• हरी प्रकाश राठी

कौल

जाने क्यों पापा इन दिनों अंधेरे में बैठे रहते हैं ?

मौका मिलते ही वे घर के दाँये कोने में बने कमरे में चले जाते हैं। इस कमरे में बिना ट्यूब घुप्प अंधेरा रहता है। वहां जाकर कमर के पीछे दो तकिये लगाकर बैठे रहते हैं अथवा फिर बेड पर घण्टों लेटे रहते हैं। न जाने वे ऐसा क्यों करते हैं ? नींद उन्हें रात में भी नहीं आती फिर दिन में सोने का तो प्रश्न ही नहीं है। कमरा बंद करते समय हिदायत और देते हैं, ‘डोंट डिस्टर्ब मी’।

वैसे तो पापा कमरा बंद करने का पूरा ध्यान रखते हैं पर कभी चूक भी जाते हैं। अभी कुछ दिन पूर्व कमरा बंद किये बगैर बेड पर जाकर बैठ गए। जाने किस धुन में थे। उस दिन मैंने पापा को देर तक बेड पर बैठे देखा। वे एकटक सामने वाली दीवार देखे जा रहे थे। देखते-देखते कभी ओठों से बुदबुदाने लगते, फिर यकायक चुप हो जाते। उनकी चमकती हुई आंखें कभी मायूसी, कभी मजबूरी तो कभी गांभीर्य से भरी हुई लगती।

कहीं पापा दार्शनिक तो नहीं हो गए? ना बाबा ना, भगवान पापा को और कुछ बनाए, दार्शनिक न बनाए। सुना है दार्शनिक अज़ब-गज़ब हरकतें करते हैं। कभी दो अलग रंग के मोजे पहनकर घर से निकल जाते हैं तो कभी दो अलग तरह के जूते। कभी स्वेटर उल्टा पहन लेते हैं तो कभी बनियान। कभी पेंट की जिप तक लगाना भूल जाते हैं। कुछ अन्य सड़क पर चलते-चलते यकायक रुककर चांद-तारों को देखने लगते हैं। मेरा एक सहपाठी बता रहा था कि एक दार्शनिक को बादलों के साथ चलने का चस्का लग गया। बाद में पता चला कि वह बादलों पर रिसर्च कर रहा था। दो बार दुर्घटनाग्रस्त होते बचा। अनेक दार्शनिक कवि-कथाकार बन जाते हैं। वे स्वप्न में भी कथा-कविताएँ बुनते हैं। सुना हैं वे कोमल हृदय के होते हैं एवं जरा-सी प्रशंसा से बाग-बाग हो जाते हैं। समाज से इनका कोई लेना-देना नहीं। सड़क पर चलते हैं तो लगता है अजायबघर से आए हों। कभी मुख पर दाढ़ी तो कभी सपाट गंजे। आम जनता इन्हें घर फूंक तमाशा देखने वाला कहती है। इनका बस चले तो ये खुद की झौंपड़ी फूंक कर हाथ ताप ले। हे प्रभु! पापा को ऐसा प्राणी तो कतई न बनाना, बेचारी मम्मी पर आसमान गिर जायेगा।

