीज जाता. मौसी एक दिन एक छोटे अनाथ बच्चे को अपने घर ले आई. बिन माँ के बच्चे को खुद पाला, पढ़ाया और सुना है कि कालान्तर में उसकी शादी भी कर दी. वह हर महीने सक्रांति वाले दिन स्कूल चली जाती,निर्धन परिवार के बच्चों को स्कूल वर्दी दे आती. कोई बच्चा स्कूल फ़ीस देने की स्थिति में न होता तो वह अवश्य उसकी सहायता कर देती. निम्मो मौसी के घर के बरामदे में एक जलपात्र रखा रहता जोकि सुबह ही जल से भर दिया जाता. दिन-भर कबूतर, गौरैया, चिड़ियाँ आ आकर पानी पी जातीं. उनके दिल में मेरी तेरा का विचार बिलकुल नहीं था. वह मुझे अपनी बेटी से बढ़कर चाहती. कभी तो निम्मो मौसी मेरी नां नुकर के उपरांत मुझे दुपहर का खाना खिलाकर ही भेजती. जो सब सदस्यों को परोसा जाता वह मुझे भी दिया जाता. सच कहूँ अपने माता पिता को खोने के बाद उधर सचमुच जाना नहीं हुआ. फिर अचानक मुझे उस गाँव में जरूरी काम से जाना पड़ा. आज मैं पुराने लोगों से मिलने कस्बे के उस मुहल्ले में लगभग कोई पैंतीस वर्ष की कालावधि के बाद जा रहा था. नौकरी में व्यस्तता के चलते मुझे वहां जाने का अवसर नहीं मिला. सेवानिवृति के उपरांत चलो मुझे अवसर मिला तो मैं बचपन की यादों को ताज़ा करने का मोह संवरण नहीं कर पाया. बचपन के दिनों को प्राणी हर समय याद रखता है. कहा भी गया है कि आदमी में हर समय एक बच्चा जीवित रहता है. बचपन उसे बार बार बुलाता है. मन में एक प्रकार से उत्साह था . जोश था. मेरे कदम तेज़ी से उसी पगडंडी पर बढ़ते चले जा रहे थे. आज मैं प्रिय लोगों से मिलूँगा, कैसे उनसे सामना करुँगा? कैसे हैं यह लोग? निम्मो मौसी ही मेरे मन मस्तिष्क पर छाई हुई थी. कैसे होंगी मौसी? मौसा कैसे होंगे? उत्साह में मौसी का आंगन पार कर जाता हूँ. देखता हूँ जल पात्र खाली औंधे मुंह पड़ा था. मैंने जल पात्र को खाली कभी नहीं देखा था. मन आशंका से भरा पड़ा था. सब ठीक ठाक हो. कामना करते हुए बरामदा पार करके ड्राइंग रूम में प्रवेश कर जाता हूँ. -निम्मो मौसी. आप घर पर हैं क्या? मुझे कोई उत्तर नहीं मिला. पारो अंदर से निकल कर आई. आते ही गले लग गई. -आओ भैया. कहो कैसे हो? आपको इतने दिनों बाद हमारी याद आई. -सब ठीक है. नहीं बहिन ऐसी बात नहीं है. सबकी अपनी सीमाएं होती हैं . गृहस्थी की चक्की बड़ी निराली है. -निम्मो मौसी कहाँ हैं? मेरा तो जैसे साँस सूख रहा था. मैं उनके दर्शन करने को लालायित था. -क्या बताऊँ भाई माँ को बहुत कम दिखाई देता है. शहर में जाकर दो आपरेशन भी करवाए. लेकिन कुछ फर्क नहीं पड़ा. अब तो हाथों से टोह कर चलती हैं. -मुन्नी कौन है? कोई पखला माह्णु आया लगता है? आवाज़ तो मौसी की ही थी मैं उनका स्वर अच्छी तरह पहचान रहा हूँ. -माँ भाई रतन आये हैं. -ओ मेरा बच्चा रतन आया है. आ मेरे बच्चे. धनभाग मेरे. सुबह छत पर कव्वा बोल रहा था. मैं बिट्टो से बात कर रही थी कि आज कोई परोहणा अवश्य आयेगा. देख मेरा बच्चा आ गया. मौसी बिस्तर से उठ गई थीं. -मौसी रहने दीजिये. मौसी लेटे रहिये. मैं उन्हें उठने से मना करने में लगा था. मौसी चारपाई से उतरकर धीरे धीरे कुर्सी पर आकर बैठ गई थीं. मैंने चरण बंदन किया. - और मौसी सेहत कैसी है आपकी? -बेटा अब सेहत क्या होगी. बूढी हो गई हूँ. नजर बिलकुल चली गई है. दो आपरेशन आँखों के हो चुके हैं. टांगों में जोर नहीं रहा अब. जवानी थी तो छोटी मोटी बिमारी कभी मानी नहीं. अब बुढ़ापे ने आकर कई नामुराद बिमारियों को घेर लिया है. मौसी का हाथ मेरे हाथ में था. उनका पूरा शरीर बिलकुल सफेद पड़ चुका था. शरीर पर मांस नाम मात्र था.

