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  • हुस्न तहस्सुम निहाँ

विष सुंदरी, उर्फ़ सूरजबाई का तमाशा



राजपुर ग्राम की पगडंडियों पर सांझ की लालिमा धीरे-धीरे फैल रही थी। कुंवार के दिन। घरों में संझाबाती की जा चुकी थी। चूल्हों से उपलों की सुलगन निकल कर असमानी फजां में तैर रही थी। गांव भर के खिलंदड़े बच्चे खलिहान में जुटे पड़े थे। कोई पयार और भूंसे के बड़े से ढेर पर से फिसल रहा था तो कोई कबड्डी और पकड़ी-पकड़ान खेल रहा था। एक आद इधर-उधर लगे पेड़ों की शाखाओं से झूल रहे थे। अजीब सोंधा सा माहौल। कुछ बूढ़ी अधबूढ़ी महिलाएं यहां वहां टेर रही थीं। कुछ समूह बनाए घर के द्वारों पर बैठी थीं। यही होता है जिंदगी का सबसे खूबसुरत यथार्थ...कि जमीन से जुड़ी जिंदगानियाँ।

अभी गांव अपनी छटा पे लहालोट ही था कि सयास चौंक उठा है वह। एक तरफ दूर से बजती हुई घण्टियों ने सबका ध्यान खींच लिया। लोग उधर ही देखने लगे। बच्चे कुछ देर तक ठिठक कर खड़े रहे फिर उधर ही दौड़ लगा दी। वहाँ पहुँच के एक बार फिर ठिठक गए। सामने बैलगाड़ियों की छोटी सी कतार। उन पर पर्दे तने हुए हैं। सबसे आगे वाली बैलगाड़ी पर सामने की ओर बड़ा सा पोस्टर चिपका हुआ है- ‘‘राजबाला का तमासा‘‘ एक कुछ पढ़े बच्चे ने हिज्जे लगा कर बमुश्किल पढ़ा और फिर सारा बच्चा समूह झूम उठा। हर ओर गूंज मच गई- ‘’तमासा वाले.....तमासा वाले...’’.और फिर उसी बैलगाड़ियों के रेले के साथ चलने लगे। पोस्टर वाली गाड़ी से तेज-तेज गीत बजने की भी आवाज आ रही थी। जब रेला गांव के भीतर पहुँचा तो स्त्री-पुरूश सभी दौड़ कर करीब भाग आए और उत्सुकता से देखने लगे। एक आदमी बैलगाड़ी चालक के पास बैठा कुछ लाल हरे रंग के पर्चे भी उछाल रहा था जिसे बच्चों समेत बाकी स्त्री-पुरूश भी लपक-लपक कर लुक ले रहे थे। एक उत्सव सा हो गया था। रघू ने हरक कर चैतू को पुकारा था-

‘‘अरे हो चैतुवा...द्याख....अपन गंव्वम तमासा आई गवा...जनौं ठण्ड कम होई गए‘‘

और फिर जहाँ-जहाँ से गुजरता वो रेला धूम मच जाती। राजबाला समेत उनके तमाम साथियों को गांव वाले राम-राम कहते जा रहे थे और राजबाला व साथी बाहर हाथ निकाल के लहराते हुए उनका अभिवादन स्वीकार रहे थे।

अंततः सफर खत्म हुआ। रेला गांव के एक छोर पर पड़े विशाल मैदान में जा के रूका। बैलगाड़ियों के पर्दे खुले और कुछ लाल पीले लोग बाहर निकल कर मैदान में फैल गए। तम्बू कनात गाड़े जाने लगे। उड़ते-उड़ते खबर मुखिया देवी ठाकुर के वहाँ तक पहुँच गई। वह चौंके-

‘‘अरे...बिना हमारी अनुमति कै...?

