• अशोक गौतम

शगुन का लिफाफा



बहुधा वह मुझे ऑफिस से आते हुए बाजार के रास्ते या बाजार में कभी कभार मिल जाया करता। मिलता तो पता नहीं क्यों दाईं बाजू से पीठ की ओर कपड़ों की गठरी उठाए अभिवादन में सिर झुका देता। मैं भी तब आधा पौना सिर झुका देता इस परिचय में। तब बस, यहीं तक परिचय था हमारा।


फिर किसी न किसी संडे को जब वह हमारे मुहल्ले में आता तो उसकी आवाज सुन मैं उसको ड्राइंग रूम की खिड़की से रत्ती भर देखता या कि उसकी आवाज मुझे अपनी ओर मुझे खींच सी लेती। पर मैं कोई खास रिस्पांस न देता। कौन खुदगर्ज किसीके लिए तब झीनी झीनी धूप और अखबार का मिक्स मजा किरकिरा करता। उससे यों ही जो बात करने को मन भी करता कि तभी सामने अखबार खुल जाता पूरा का पूरा। और मेरी पूरी आंखों को अखबार ढक देता।

पर धीरे धीरे हम अब बाजार के रास्ते और संडे को उसकी आवाज के माध्यम से दोनों यहां तक आ गए थे कि मेरे सड़क में खुलने वाले गेट के बाहर से जब उसे गेट से भीतर बिलकुल खिड़की के सामने मैं बैठा दिखता तो वह गेट के पास आकर मुझसे आग्रह करता,‘ बाबू जी! कश्मीर की प्योर पशमीना शाल ले लो। बहन को कश्मीरी सूट ले लो! बिल्कुल वाजिब दाम में लगा दूंगा,’ तब उससे कुछ लेने के बदले मैं भीतर बुला उसे चाय पिला देता , दो चार धर उधर की बातें कर लेता और वह चाय पीकर बारबार सूट लेने को नहीं तो कम से देखने को कहता रहता, पर मेरी उसकी गठरी में कोई रूचि न होती। घर में आराम से बैठे बैठे भी जो अपने को ठगवा ले उससे बड़ा बेवकूफ शायद ही कोई होता होगा। वैसे कोई आदमी अपने को अपने ठगाने को लेकर जितना सजग रहता है , वह हर कहीं उतना ही ठगा भी जाता है। वैसे हम जैसे सजग लोगों को अपने को बाहर ठगवाने को पूरा चमचमाता बाजार जो खड़ा है बाहें खोले। जो मजा बाजार में अपने को हंसते हुए ठगवाने में है वह घर बैठे बैठे नहीं।

इस संडे भी मैं धूप में नाम के लॉन में चेयर पर बैठा था। दूसरी चेयर पर अखबार पड़े थे। तीसरी चेयर खाली थी। अबके अक्टूबर में ही महसूस होने लगा था कि अब बाहर खुले में बीच बीच में धूप में बैठ लेना चाहिए। आसमान से बादलों के चलते टुकड़ों के बीच से सूरज मुझे वैसे ही छुप छुप कर देख रहा था जिस तरह कभी मैं कुंआरा होने पर पास के घर की उस खूबसूरत औरत को छुप छुप खिड़की को खोलता बंद करता निहारा करता था जब वह सामने छत पर होती थी तार पर कपड़े झाड़ती सूखने पाती कपड़ों में छिपती दिखती। या कि उस तरह आसमान में बादलों के बीच से छिप छिप कर उस तरह सूरज मुझे निहार रहा था जिस तरह साहब के ऑफिस के दरवाजे पर स्टूल पर अध सोया पीउन बीच बीच में अचानक जाग जाग कर अपने साहब की ओर भीतर झांका करता है।

उस वक्त मुझे धूप चिढ़ा नहीं रही थी, मेरी पीठ को सहला रही थी। समय के साथ साथ एक ही चीज के मतलब कितने बदल जाया करते हैं। जब हम फुर्सत में हो तो पता चलता है कि कुदरत भी कितने कमाल की है। तभी वह उसी तरह कपड़ों की गठरी दाईं बाजू से भीतर कर दाईं पीठ पर उठाए आ पहुंचा। आज उसने बादामी रंग का कुरता पाजामा पहन रखा था जो उस पर बहुत फब रहा था। सिर पर उसके रिवाज की टोपी। चेहरे पर इंच इंच की काली कम सफेद अधिक दाढ़ी मूंछ। मुझे बाहर बैठा देख मेरी ही उम्र के कहीं आसपास के ने तब आवाज देने के बदले मुझे देखकर भी गेट का कुंडा गेट की फ्रेम से बजाया तो मैंने अपनी नजरें चश्मे के शीशों से निकाल उसके चेहरे पर चपर्काइं,‘ तुम? और कैसे हो?’