रतन. तुझे शायद याद भी नहीं रहा होगा. तुम आज मौसी के पास सैंतीस वर्ष छ: महीने छ: दिन बाद आये हो. इतने वर्ष मेरी याद नहीं आई क्या?

मैं सुनकर हतप्रभ रह गया था. मौसी की गिनती को क्या कहूँ? मुझे भी स्मरण नहीं था कि मैं कितने वर्षों बाद मौसी से मिल रहा हूँ. ममत्व और आत्मीयता का संगम मेरे सामने बैठा था. -मौसी आपको मैं कैसे भूल सकता हूँ? आपकी कहानियां मैं अपने बच्चों को बताता हूँ. आपकी जिंदादिली की मिसालें मैं अपनी सहयोगियों को देता रहा हूँ. आप तो मेरी रोल माडल रही हैं मौसी जी. सदैव मेरे मन - मस्तिष्क छाने वाली नायिका. मैं शायद भावुक हो उठा था. -रतन. बड़े बातें करने लगा है तू तो. मुझे पता है तुम लेखक लोग, चीजों को बड़ी सूक्ष्मता से देखते हो. बाल की खाल निकालने लगते हो. राई को पहाड़ बनाना कोई तुम से सीखे.

मौसी मेरे कागज़ काले करने की कला से परिचित है. वही चिर परिचित हंसी. वही अंदाज़. मेरे सामने बालपन के वे सुहाने दिन आँखों के समक्ष उपस्थित हो गए थे. समय कितना क्रूर है. समय का पहिया घूमता ही जाता है. निरंतर आगे बढ़ता जाता है. समय रुकता कहाँ है. किसी की सुनता कहाँ है? -मौसी जी मौसा जी दिखाई नहीं दे रहे? कहीं गए हैं क्या? -क्या बताऊँ वे हम सबको छोड़कर सदा के लिए चले गये. दो साल पहले चंगे भले थे. एक दिन हमें रुलाते हुए हंसते खेलते चले गए. मैं उनके बिना कैसे रह रही हूँ मैं ही जानती हूँ. मेरे देवता सर के ताज कहाँ चले गये आप?

निम्मो मौसी रोने लग गई थीं. -मौसी हौंसला रखिये. आप ही टूट जाएँगी तो इस बच्ची को कौन सहारा देगा? कुदरत का भाणा सबको मानना पड़ता है मौसी जी. यह भी क्रूर सत्य है. -मेरे पीछे यह बेचारी भी कंवारी रही. मैं अकेली कहाँ जाती? किस दर पर जाकर धक्के खाती? इस बच्ची को माँ के लिए क़ुरबानी देनी पड़ी. मुझ अंधी का एक मात्र सहारा यही है, मेरे बच्चे. मैं हतप्रभ था. कभी निम्मो मौसी को तो कभी उनकी बेटी को देख रहा था.


 

लेखक परिचय


नाम रजनीकांत

पिता का नाम -स्व० प्रकाशचंद शर्मा

योग्यता -एम०ए०-पीएच०- डी०

प्रकाशन -पांच कहानी संग्रह -तितली ,तिनका तिनका आशियाँ ,बीते लम्हों का दर्द ,मकड़जाल,स्मृतियों के आईने से |व्यंग्य संग्रह -कहाँ जाएँ पति बेचारे |

उपलब्धियां -कई सरकारी गैर सरकारी संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरस्कृत |

आकाशवाणी शिमला और दूरदर्शन शिमला और जालंधर से हिंदी ,हिमाचली ,कविताएँ ,कहानियां और लघु कथाएं प्रसारित |

संपर्क सूत्र -गाँव -भंजाल ,तहसील -घनारी ,जिला -ऊना हिप्र०177213

चलित-94183 44159

lawjababsharma@gmail.com

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