पापा कमरे में होते हैं तो कई बार विचित्र आवाजें आती हैं। वैसे तो पापा पहले भी जम्हाई लेते समय ‘राम’ बोलते थे लेकिन इन दिनों अक्सर ‘हे राम’ बोलते हैं। यही नहीं यह ‘हे राम’ बोलना तादाद में पहले के राम बोलने से दस गुना हो गया है। जहां पहले ‘राम’ बोलने के साथ वे धीरे से मुस्कुराते थे, हे राम बोलते समय पापा ऐसे लगते हैं मानो पचास फीट गहरे कुए में खड़े हों। कहीं पापा को महात्मा बनने की तो नहीं लग गई ? मैं सत्रह वर्ष का हूं, जबसे होश संभाला है उन्हें अनेक बार मम्मी को कहते हुए सुना है, ‘ज्यादा परेशान किया तो साधु बन जाऊंगा।’ मम्मी कौन सी कम है, वो भी सीधा जवाब देती है, ‘हर बार धमकी ही दोगे या कभी बनोगे भी। कंदराओं में घुसकर लंगोट कसना सरल काम है क्या ? एक बार भी मिलने आई तो तुरंत साथ हो लोगे।’ यह सब सुनकर पापा सर धुनने लगते। उन्हें हारा हुआ देख मम्मी एक और तीर डालती, ‘अरे जब मेनका को देखकर विश्वामित्र जैसे तपस्वी की लंगोट हिल गई तो तुम किस खेत की मूली हो।’ पापा की स्थिति तब खिसियानी बिल्ली खंभा नोंचने वाली होती।

कभी-कभी पापा के कमरे से विशेषतः इन दिनों सुबक-सुबक कर रोने की आवाजें तक आती है। अनेक बार लगता है जैसे वे खुद से बतिया रहे हों। यह आवाजें स्पष्ट तो नहीं होती पर लगता कहीं गहरी घुस-पुस चल रही है। इन दिनों पापा कभी गमगीन गीत तो कभी उदास शायरी भी दागते रहते हैं। एक बार मम्मी रसोई में खड़ी थी तो चुपचाप उसके समीप आकर खड़े हो गए। कुछ देर बाद मम्मी फुसफुसाई तो गालिब का शेर जड़ दिया, ‘दिल का क्या रंग करूं खूने ज़िगर होने तक।’ बाप रे! कहीं पापा को इश्क तो नहीं हो गया ? लेकिन यह कैसे संभव है, पापा शादी-शुदा हैं, इज्जतदार हैं, फिर मम्मी पापा का इतना ध्यान रखती हैं। फिर वे क्यों फिसलेंगे ? इस उमर में इश्क ? सुना है इश्क-मुश्क ऐसा रोग है जो किसी उम्र में लग जाता है। ऐसा होने पर आदमी सुध-बुध भूल जाता है। धरती पर चलते हुए उसे आसमान में उड़ने का अहसास होता है। मैंने ऐसे कई सीरियल्स् देखे हैं जहां बुड्ढे नवयौवनाओं को फांस लेते हैं। हे प्रभु! ऐसा हरगिज नहीं करना, मम्मी बरबाद हो जायेगी। मैं भी क्या गुड-मुड सोचने लग गया। निश्चय ही यह मात्र मन का बहम है। मम्मी ने क्या कच्ची गोलियां खेली हैं? ऐसा होता तो हाथ खर्च में इज़ाफ़ा कर मुझसे जासूसी नहीं करवाती?

कहीं पापा पागल तो नहीं हो गए ? लोग कहते हैं वे जीनियस हैं लेकिन कई अन्यों से मैंने यह भी सुना है कि अति बुद्धिमान कभी ऐसी हरकतें करते हैं कि पागल भी पीछे छूट जाते हैं। अधिक पके घड़ों में ही पतली क्रेक जैसी रेखाऐं दिखती हैं। गत माह मित्र मनीष के घर गया तो उसके पापा मेजर बख्शी अपने एक मित्र को हंस कर कह रहे थे, ‘एवरी जिनीयस हेज टिपिकल इडियोसी’ अर्थात् हर बुद्धिमान के दिमाग के किसी कोने में मूर्खता पैठी होती है।’ तब मनीष की मम्मी जो थोड़ी दूर पर खड़ी थी, खिलखिलाकर बोली, ‘दोनों एक दूसरे का परिचय दे रहे हो क्या ?’ कमरे में तब हंसी के ठहाके गूंज उठे थे। बाहर से आये मेजर बख्शी के मित्र की बीवी तो यह सुनकर बाग-बाग हो गई।