झट धोती संम्भलते उठे और दोचार कारिंदों को लेकर वहां जा पहुँचे। लोग अपने काम में लगे हुए थे। फिर उन्होंने एक लड़के से पूछा ‘‘तोहार मालिक कऊन?‘‘

लडके ने राजबाला की तरफ संकेत कर दिया। वह उसके पास जा के बोले-

‘‘के हो बाई....किसकी अनुमति से हमार गंवम ई तंबू लगाए रही।‘‘

‘‘आप कऊन बाबू जी?‘‘

‘‘मुखिया जी‘‘ कारिंदे एक साथ बोले। राजबाला ने हाथ जोड़ अभिवादन किया और बोली-

‘‘ मुखिया जी, अभी आ ही रही थी।‘‘

‘‘आ ही रही थी मतलब?‘‘

‘‘ई तम्बू कनात ठिकाने से लगाए के आतीन हुजूर...तनि तहदिलयाए कै। आप गांवकै माई बाप हौ आपसे बच कै कहाँ जाईब हुजूर‘‘

-देवी ठाकुर ने एक गहरी निंगाह डाली उस पर, नीचे से ऊपर तक देखा और फिर होंठ काटते हुए बोला-

‘‘कोई बात नाहीं बबुनी...लागत हय काफी खाद्य पानी से पगाई गई हव, चलौ अब तौ मुलाकात होतिन रही।‘‘ और बड़े दम्भी अंदाज में कदम उठाते ठाकुर वहाँ से चला गया।


गांव में उत्सव जैसा था। सबके अंदर दिन भर के काम जल्दी निबटा लेने की हड़बड़ी थी। शाम छः बजे राजबाला का तमाशा शुरू हो जाना था। उधर राजबाला के डेरे में जोरों पे तैयारी चल रही थी। एक रंग-बिरंगा, फूलों, गुम्मों से सजा, हुआ बड़ा सा मंच बना दिया गया था। जगह-जगह कृत्रिम फूलों की लड़ियां झूल रही थीं। पिछले हिस्से की दीवारनुमा ढाल पे सितारे चमक रहे थे। इन सितारों की एक खास उपयोगिता थी। जब मंच पर तमाशा शुरू होता तो इनकी आभा कलाकारों के चेहरों पर पड़ती जिससे उनकी सुंदरता में इजाफा होता। राजबाला की बांहें इन रंगों के संग एक-मेक होती रहतीं। शाम होते-होते उस मैदान में विशाल मजमा सा लग गया था। राजबाला निहाल हो गई थी। तमाशा शुरू हुआ। कलाकारों ने खूब रंग बिखेरां पब्लिक झूम उठी। उधर पहले ही दिन हजारों की आमदनी देख राजबाला के भी पंख लग गए थे।

इस समूह में मात्र आठ लोग थे। एक राजबाला, उसकी माँ, दस साल की बेटी। साथ में साथी मोहन, रवींद्र (तबलासाज) पीरू (बांसुरी वादक) सखी नसीमा और पल्लो। इस तमाशे का असली मालिक राजबाला का पति था लेकिन एक दुर्घना में उसकी मृत्यु के बाद यह जिम्मेदारी राजबाला पर आ गई थी। राजबाला बेहद सुंदर सांवली सी महिला। चेहरे पे भींगी सी छांह हर वक्त तैरती रहती। स्वर में मिठास। व्यवहार उतना ही आत्मीय। एक दिन वह औपचारिकतावश ठाकुर से मिल भी आई थी। ठाकुर का सारा गुस्सा हवा हो गया था।

खैर तमाशा अपने चरम पर थां बहुत अच्छी आमदनी हो रही थी। इसके अंतर्गत नित नई नाटिकाएं खेली जातीं। कभी शकुंतला, कभी हरिष्चंद्र तो कभी लैला-मंजनू या सोहनी-महिवाल।

उस दिन ठण्ड जल्दी ही जमीन पर उतर आई थी। जिस्म लरजता रहा ठण्ड की तुर्शी से। उस दिन तमाशा बंद था। राजबाला की बच्ची बहुत बीमार हो गई थी। भीड़ बटुरी तो लेकिन जब पता चला कि आज बंद रहेगा तो वापस लौट गई। सांझ के ठीक सात बजे डेरे में दया ठाकुर पधारे। राजबाला ने उन्हें अपने ही शयनगार में बुला लिया जहाँ वह बेटी की देख-भाल में लगी थी। ठाकुर आए तो उठ कर उनका अभिवादन किया और फिर आने का कारण पूछा। वह बैठते हुए बोले-

