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  • लोकमित्र गौतम

असली फ़ौजी






रुब्बड़ काका आज सुबह-सुबह ही गुस्से में फनफना रहे थे. उम्र के लिहाज से हालांकि उन्होंने अभी साठ का गोला पार नहीं किया था, लेकिन खैनी की लत और मुंह की सफाई से बेफिकर रहने के कारण छप्पन की उम्र में ही उनके मुंह में एक भी दांत नहीं था. इसलिए गुस्से में अकेली नाक ही नहीं समूचा मुंह ही फूल पिचक रहा था, जिस कारण जुबान अतिरिक्त रूप से लटपटा रही थी. इस गांव के अलावा कहीं का भी कोई व्यक्ति इस समय उनकी बात अगर सुन रहा होता तो उसे शायद एक भी शब्द समझ में नहीं आता कि आखिर वह कह क्या रहे हैं ? लेकिन इस गांव के लोग उनके शब्दों को सुनकर ही नहीं, उनकी भाव भंगिमाओं को देखकर भी बता सकते हैं कि किस समय वह क्या कह रहे होते हैं? इसलिए लोगों की उकसाऊ निगाहें और ध्यानमग्न कान, वही सुन रहे थे, जो फनफनाते गुस्से में लटपटाते हुए रुब्बड़ काका कह रहे थे, ‘सार कहत हैं कि लरिका फ़ौज म नहिं आय ... अगर फ़ौज म नहिं आय तो या जर्सी या बरान क्वाट मोरि गांड से निकरे हैं का ..?’ मुंह से निकले अपने आख़िरी शब्द के पहले उन्होंने अब तक इकट्ठा हो चुकी अच्छी खासी भीड़ को एक सवालिया निगाह से देखा और चारपाई में रखे हुए एक पुराने फ़ौजी लांग ब्राउन कोट को, जिसे वह बरान कोट कह रहे थे, लोगों की तरफ इस मंशा से उछाल दिया कि चाहे तो वह खुद उसे छूकर और उलट-पलटकर देख लें कि यह असली फ़ौजी कोट है कि नहीं.

लेकिन गांव वालों के लिए न तो रुब्बड़ काका का यह तिलमिलाता गुस्सा नया था और न ही अपने गुस्से को यकीन दिलाने का उनका यह अंदाज़. गांववालों के लिए रुब्बड़ काका की यह तिलमिलाहट पिछले कई सालों से उनके मनोरंजन का जरिया बन चुकी थी. भीड़ की तरफ कोट फेंकने का रुब्बड़ काका का मकसद यह था कि गांव वाले अपनी गलती स्वीकार करके, उनके बेटे को असली फ़ौजी मान लें. लेकिन गांववालों को भला यह सौदा कहां मंजूर था? इसलिए भीड़ में से एक बेचेहरा आवाज गूंजी, ‘अरे कानपुर के परेड बाजार में येतरन के पुरान क्वाट खूब बिकात हैं,तुम चाहे दस ठे ले आवा’ .

इस अदृश्य आकाशवाणी के साथ ही भीड़ से उठे - हे हे हे ... के कई खतरनाक स्वर रुब्बड़ काका को लाचार बनाने वाले अट्टहास में बदलते, इससे पहले ही वह तेजी से उठे और जमीन में पड़े कोट को उठाकर पास ही खड़े, अपने से थोड़े ही छोटे रामबरन के शरीर में बिजली की सी फुर्ती से लपेट दिया और अब भरी सभा में कबूल करवाने के अंदाज में दहाड़े, ‘बता रामबरन .... है असली फ़ौजी क्वाट के गरमी कि नहीं ... बता इन सबका कि केतना कटकटात है य क्वाट .... बोल रामबरन द्यार न कर बता दे इन सबका कि म्वा लरिका असली फ़ौज म है कि नहीं.’