ओह! मैं भी कितना बुरा हूं, कम से कम मुझे तो पापा के बारे में ऐसा नहीं सोचना चाहिए। मेरी कौनसी जरूरत है जो उन्होंने पूरी नहीं की। मन मसोस कर भी हर आवश्यकता पूरी की है। मेरी ही क्यों, बड़ी बहन सुप्रिया को भी पापा से ऐसी कोई शिकायत नहीं है। हमें तो आटे-दाल का भाव तक नहीं मालूम। कैसे घर चलता है, पापा जाने। समय पर खाना मिल जाता है, ड्रेसेज मिल जाती है, पॉकेट मनी मिल जाती है, और क्या चाहिए। अनेकों बार पापा देशाटन पर ले गए हैं एवं रेस्ट्रां में जाने की तो गिनती भी नहीं हो सकती। मम्मी जरा सी थकी होगी कि पापा कहते हैं, ‘आज सब रेस्ट्रां चलेंगे।’ मैं और सुप्रिया तो मनौती मनाते हैं कि मम्मी थकी रहे। हमारी बला से। हमें तो रेस्ट्रां जाना ऐसा लगता है मानो जन्नत में पहुंच गए हों। वहां मेन्यू पर सबसे पहले मैं ही लपकता हूं। मम्मी आंख दिखाती है तो पापा हंसकर कहते हैं, ‘जवान बच्चे हैं। इनकी पंसद का खा लेंगे तो कौनसा पहाड़ टूट पड़ेगा।’ पापा की ऐसी बातें सुनकर मेरी छाती फूल जाती है। तब मैं यही सोचता हूं कि आसमान का छोर मिल सकता है, पापा की उदारता का नहीं। सचमुच मेरे पापा आसमान से ऊंचे एवं समुद्र से गहरे हैं। पापा कभी क्रोध नहीं करते। सभी यही कहते हैं माथुर साहब जैसा सौम्य व्यक्ति शायद ही मिले। पापा की यूं तारीफ सुनकर मेरी आंखों की चमक दुगुनी हो जाती है।

पापा को आखिर कुछ तो हुआ है ? कोई तो चिंता है जो दीमक की तरह खाये जा रही है वरना यूं सबको छोड़ तन्हां बैठने के मायने क्या हैं ? यह भी हो सकता है उनके विभाग में कोई दिक्कत हो ? पर ऐसा होता तो पिछले माह डिनर पर आए उनके बॉस यह क्यों कहते, ‘ माथुर जैसा वर्कर मैंने आज तक नहीं देखा। इसे कोई भी काम देकर निश्चिंत हुआ जा सकता है। स्टाफ ही नहीं ग्राहक भी इन्हें सर आंखों पर रखते हैं।’ पापा की ऐसी तारीफ सुनकर मम्मी की आंखें गीली हो गई थी।

कहीं ऐसा तो नहीं पापा की तनख्वाह कम हो ? कुछ समय पहले मम्मी पापा से कह भी रही थी, ‘आजकल मंहगाई बहुत बढ़ चली है। अनाज-दालें सभी महंगी हो गई हैं। बच्चों की फीसें, कपडे़ सभी के दाम आसमान छू रहे हैं। हमारे तो दो बच्चे हैं, आपकी तनख्वाह भी ठीक है, जैसे तैसे काम चल जाता है। गरीब आदमी कैसे जीता होगा ? वह तो निवाले से पहले मजबूरी गटकता होगा। यह कैसा देश है जहां कुछ लोगों के पास इतनी दौलत है कि खाना देखकर उबकी आती है तो कुछ बिना पेट की आग बुझाए सो जाते हैं।’ पापा ने तब मम्मी का तर्क यह कहकर पुरजोर किया, ‘इन बड़े-बड़े उद्यमियों एवं व्यवसायियों की करतूतें तो देखो। बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमेंगे, आलीशान बंगलों में रहेंगे, दसों ताबेदार सेवा में खड़े हैं, लाखों रुपयों की काली कमाई छुपायेंगे पर कर्मचारियों को देने के नाम पर इन्हें सांप सूंघ जाता है। बोनस तक रिसा-रिसा कर यूं देते हैं जैसे अहसान कर रहे हों। अनेक कर्मचारियों की ग्रेचुटी, पीएफ तक गटक जाते हैं। उनके नाम तक पे-रोल पर नहीं। कंपनी के सीए एवं बड़े अधिकारी सारी समस्याओं को समेट लेते हैं। प्रशासन इनकी मुट्ठी में हैं। तभी तो मोटी पगार पाते हैं।’ यह कहते हुए पापा मम्मी के समीप आए एवं उसके दाए कंधे पर हाथ रखकर बोले, ‘तूं चिंता मत कर। मैंने पूरा बंदोबस्त कर रखा है। तुम सब तो बीमे की रकम से ही पल जाओगे। हाथी की तरह मैं भी जिंदा लाख का लेकिन मरूं तो सवा लाख का हूं।’ इतना कहकर पापा खिलखिलाकर हंसने लगे। मम्मी तब बिफर कर बोली, ‘मरे तुम्हारे दुश्मन।’