‘ ठीक हूं बाबूजी। आपकी बहुत चाय पी ली। आज तो आपको सूट देकर ही जाऊंगा,’ उसने कहते कहते गेट खोला और आधा हंसता भीतर आ गया।

‘ हद है यार! जब कहा न मुझे कुछ नहीं लेना तो तुम फिर भी... मैंने पत्नी को कई बार की तरह चाय बनाने को कहा तो वह बोला,‘ नहीं बाबूजी! आज चाय पीकर नहीं, आज तो आपको मैं सूट देकर ही जाऊंगा। आज मर्दाना सूट एक से एक बढ़िया हैं मेरे पास। सर्दियों के हिसाब के। एक बार देख तो लो। इस हफ्ते घर जाना है। बेटी का निकाह है। इसलिए बस, माल खत्म करना है। खान पर विश्वास करो बाबूजी ,’ और मेरे बहुत न करने के बाद भी उसने अपनी गठरी खोल ही दी। फिर पशमीना शॉल पर हाथ फेरते बोला,‘ बाबूजी! देखा न कल तक जिस्म जलाने वाली धूप फिर से प्यारी लगनी शुरू हो गई। अच्छा तो बाबूजी, तुम काम कहां करते हो? सरकारी ऑफिस में हो?’

‘ हां, पर क्यों?’

‘यों ही। अपने धर्म भाई पद्म भट का बेटा आया है न कश्मीर से। कच्चा माल महकमे में चौकीदार था पद्म भट! बहुत पढ़ा लिखा है उसका बेटा साहेब! अगर आपकी दुआ से उसकी छोटी मोटी नौकरी कहीं लग जाए तो...’ कहते कहते वह अपनी कपड़ों की गठरी में रखे सूटों को नहीं , ज्यों तहों में रखी अपनी जिंदगी की तह को खोलने लगा हो,‘ गर्म सूट नहीं तो ये लाइफ टाइम शॉल ले लो बाबूजी! आप भी क्या याद रखेंगे कि कोई खान भाई कुछ दे गया था।’

‘ देखो, कहा न मुझे कुछ नहीं लेना। अच्छा एक बात बताओ? पद्म भट के बेटे के लिए तुम इतने परेशान क्यों हो?’

‘चौंक गए न बाबूजी! तो क्या हो गया बाबूजी! चलो! आज टाइम ही टाइम है। आपसे दिल की बात कर ही लेते हैं। वैस भी कई दिनों से मैंने किसीसे दिल की बात नहीं की। धंधे में किसीसे दिल की बात करने को वक्त होता ही कहां है साहब! आज के दिन भाड़ में जाए पेट। ये पेट तो इतना करने के बाद भी नहीं भरा बाबूजी!’ कह वह अपनी खुली गठरी किनारे सरकाता वहीं जमीन पर बैठने लगा तो मैंने उससे कहा,‘नीचे क्यों बैठ रहे हो? ऊपर बैठो, चेयर खाली तो है,’ मेरे कहने पर वह मेरे सामने वाली खाली चेयर पर बैठ गया बिना किसी औपचारिकता के।

फिर कुछ देर तक वह बाहर से ही घर के भीतर, पिछवाड़े जहां भी उसकी नजरें भीतर, कोनों में जा सकती थीं वहां वहां घुसाता घुमाता रहा तो मुझे उस पर शक भी हुआ। आदमी जब दूसरों के हिसाब से अधिक दूसरों के इधर उधर अपनी नजरें दौड़ाने लगे तो शक होना आम सी बात होती है। इतने में बीवी चाय बनाकर ले आई। चाय चेयर पर रखते हुए भी उसकी नजरें उसकी खुली कपड़ों की गठरी पर ही बार बार जा रहीं थीं। कपड़ों की खुली गठरी के हर लेडीज सूट का रंग उसकी आंखों को चौंधिया रहा हो जैसे।

‘लो, चाय पियो,’ मैंने उसकी इधर उधर देखती आंखों को चाय के कप पर फोकस करने के इरादे से कहा तो उसने चाय का कप हम दोनों के बीच बीवी द्वारा तीसरी चेयर पर रखी ट्रे से उठा लिया और पहले मेरे चाय की घूंट लेने का इंतजार करता रहा हाथ में कप पकड़े। जब मैंने चाय की घूंट ली तो चाय की घूंट लेने के बाद उसने मुझसे पूछा,‘ बाबूजी! कब से हो इस शहर में ?’