रुब्बड़ काका के अनुरोध मिश्रित सवाल को सुनकर रामबरन किसी मंझे हुए एक्टर की तरह कभी दाएं कंधे को तो कभी बाएं कंधे को उचकाया, कभी कमर के आसपास के हिस्से को हिलाया डुलाया मानों कोट की कसावट की परख कर रहा हो. इसके बाद धीरे से कोट को उतारते हुए किसी एक्सपर्ट के अंदाज में बोला, ‘काका कोट म सब कुछ असली जइसेहे है, कट्कटातो खूब नीक है, अउर बटनौं सब असली पितरै के लगती हैं जैसे एखत्तर म शहीद जोधा काका के क्वाटन म पूरा गांव दिखिस है. पै काका बुरा न मान्या...’ कहकर रामबरन ने पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेई की तरह पॉज़ ले लिया, मानो अपनी निर्णायक टिप्पणी के पहले यह देखना चाहता हो कि उसे लोग कितने ध्यान से सुन रहे हैं. जब उसने देखा कि सबकी निगाहें उसी के चेहरे पर लगी हैं और रुब्बड़ काका की अधीर निगाहें तो बोल ही पड़ीं, ‘नटकउरा कहे करत हा रे बोल कहे नहीं देते कि म्वार लरिका असली फ़ौज म है.’

तो रामबरन एक बार और गैर जरूरी खांसी खांसकर बोला, ‘काका बुरा न मान्या कोट म सब कुछ तो ठीक है पै व फ़ौजी महक नइहांय जउन असली फ़ौजी क्वाटन में होति है.’

इतना कहकर रामबरन हाथ में लिए फ़ौजी कोट को चारपाई में पटका और लगभग भागने के अंदाज़ में खड़े लोगों के बीच में घुस गया. इसके बाद वही हुआ जो इस अक्सर के खेल के बाद होता था. रामबरन की टिप्पणी से हैरान रुब्बड़ काका उसे कोई वजनी गाली दे पाते इसके पहले ही भीड़ हे हे हो हो करती तितर बितर हो गयी और वह गुस्से तथा लाचारी में अपने पिचके जबड़े को फुलाते पिचकाते घर के भीतर घुस गए.

पाठकों इस कहानी का यह सीन यहीं खत्म होता है और पूरी कहानी जानने के लिए अब हमें तीन दशक पीछे उत्तर प्रदेश के एक पिछड़े हुए जिला फतेहपुर के गांव ह्न्नामखेड़ा चलना होगा, जहां बीसवीं सदी के आख़िरी दशक में रुब्बड़ काका गांववालों के लिए एक रूटीन मनोरंजन बन गये थे. किस्से की पृष्ठभूमि बहुत मामूली थी. महज हंसने हंसाने का एक लापरवाह सिलसिला कब रुब्बड़ काका की खीझभरी हताशा का बायस बन गया, गांववालों ने इसका कभी नोटिस ही नहीं लिया. रुब्बड़ काका का असली नाम रौबदार सिंह चौहान था. जब उनकी मूंछों और जबड़े में एक व्यवस्थित पदानुक्रम महसूस होता था, तब वह मूंछों पर ताव देकर खुद को पृथ्वीराज चौहान का वंशज बताने में जरा भी हिचक नहीं दिखाते थे. लेकिन वक्त और हैसियत साथ न दें तो ऊंची जाति के लोगों का भी नाम मुख सुख के लिए बिगड़ जाता है. रौबदार सिंह का रुब्बड़ काका हो जाना इसका सबूत था. हालांकि उनके रुब्बड़ बनने में उनकी कुछ लापरवाह आदतें भी जिम्मेदार थीं, लेकिन वो न तो काइयां थे और न ही किसी किस्म के मानसिक विकार से पीड़ित थे.