यह भी हो सकता है कि पापा को हमारी पढ़ाई की चिंता हो ? माँ-बाप से बढ़कर बच्चों का शुभचिंतक कौन हो सकता है ? लेकिन मैं और सुप्रिया तो सदैव अव्वल रहते हैं। मैं इंजिनियरिंग के तीसरे साल में हूं एवं सुप्रिया छः माह बाद लॉ ग्रेजुएट बन जाएगी। उन्हें कम से कम हमारी पढ़ाई की चिंता तो नहीं करनी चाहिए। पापा के एक मित्र डॉ सुधीर भार्गव वर्षों से हमारे यहां आते हैं। स्थानीय सरकारी अस्पताल में वरिष्ठ चिकित्सक हैं। पिछले वर्ष मैंने उन्हें पापा को कहते हुए सुना था, ‘माथुर, औलाद हो तो तेरे जैसी। हर बार अव्वल। मेरी तो आधी समस्या मेरे बच्चे हैं। पढ़ाई के नाम से ही उनका सर दुखने लगता है। गनीमत है पास हो जाते हैं। भगवान तेरे जैसी संताने सबको दे।’

यह भी हो सकता है पापा सुप्रिया के विवाह को लेकर चिंतित हो ? इन दिनों मम्मी सुप्रिया को लेकर पापा से गुप-चुप बतियाती रहती हैं। दोनों इतनी कुशलता से बातें करते हैं कि कान ऊंचे करने पर भी जरा सुनाई नहीं देता। अनेकों बार ओपन डिस्कशन भी होता है लेकिन तब हम सभी ड्राइंग रूम में होते हैं। अभी कुछ समय पहले ही तो पापा मम्मी से कह रहे थे, ‘युग बदल गया, किसी जमाने में हाथभर घूंघट निकालने वाली छोकरियां डाॅक्टर, बैरिस्टर, कलेक्टर तक बन गई लेकिन समाज की प्रथाएं जस की तस है। मांगते कोई नहीं पर छोड़ता कौन हैं ? मैं तो दहेज लोभी को बेटी कत्तई न ब्याहूं।’ तब मम्मी पापा का हाथ पकड़कर उसी घुप्प अंधेरे वाले कमरे में ले गई। देर तक दोनों जाने क्या बतियाते रहे। कमरे से वापस बरामदें में आए तब दोनों मुस्कुरा रहे थे। उनकी अबूझ मुस्कुराहट मेरी उलझन बन गई। कहीं सुप्रिया के इश्क-विश्क का चक्कर तो नहीं ? डाॅ श्रीकांत के साथ कई दफ़ा रेस्ट्रां जाते हुए मैंने उसे देखा है?