‘हूंगा यही कोई बीस इक्कीस साल से।’

‘ फिर तो आपकी यहां बहुत पहचान होगी? दरअसल! मेरे धर्म भाई का लौंडा यहां आया है। नौकरी की बहुत जरूरत है उसको। क्या बताऊं , उसका बाप मेरा कितना खून से भी प्यारा जिगरी भाई था साहेब!’

‘खून से भी प्यारा भाई!’ मैं चौंका तो वह तुरंत भांप गया। दिन में सौ सौ घरों के दिमाग जो पढ़ता है हर रोज वह। तब चाय का कप हम दोनों के बीच की चेयर पर रखते उसने कहा,‘ फिर चौंक गए क्या बाबूजी ! भाई बंध अपने ही धर्म में होते हैं क्या ? अपने धर्म में ही भाई बंध हुए तो क्या हुए! अपने धर्म में तो सब भाई बंध न होकर भी भाई बंध होते ही हैं। अरे साहब, खुदा के वहां से यहां आने का मकसद तो तब पूरा हो जो दूसरे धर्म वालों को अपना भाई बंध बनाओ। खान का भाई हिंदू हो तो बात बने। सिक्ख का भाई खान हो तो जीने का मजा आए। सच पूछो तो सफेद बाल होने तक इतना तो समझ आ ही गया कि पेट की लड़ाई में हर धर्म के बंदे एक से होते हैं, रोटी के लिए जद्दोजहद करते हुए। तब हिंदू में मुसलमान होता है तो मुसलमान में हिंदू। पर ज्यों ज्यों पेट भरता जाता है, त्यों त्यों दिमाग में धर्म पैदा हो नाचता नचवाता जाता है। पेट भरा होने पर ही हिंदू को मुसलमान मुसलमान दिखने लगता है तो मुसलमान को हिंदू हिंदू साहेब,’ चेयर पर रखी उसकी चाय ठंडी होती रही, वह कहता रहा ,‘ इस लड़के को मैं इसीलिए अपने साथ लाया हूं कि जब तक इसका कहीं और कमाने का जरिया नहीं हो जाता तब तक इसे अपने साथ रखूं। दो पैसे कमाई भी हो जाएगी और बाहरी दुनिया के रिवाज भी समझ जाएगा।

क्या बताएं बाबूजी! सच नहीं मानोगे। इसके परिवार के साथ हमारे परिवार का पता नहीं कितनी पुश्तों से धर्म का भाईचारा है। मेरे वालिद के वालिद इसके वालिद के वालिद के धर्म भाई थे। उनके वालिद के वालिद आपस में धर्म भाई थे। इसका बाप मेरा धर्म भाई था। अब मैंने अपने बेटे को इसका धर्म भाई बना दिया है ताकि हमारा धर्म का भाईचारा जिंदा रहे रहे। मैंने अपने बेटे को भी समझा दिया है कि....