एक बेहद चिड़चिड़े व्यक्ति की बन गयी उनकी इस शख्सियत के पीछे दो बातों का ख़ास योगदान था, एक उनका अनपढ़ होना, जिस कारण वह कई हास्यास्पद बातें कह जाते थे और दूसरी, उनके अधियारी यानी पटदार ठाकुर अभयसागर सिंह को उनसे होने वाली ईर्ष्या. दरअसल रुब्बड़ काका अभी एक पीढ़ी पहले तक ठाकुर अभयसागर सिंह के साथ बराबर की जोत साझा किया करते थे. लेकिन एक पीढी के फासले पर ही वक्त ने कुछ ऐसे पलटी खायी थी कि उनमें और रुब्बड़ काका की हैसियत में जमीन आसमान का फर्क आ चुका था. एबीएस नहीं चाहते थे कि यह फर्क अब कभी मिटे. लेकिन दूसरी तरफ रुब्बड़ काका पहले लड़कों के बड़े होने के कारण और अब दोनों के फ़ौज में होने के कारण चाहते थे कि जितना जल्दी हो यह फर्क मिटे. रुब्बड़ काका की यह बेचैनी देख और समझकर एबीएस कई बार काफी परेशान हो जाते थे. उन्हें चिंता सताने लगी थी कि कहीं नाते रिश्तेदारों के बीच भी रुब्बड़ बराबरी के व्योहार की चाह न रखने लगें. क्योंकि कई पुराने रिश्तेदार तो अब भी दोनों परिवारों के साझा ही थे और उनके सामने रुब्बड़ काका जानबूझकर ऐसा जताने लगे थे, मानो अब उनमें और एबीएस में बस उम्र का ही थोडा बहुत फर्क है, हैसियत का नहीं. क्योंकि पहले एबीएस के सामने जहां रुब्बड़ काका सिटपिटाए से खड़े रहते थे या सामने आने की बजाय इधर उधर कट जाते थे, वहीं जब से उनके दोनो बेटे फौज में भर्ती हो गये थे, वह बिना किसी धुकुर पुकुर के उनके साथ उठने बैठने की कोशिश करने लगे थे.

अब तो रुब्बड़ काका चलते फिरते, एबीएस को कुछ अलग सा संबोधन भी करने लगे थे, जिससे सुनने वालों को लगे कि उनमें और एबीएस में हैसियत का भले फर्क हो, लेकिन परिवारिक बराबरी है. एबीएस ने जब इन बातों की नोटिस ली तो उन्हें ये बातें खराब लगीं और वह सोचने लगे कि कैसे रुब्बड़ काका को उनकी औकात में रखा जाए. कई दिनों की उधेड़बुन के बाद आखिरकार उन्हें रुब्बड़ काका की एक कमजोर नस मिल गई. दरअसल रुब्बड़ काका का बड़ा बेटा जिस पैरामिलिट्री फोर्स में था, वह गुप्त फ़ोर्स थी यानी सरकार ने उसे दुनिया के सामने सार्वजनिक नहीं कर रखा था. ऐसा अकेले अपने यहां ही नहीं पूरी दुनिया में होता है. हर देश में आर्मी उसकी घोषित आर्मी से कुछ ज्यादा होती है. जो अकसर अर्धसैनिक बलों के ही रूप में होती हैं। यही वजह थी कि जब भी रुब्बड़ काका का बड़ा बेटा गांव आता तो वह न तो फौजी ड्रेस पहनकर आता था और न ही फौजी बिस्तर वगैरह लेकर आता यानी उसकी बाहरी दिखावट में ऐसा कोई चिन्ह न होता, जो बिना उसे जाने, फौजी जवान मान लेने के लिए बाध्य करे. वह घर सिविल ड्रेस में ही आता और छुट्टियों में हमेशा सिविल ड्रेस में ही रहता.