कहीं पापा अवसाद का शिकार होकर खूंसट तो नहीं हो गए ? क्या मालूम? पिछले अनेक वर्षों का इतिहास तो यही बताता है कि पापा खूंसट नहीं हैं। सुबह डाइनिंग टेबल पर हम अक्सर साथ होते हैं। वाद-विवाद के लंबे दौर चलते हैं। अनेक बार तो हंसी की फुलझड़ियां फूट जाती हैं। किस विषय पर चिंतन नहीं हुआ इस टेबल पर। राजनीति, इतिहास, फिल्में एवं अनेक प्रकार की सामाजिक समस्याओं तक पर हमने गहन डिस्कशन किया है। पापा कहते हैं घर की डाइनिंग टेबल से बड़ी कोई क्लास नहीं। पारिवारिक बातचीत में इंसान जितना सीखता है उतना अन्यत्र नहीं सीख सकता। हां, यह बात अवश्य है पापा नयी पीढ़ी की राय से इत्तफाक रखते हैं, इसीलिए बहस थोड़े में सिमट जाती है। मम्मी परम्परावादी है। एक बार मम्मी ने प्रसंग छेड़ा कि ‘एरेंज्ड मैरिजेज’, लव मैरिजेज से अधिक टिकाऊ है तो मैं एवं सुप्रिया मम्मी के विरूद्ध लामबंद हो गए। आश्चर्य! उस दिन पापा ने हमारा ही पक्ष लिया। मम्मी की ओर देखकर बोले, ‘शोभा! बच्चे ठीक कहते हैं। एरेंज्ड मेरिजेज की ही असफलता दर अधिक है। वैवाहिक सफलता का आधार मात्र उसका टिकाऊ होना नहीं है। मुख्य मुद्दा तो यह है कि दंपति में प्रेम एवं समझ बनी या नहीं। इस मायने में लव मैरिजेज ज्यादा ठीक है। ऐसे विवाह सामाजिक कुप्रथाओं को भी बहुत हद तक विराम देते हैं। निसंदेह सड़-सड़ कर समझौता करने की बजाय स्वातंत्र्य एवं मस्ती से जीना अधिक सुखकर है।’ उस दिन सबको एक पाले में देख मम्मी उठकर रसोई में चली आई। तब पापा मुस्कुराते हुऐ पीछे-पीछे आए। मम्मी का हाथ पकड़कर बोले, ‘तुम्हारे-मेरे जीवन का विश्लेषण करें तो एरेंज्ड मैरिज ही ठीक है। मेरी जीवन की बगिया तो तुम्हारे प्रेम-गंध से ही महकी है।’ तब मम्मी ओठ दबा कर बोली, ‘हटो भी! बच्चे बड़े हो गये हैं।’

मुझे गर्व है कि मुझे पापा जैसे पिता एवं ऐसी स्नेहिल मां मिली। हमें तो पता ही नहीं चला तकलीफ किस बला का नाम है। दोनों गुपचुप सभी समस्याओं का समाधान कर लेते हैं। दोनों के बीच गज़ब अंडरस्टेंडिंग है। दोनों एक-दूसरे को इशारों में समझ लेते हैं।

इतना होते हुए भी कुछ तो है कि पापा इन दिनों बदले हुए हैं। मम्मी भी इन दिनों गंभीर दिखाई पड़ती है। कभी-कभी तो लगता है रो पड़ेगी लेकिन आंसू नहीं टपकते। जानने का प्रयास करता हूँ तो चिढ़ कर कहती है, ‘हर बात बताना जरूरी है क्या ?’ पापा इन दिनों कुछ दवाइयां भी लेते हैं। सुप्रिया ने मम्मी से पूछा तो बोली, ‘इन्हें गैस की बीमारी है, भार्गव अंकल ने देख लिया है, कोई खास बात नहीं है। इस उम्र में अधिकांश को यह बीमारी होती है।’ मम्मी के उत्तर से मुझे एवं सुप्रिया को राहत मिली है।