खुदा गवाह है बाबूजी! इसके परिवार के बिना मुझे तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता। खुदा किसकी बुरी नजर न लगाए इसे। बुरे लोग दूसरों के धर्म में ही नहीं होते, अपने धर्म में भी होते हैं। पिछले महीने इसके बाप की मौत हो गई। एकदम! किसीको हवा भी न लगने दी उसकी मौत ने। वाह! क्या जिंदादिल आदमी था! आज भी उसकी जिंदादिली के बारे में सोचता हूं तो रोना निकल आता है। कहते हैं कि गज भर जमीन को लेकर भाई भाई में कहा सुनी हो गई थी। सो छोटे भाई ने बाप से भाई को जान से न मारने के इरादे से मार डाला। किसीने सोचा भी न था कि मौत उस भाई के हाथों भी आती है जिस भाई को उसने बाप बन पाला हो। वही अकेला उसके घर में कमाई का जरिया था। वाह! क्या मस्त परिवार था उसका। ये बड़ा है। इससे छोटी इसकी बहन है। वह कॉलेज में पढती है। जिगरी यार के इंतकाल के बाद भाभी उससे कॉलेज छुड़वाने लगी तो मैंने उससे कहा,‘ भाभी! अभी तुम्हारा भाई जिंदा है। जुबान देता हूं , जब तक ये पढ़ना चाहेगी, सारा खर्चा मेरा। सोच लूंगा, मेरे दो नहीं, तीन बेटियां हैं। बाबूजी अब हम जैसों को तो जुबान तो जुबान होता है न ! चाहे हिंदू की हो या फिर मुसलमान की। इसने ऊंची पढ़ाई की है बाबूजी! जब तक कहीं नौकरी नहीं लग जाता तब तक इसे अपने जिगर से लगाए रखूंगा। और मैं कर ही क्या सकता हूं इसके लिए?’

उसने फिर चाय का कप उठाया , ठंडी हो चुकी बची सारी चाय की एक घूंट ली और चाय का खाली कप अबके चेयर पर रखने की बजाय जमीन पर रख दिया,‘ साहेब! तुम्हारी कहीं पहचान हो तो इसको कहीं जरूर लगवा दो। इसका बाप जन्नत से दुआएं देगा आपको। आपकी बहुत मेहरबानी होगी बाबूजी! अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा तो आपको जिंदगी भर याद रखेगा। और मेरे मन पर से मेरे दोस्त का कुछ कर्ज उतर जाएगा,’ उसने आसमान की ओर हाथ जोड़ते कहा और मेरे कुछ कहने का इंतजार करने लगा।

मैं चुप! कुछ देर तक कुछ सोचते रहने के बाद मैंने उससे यों ही यह पूछ लिया जो मुझे जानना चाहकर भी नहीं पूछना चाहिए था,‘ खान भाई! तुम सच कह रहे हो क्या?’ आदमी सच भी कहे तो पता नहीं फिर भी क्यों मेरे जैसों के मन में सवाल बवाल करने लग जाते हैं।

तब उसने अपनी कपड़ों की खुली गठरी पर हाथ रखते कहा,‘ रिज्जक की कसम बाबूजी! इस उम्र में आकर झूठ क्या बोलना साहेब जब एक पांव कब्र में तो दूसरा पेट के लिए सड़के नाप रहा हो। हैरानी हो रही है न यह सुन कर? होगी ही बाबूजी! हर वक्त अखबारों में, टेलीविजन पर कुछ और ही देखते हो न! वह सौ सचों में से केवल एक सच है अपने कश्मीर का बाबूजी! अपने यहां कदम कदम पर नफरत चीख चीख कर बताने वाले तो बहुत हैं बाबूजी! पर रिश्ते निभाने वालों की भी कमी नहीं। पर वे खबर कम ही बनते हैं साहब! वैसे उन्हें खबर बनने की जरूरत भी नहीं। खबर बनने पर रिश्तों को बुरी नजर लग जाती है न! वैसे भी नफरतों से भरे बाजार में आज प्यार के खरीदार हैं ही कहां? तो क्या दूं आपको साहेब? देखो साहेब! आज तो आपको कुछ न कुछ तो देकर ही जाऊंगा,’ और मुस्कुराते हुए मेरा चेहरा देखने लगा। कुछ देर तक एकटक मेरा चेहरा देखते रहने के बाद वह एकाएक चेयर पर से उठ अपनी गठरी के कपड़ों में से एक खास डिजाइन का लेडीज सूट मुझे देता बोला,‘ भाई दूज पर बहन के लिए मेरा गिफ्ट समझ लो साहेब! कुछ नहीं लेगा खान भाई! अब पता नहीं इस शहर कब आना हो? इस शहर के जिन चेहरों को पहले मेरी आवाज का इंतजार रहता था अब उनको मेरे चेहरे से भी पता नहीं क्यों डर सा लगने लगा है साहेब? जब जब बहन इस सूट को पहना करेगी, उसे कश्मीरी स्माइल्स याद आया करेगी भाई साहेब,’ उसने वह सूट मेरे लाख मना करने के बाद भी मेरे हाथ पर धरा और अपनी कपड़ों की गठरी बांधने लगा तो मैं उसका अपना मन रखने के लिए भीतर से सूट के पैसे नहीं, उसकी बेटी को विवाह का शगुन लाने गया, पर जितने को बीवी को वह सूट दिखा, शगुन का लिफाफा ले बाहर आया तो उतने को वह खान भाई वहां से जा चुका था।