यह सब यादकर एबीएस के दिमाग में स्ट्राइक के लायक खुराफात सूझी. वह मन ही मन बुदबुदाए - मिल गई कमजोर नस. खूब सोच समझकर एबीएस तुरंत काम में लग गए और गुपचुप तरीके से पूरे गांव में फैला दिया कि रुब्बड़ काका का दूसरा बेटा भी असली फ़ौजी नहीं है. एक दो बार तो गांववालों को उनकी बात कुछ अटपटी लगी, लेकिन एबीएस ने बड़ी चालाकी से रुब्बड़ के बड़े बेटे का खाका खींचा और उसमें छोटे को फिट कर दिया. उसने याद दिलाने वाले अंदाज़ में गांववालों से पूछा - रुब्बड़ का बेटा गांव कभी वर्दी में आता है क्या? जबकि गांव के दूसरे दर्जनों फौजी तो हमेशा वर्दी डाटकर ही आते हैं. गांववाले अब खुद भी सोचने लगे कि गांव के दूसरे फौजियों की तरह रुब्बड़ काका के बेटे के चलने, फिरने और यहां तक कि बोलने के स्टाइल भी कभी फ़ौजी टहक नहीं दिखती. वह न तो तनकर चलता है और न ही उसकी आवाज में फौजियों वाला रौब है. अब इसे संयोग कहें या रुब्बड़ काका की बदकिस्मती की उनका दूसरा बेटा भी जब 9 महीने की पहली फ़ौजी ट्रेनिंग खत्म करके गांव आया तो वह भी सिविल ड्रेस में ही आ गया. दरअसल हुआ यह कि अजयराज फतेहगढ़ कैंट से, जहां उसकी ट्रेनिंग हुई थी, 04494 फिरोजपुर अगरतला स्पेशल ट्रेन लेकर सीधे प्रयागराज पहुंच गया. वहां दो तीन दिन रहने के बाद दोनों भाई फिर मिलकर गांव गए. ऐसे में स्वाभाविक था कि बड़े भाई के साथ गांव वह भी सिविल ड्रेस में पहुंचा. वह कैसे कपड़ों में गांव आता है शायद इस बात का तब किसी के लिए कोई मतलब भी नहीं था. वह तो दो ढाई सालों बाद अब गांववालों को ख़ास बात लगी जब एबीएस ने उसमें रहस्य रोमांच जोड़ा. पता नहीं ये एबीएस के मजबूत इशारे थे या चटपटी वाकपटुता कि धीरे धीरे गांव के लोगों के मन में यह बात घर कर गयी कि रुब्बड़ काका का दूसरा बेटा भी असली फ़ौज में नहीं है. गांववालों के लिए असली नकली फ़ौज से मुराद यह थी कि जब सरहद में दुश्मन के साथ जंग होती है, तो वह जंग असली फ़ौजी लड़ते हैं. कश्मीर में विदेशी आतंकियों से वही लोहा लेते हैं आदि.

एबीएस ने इस कहानी को अपने अंदाज-ए-बयां से न केवल रहस्य से उठा पर्दा जैसी बना दिया बल्कि गांव वालों के लिए मुफ्त का मनोरंजन प्रदान कर दिया. शुरू शुरू में तो रुब्बड़ काका को काफी दिनों तक गांववालों के ये अटपटे इशारे और रहस्यमय कमेंट कुछ समझ ही नहीं आये. लेकिन जब लोग लुका छिपाकर कहने के बजाय मुंहफट ढंग से उनके बेटे के असली फ़ौज में न होने का मजाक उड़ाने लगे तो रुब्बड़ काका तिलमिला जाने की हद तक आहत होने लगे. यह स्वाभाविक ही था, क्योंकि उनका दूसरा बेटा वाकई नियमित फौज में ही था, भारतीय फ़ौज की सबसे बड़ी राजपूताना रेजिमेंट में. लेकिन गांववालों ने कुछ और ही कहानी गढ़ ली थी, इससे रुब्बड़ काका लगातार किलथने लगे. शायद मजाक की चासनी में लिपटा यह आरोप इतना संवेदनशील न बनता, अगर हर बार रुब्बड़ काका किलथते न. उनके कुछ ज्यादा ही चिढने के कारण गांववालों को उन्हें चिढाने में जरूरत से ज्यादा ही मजा आने लगा. जल्द ही रुब्बड़ काका को चिढाना गांववालों का सर्वप्रिय मनोरंजन बन गया.