सुप्रिया ने मुझे बताया है कि कल डॉ श्रीकांत पापा-मम्मी से मिलने आ रहे हैं। वैसे तो वे घर आने में संकोच करते हैं पर पापा ने बुलाया है तो अवश्य आयेंगे।

डॉ श्रीकांत आए तो दोनों उसी अंधेरे वाले कमरे में देर तक बतियाते रहे। इस दरम्यान मैं, मम्मी एवं सुप्रिया ड्राइंग रूम में बैठे रहे। डॉ श्रीकांत कमरे से बाहर आए तो मैंने कुछ देर हमारे साथ बैठने का अनुरोध किया पर वे नहीं माने। शायद उन्हें कहीं जाना था। मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोले, ‘आज एक जरूरी अपाईंटमेन्ट है, कुछ दिन बाद तसल्ली से मिलूंगा।’ मैं एवं सुप्रिया उन्हें जब गेट पर छोड़ने आए तो सुप्रिया ने कनखियों से पूछा, ‘पापा से क्या बात हुई’?’ डॉ श्रीकांत इसका उत्तर चतुरता से टाल गए, ‘मैं क्यों बताऊं, खुद पापा से पूछ लो।’

आश्चर्य! इसी माह की छब्बीस तारीख यानि मात्र बीस दिन बाद सुप्रिया का विवाह है। यकायक पापा ने ऐसा निर्णय क्यों लिया? क्या सुप्रिया ने कोई ऐसा कार्य कर दिया कि विवाह अपरिहार्य हो गया ? ख़ुदा जाने। मुझे कोई बताता भी तो नहीं।

दीदी की शादी धूमधाम से हो गई है। कितने रिश्तेदार विवाह में आये। अपनों से मिलने का आनंद अद्भुत है। काम के मारे पापा की सांस फूल गई मगर मन में उत्साह हो तो उम्र बौनी हो जाती है। सुप्रिया की विदाई पर पापा-मम्मी और मैं बिलख पड़े। पापा की दशा ऐसी थी मानो श्रीकांत सुप्रिया के साथ उनके प्राण ले जा रहा हों।

अब घर में मैं अकेला रह गया हूँ। सुप्रिया थी तो उससे जब-तब झगड़ता रहता था, अब मन मसोसता रहता हूँ। दीदी एवं जीजाजी एक माह के हनीमून पर स्विट्जरलैण्ड निकल गए हैं।

सुप्रिया की शादी हुए दस रोज बीत चुके हैं। शादी का सारा कार्य निपट चुका है। लेकिन यह क्या? पापा ने फिर वही पुरानी आदत पकड़ ली है। पुनः उस कमरे में जाकर लेटने लगे हैं। इन दिनों मम्मी भी कई बार उनके साथ जाने लगी है। आज भी भीतर ही है। अजब व्यवहार है, मैं तो निपट अकेला रह गया। बस बाहर बैठा कुढ़ता रहता हूँ। अब दोनों मिलकर मेरे ब्याह की व्यूहरचना तो नहीं कर रहे ? यकायक मम्मी ने दरवाजा खोला और बोली, ‘पापा तुम्हें बुला रहे हैं।’

मैं पापा के पास आकर बैठ गया हूँ। मम्मी उठकर रसोई में चली गई है। पापा की आंखों में आज प्रेम का दरिया उमड़ आया है। मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर कह रहे हैं, ‘तुमने शादी में बहुत काम किया। अब तू बड़ा हो गया है। घर की छोटी-छोटी जिम्मेदारियां संभाला कर। तेरी मां को राहत मिलेगी। सुप्रिया के जाने के बाद वह भी अकेली हो गई है।’ इतना कहकर उन्होंने तकीये के नीचे से दो एयर टिकट निकाले एवं मेरे हाथ में देते हुए बोले, ‘तुम्हारी हवाई यात्रा की बहुत इच्छा थी। कुछ रोज चाचा के यहां दिल्ली हो आ। मैं भी पन्द्रह रोज के लिए मुम्बई जा रहा हूँ। तुम्हारी मौसी इस बार कसम देकर गई है कि शादी की थकावट मिटाने हम उनके घर मुम्बई ही आएं। आने जाने के हवाई टिकट तक बनवा दिए हैं। कल तू दिल्ली के लिए और हम दोनों मुम्बई के लिए रवाना हो जायेंगे। तू आएगा तब तक सुप्रिया भी आ जाएगी।’