गुन का वह लिफाफा आज भी मैंने पूजा के पास सम्भाल कर रखा है। मुझे पूरा विश्वास है कि एक न एक दिन जब वह आएगा तो इसे जरूर उसकी बेटी को दूंगा।


 

लेखक परिचय - अशोक गौतम

जन्मः- गांव म्याणा, तहसील अर्की, जिला सोलन, हिमाचल प्रदेश , 24 जून 1961।


बचपन ही क्या, बहुत कुछ जीवन गांव में ही बीता। आज जब शहर में आ गया हूं, गांव की मिट्टी की खुशबू तलाशता रहता हूं। शहर की मिट्टी की खशबू तो गाय के गोबर सी भी नहीं।


गांव में एक झोले में किताबें लिए पशुओं को चराते चारते पता ही नहीं चला कि लिखने के लिए कब कहां से शब्द जुड़ने शुरू हो गए। और जब एकबार शब्द जुड़ने हुए तो आजतक शब्द जुड़ने का सिलसिला जारी है।


जब भी गांव में रोजाना के घर के काम कर किताबें उठा अकेले में कहीं यों ही पढ़ने निकलता तो मन करता कि कुछ लिख भी लिया जाए। इसी कुछ लिखने की आदत ने धीरे धीरे मुझे लिखने का नशा सा लगा दिया। वैसे भी जवानी में कोई न कोई नशा करने की आदत तो पड़ ही जाती है।


जब पहली कहानी लिखी थी तो सच कहूं पैरा बदलना भी पहाड़ लगा था। कहानी क्या थी, बस अपने गांव का परिवेश था। यह कहानी परदेसी 19 जून, 1985 को हिमाचल से निकलने वाले साप्ताहिक गिरिराज कहानी छपी तो बेहद खुशी हुई। फिर आकाशवाणी शिमला की गीतों भरी कहानियों न अपनी ओर आकर्षित किया। अगली कहानी लिखी फिर वही तन्हाइयां, जो 24 नवंबर 1985 को ही वीरप्रताप में प्रकाशित हो गई। उसके बाद तो कहानी लिखने का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि आज तक जारी है। कहानी लिखने का सिलसिला जो यहां से शुरू हुआ तो यह मुक्ता, सरिता, वागर्थ, कथाबिंब, वैचारिकी संकलन, नूतन सवेरा, दैनिक ट्रिब्यून से होता हुआ व्यंग्य लेखन की ओर मुड़ा।


.....अब तो शब्द इतना तंग करते हैं कि जो मैं इनके साथ न खेलूं तो रूठ कर बच्चों की तरह किनारे बैठ जाते हैं। और तब तक नहीं मानते जब इनके साथ खेल न लूं। इनके साथ खेलते हुए मत पूछो मुझे कितनी प्रसन्नता मिलती है। इनके साथ खेल खेल में मैं भी अपने को भूलाए रहता हूं। अच्छों के साथ रहना अच्छा लगता है। हम झूठ बोल लें तो बोल लें, पर शब्द झूठ नहीं बोलते। इसलिए इनका साथ अपने साथ से भी खूबसूरत लगता है। इनकी वजह से ही खेल खेल में सात व्यंग्य संग्रह- गधे न जब मुंह खोला, लट्ठमेव जयते, मेवामय यह देश हमारा, ये जो पायजामे में हूं मैं, झूठ के होलसेलर, खड़ी खाट फिर भी ठाठ, साढ़े तीन आखर अप्रोच के यों ही प्रकाशित हो गए।


आज शब्दों के साथ खेलते हुए, मौज मस्ती करते हुए होश तो नहीं, पर इस बात का आत्मसंतोष जरूर है कि मेरे खालिस अपनों की तरह जब तक मेरे साथ शब्द रहेंगे, मैं रहूंगा।



अषोक गौतम, गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन 173212 हिप्र मो 9418070089


E mail- ashokgautam001@gmail.com

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