इस बात ने रुब्बड़ काका को बहुत ही चिड़चिड़ा बना दिया. धीरे धीरे ऐसा हो गया कि उनके कान ही बजने लगे. किसी के मुंह से किसी भी सन्दर्भ में फ़ौज शब्द निकल जाता कि रुब्बड़ काका आग बबूला. नतीजा यह निकला कि अब तो गांव के छोटे छोटे लड़के भी उन्हें देखकर जोर से फ़ौज कहते और भाग जाते. रुब्बड़ काका उनके पीछे ईंट पत्थर लेकर दौड़ते, लेकिन वे पकड़ में न आते. वह अपने बरामदे में होते कि कोई पीछे की दीवार से छिपकर कहता, ‘ओ नकली फौजी के असली बप्पा,’ और रुब्बड़ काका की गालियों की बौछार शुरू हो जाती. रुब्बड़ काका देखते ही देखते पूरे गाँव के लिए मनोरंजन का खिलौना बन गए. रुब्बड़ काका की चिडचिडाहट ने धीरे धीरे हताशा बनकर उनके समूचे वजूद में काबिज हो गयी. लेकिन गांववालों के द्वारा उन्हें चिढ़ाए जाने की इस हिंसा में जरा भी कमी नहीं आयी. उल्टे गुजरते दिनों के साथ यह हिंसा बढ़ती ही गयी. अब तो लोगों ने उन्हें चिढ़ाने के अनगिनत तरीके ईजाद कर लिए थे. कोई उन्हें देखकर कहता- आजकल फौजी जर्सियां भी खूब नकली आने लगी हैं. यह सुनकर वह गुस्से में भरकर कहते, ‘त्वार का मतलब है, मो या जर्सी नकली आय? अरे या गारंटी के असली आय. येहिके अंदर से आग कि लपटैं छुटती हैं. येतनी गरम है या ... तुम का जाना असली फ़ौजी जर्सी की गरमाइश.’

लेकिन लोग उनके कुछ भी कहने के बाद भी उन्हें छेंड़ने से बाज नहीं आते.

गांव के लोग रुब्बड़ काका को चिढ़ाने के मामले में दिनोंदिन इतने क्रूर होते जा रहे थे कि उन पर उनकी गालियों, का कोई असर होना ही बंद हो गया. उनके किसी प्रतिवाद को गांववाले सुनते ही नहीं थे. वह सिर्फ और सिर्फ मजा लेते. मनोरंजन करते. जबकि इस सबसे धीरे धीरे रुब्बड़ काका अपना दिमागी संतुलन खोने लगे थे. इस कारण वो ऐसी गलतियां कर बैठते, जो गांववालों के लिए मनोरंजन का और मसाला मुहैय्या करा देतीं. मसलन कभी वह यूं ही हवा में किसी से बतियाने लगते. वह कहते, ‘सिमंगल तैं का जाना ... असली फ़ौजी कोट के गरमिहीं कुछ अउर होति है. या दरिकी फ़ौजी का आंवें दे तोहूं का एक कोट देवइहों.’

कभी कभी वह कहने लगते, ‘चाहूं तो आजै चार पक्के कमरा बनवाय लेंव. लेकिन फ़ौजी कहिसि है, बप्पा अगिली गरमिन म एकै बार म पूरा घर ललखौरी ईंटन से बाजी. महूं कहि दीन्हें हौं-जय हिन्न.’