मेरी बांछे खिल गई। चाचा के यहां इतने दिन यानि मस्ती ही मस्ती। मैंने आनन-फानन लगेज तैयार कर लिया है। मैं मन-ही-मन फुसफुसाया हूँ, पापा आप महान है।

चाचा के यहां दो सप्ताह पलक झपकते बीत गये। अब मात्र पांच दिन बचे हैं। आज रोज पापा से बात करने की इच्छा हुई तो घर फोन किया। उधर मम्मी ने फोन उठाया एवं बोली, ‘पापा सो रहे हैं। सब ठीक है तू समय पर आ जाना। सुप्रिया भी उसी दिन आ रही है। तेरी फ्लाइट सुबह 7.00 बजे पहुंचेगी उनकी फ्लाइट आधा घण्टा बाद आती है। उन्हें साथ लेकर ही आना।’

मैं, जीजाजी एवं सुप्रिया एयरपोर्ट पर खड़े हैं। पहली बार मैं दीदी एवं पापा-मम्मी से इतने समय तक दूर रहा। अब घर पहुंचने की उतावली हो रही है।

मैं टैक्सी की ओर बढ़ ही रहा था कि मोबाईल की घण्टी बजी। भार्गव अंकल का फोन था, कह रहे थे, ‘आज तड़के तुम्हारे पापा ने दम तोड़ दिया। दिल्ली सूचना भेजी तब तक तुम निकल चुके थे।’ मैं जड़ हो गया। सारा चेहरा आंसुओं से नहा गया। सब पर मानो वज्रपात हुआ। मैंने स्वयं को संभाला एवं अंकल से पूछा, ‘यकायक ऐसा क्या हो गया अंकल ? पापा तो ठीक थे?’

‘पापा ठीक नहीं थे बेटा! उनके लीवर में गत छः माह से अग्रिम स्टेज पर कैंसर था। बचना नामुमकिन था।’

‘आपने मुझे बताया क्यों नहीं अंकल’ ? मैंने रोष प्रकट किया।

‘उनकी आखिरी इच्छा थी कि उनकी बीमारी के बारे में तुम्हें एवं सुप्रिया को नहीं बताया जाये। यह भेद मैं, तुम्हारी मम्मी एवं डॉ श्रीकांत ही जानते थे। तुम्हीं बताओ, क्या हम तुम्हारे पिता को इस हालत में दिया कौल तोड़ देते ?’

मैंने जीजाजी की ओर देखा। उनकी भीगी आंखें इस निर्मम सत्य पर मोहर लगा रही थी। सुप्रिया तो यह सुनकर सकते में आ गई। वह खड़े-खड़े कांपने लगी।

हम घर पहुंचे तो पापा की लाश बरामदे में पड़ी थी। मम्मी पास ही बुत बनी बैठी थी। धीरे-धीरे मैं पापा के पास आया एवं बदहवास उनके चरणों में गिर पड़ा। मैं चीख रहा था, ‘पापा, आपने ऐसा क्यों किया ? क्या बच्चों को सेवा का हक भी नहीं ? जवाब दो पापा! आप बोलते क्यों नहीं ?’ मेरी आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा था।

यकायक मुझे लगा दो अदृश्य हाथ मेरे सर को छूकर कह रहे थे, ‘कोई भी पिता जीते जी अपने बच्चों को दुःखी नहीं देख सकता, मैं फिर ऐसा क्यों करता ?’

 



2010 में एक बार मधुमती पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है।

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