गांववाले समझ गए थे कि बेटे का असली फ़ौजी न होना रुब्बड़ काका की दुखती रग है. इसलिए वे मौका मिलते ही किसी न किसी तरह से फौज का कोई न कोई जिक्र छेड़ देते और उकसाये जाने के बाद रुब्बड़ काका फुल वैल्यूम में बेटे के फौज में होने के साक्ष्य गिनाने लगते. इस पर कोई उनके पीछे से ‘हा हा’ करके भाग जाता तो कोई मुंह में गमछा लपेटकर खिखि...खिखी करके मजे ले लेता. धीरे धीरे यह स्थिति इस हद तक बिगड़ी की रुब्बड़ काका सचमुच में विक्षिप्तों जैसी हरकतें करने लगे. हालांकि पिछले कुछ सालों में उनका छोटा बेटा कई बार छुट्टियों में घर आया था और हर बार फौजी वर्दी ही डाटकर आया था. लेकिन एबीएस ने उसके नकली होने की इतनी पुख्ता नींव रख दी थी कि सबको यही लगता था कि उसकी वर्दी कानपुर के परेड बाजार की खरीदी हुई है. यहां तक कि अब तो रुब्बड़ काका को भी लगने लगा था कि उनका दूसरा बेटा भी टेरीटोरियल आर्मी में ही तो नहीं है? वह भी गांववालों की तरह शक करने लगे थे कि कहीं उनका बेटा छुट्टियों में घर आकर असली फौजी होने का नाटक तो नहीं करता ?

असली फ़ौजी की दुविधा रुब्बड़ काका के दिल की फांस बन गयी थी. जबकि लोग दिनोंदिन इसका ज्यादा से ज्यादा मजा लेने लगे थे. यहां तक कि अब तो लोग उन्हें देखकर ही मुंह घुमाकर हंसने लगते. कोई उनकी ही नक़ल करके कहने लगता, ‘असली फौजी जर्सिन म गजबै गर्मी होति है.’

रुब्बड़ काका के कानों में यह जुमला पड़ते ही वह गुस्से में ऐंठने लगते लेकिन कोई फायदा नहीं होता, कहने वाला कहकर भाग जाता और आसपास खड़े लोग हो हो करने लगते.

हंसी का यह हिंसक सिलसिला लगातार जारी था कि एक दिन अचानक एक धमाका हो गया, जिससे पूरा गांव सन्न रह गया. वह 18 फरवरी की हल्की सर्दियों वाली एक धुंधलाती शाम थी, जब गांव का पोस्टमैन लगभग दौड़ते हुए रुब्बड़ काका के घर आया और दरवाजे के बाहर से ही 'रौबदार सिंह ....रौबदार सिंह...' की आवाज देने लगा. रुब्बड़ काका शायद घर के काफी भीतर थे क्योंकि तीन चार आवाज के बाद भी अंदर से कोई आवाज नहीं आयी तो पडोस में दोस्तों का मजमा लगाए बैठे एबीएस ने पोस्टमैन को आवाज देकर पूछा, ‘क्या बात है मास्टर जी? क्यों आवाज पर आवाज दिए जा रहे हो?'

इस पर पोस्टमैन चलकर एबीएस और उनके हंसी ठिल्लों कर रहे दोस्तों के पास आया और उन्हें सेना से आये एक अर्जेंट टेलीफोन की सन्न करने वाली खबर सुना दी. रुब्बड़ काका का छोटा बेटा अजयराज सिंह चौहान जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हो गया था. पोस्टमैन की सूचना सुनकर लोग सन्न रह गये. जंगल की आग की तरह पलक झपकते ही बात पूरे गांव में फैल गयी. हर तरफ कोहराम मच गया. दूसरे दिन सुबह करीब साढे ग्यारह बजे जब चार फौजियों के कंधे पर रौबदार सिंह के शहीद बेटे अजयराज सिंह का शव गांव पहुंचा तो पूरा गांव हमारा फौजी अमर रहे, के गगनभेदी स्वर में रो रहा था. लोगों की नजरें झुकी हुई थीं, उन्हें लग रहा था शायद अजय के असली हत्यारे वही हैं. लेकिन आश्चर्य कि आज रुब्बड़ काका का सीना गर्व से तना हुआ था. आज उन्हें बेटे के असली फ़ौजी होने के लिए फ़ौजी जर्सियों की गर्मी बताने की कोई जरूरत नहीं थी.


 

लेखक का संक्षिप्त परिचय



मैं लोकमित्र गौतम पिछले तीन दशकों से पत्रकार हूं.मैं अब तक कई किताबें लिख चुका हूं.दो कविता संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं.

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