‘‘कुछ नहीं, बस हाल चाल लेने चले आए। सुना आज तमासा बद है।‘‘

‘‘हां ठाकुर जी, बेटी कुछ अस्वस्थ है, इसीलिए।‘‘

‘‘अरे, का हुआ बिटिया को?‘‘

‘‘कुछ खास नहीं, बुखार सर्दी, दवा दी है कल तक आराम हो जाएंगा, कल से तमासा अपने नियत समय पै लगैगा‘‘

‘‘अच्छा...अच्छा.,‘‘ फिर कुछ देर किन्हीं विचारों में गुम रहे और फिर बोले-

‘‘अच्छा सुनौ, हमैं कुछ कहिना हय‘‘

‘‘जी बतावा जाय‘‘

‘‘एक दिन मां तुम कत्ती आमदनी कय लेती हव?‘‘

‘‘ हूँ.....वही पांच, सात सै।‘‘

‘‘ठीक है ई लेव हमसे हजार रूप्या, बिटेवक इलाज करवाव‘‘

‘‘नाहीं ठाकुर जी, हमरे पास मल्लब भरेक पईसा है।‘‘

‘‘अरे नाहीं, लई लेव, तू हमरे गांव कै महिमान हव औ हमरा ई फर्ज है।‘‘

-राजबाला ने झिझकते हुए हाथ बढ़ाया कि ठाकुर साहब आगे बोले-

‘‘मगर तुमहौ का हमरी एक ख्वाहिस पूरी करैक पड़ी।‘‘

‘‘मतलब?‘‘ उसने हाथ पीछे समेट लिए।

‘‘तु सात सौ कमात हौ ई हजार रूपया, कल पण्डाल पूरा खाली रही और तू खाली हमरे लिहे नचिहव‘‘

राजबाला के चेहरे का रंग ही उड़ गया जैसे। अगले ही क्षण खुद को संभालती हुई बोली-

‘‘ठाकुर साहेब ई बात थोड़ी टेढ़ी है। ठाकुर साहेब, हम एक छोटी-मोटी कलाकार होई। ई तमासा हमार रोजगार आए कोनौ टेमपास नाहीं। औ हम सभै अपन पेसे का बहुतै सम्मान करित है। हमरा हर एक गाहक हमरे लिए सम्मानित है। हमरा तमासा बिकाऊ नाहीं ।‘‘ ठाकुर का चेहरा उतर गया। झेंप मिटाते हुए उसे दुत्कारते से बोले-

‘‘हुं...ह...काम नचनिया केर और सान रानीन अस‘‘

‘‘देखौ ठाकुर जी...हम कोई नचनिया वचनिया नाहीं। तमासा एक कला हय, ई भारतीय संसकृति कै हिस्सा हय। हम लोग अपनी कला बेचित हय, अपन सरीर नाही। अब आप जाव।‘‘

‘‘अरे...अरे...तू त बड़ा दर्सन बतियाय रही हय मनै...तू का कत्ता चाही....कत्ता चाही...रे‘‘ ठाकुर गमछा फटकारते बोले और खड़े होके उसकी ओर बढ़े, वह चिल्लाई-

‘‘ठाकुर जी, दूर से बात कीन जाए...नजदीके नाय आयो....

ठाकुर अपमान का घूंट पीते हुए बेशरमी से बोले-

‘‘ठीक हय, अपन ई टीम टामड़ा उठाव औ चलती बनव। सुबह देखी न ई तोरे डेरे मोड़े का, बड़ सति सवित्री बन कै आई हंय‘‘

और झल्लाते हुए ठाकुर बाहर चले गए।

ठाकुर के इस तरह कदम पटकते हुए बाहर निकलने से तमास के बाकी सदस्य समझ गए थे कि कुछ गड़बड़ हो गया है। गांव के आस पास घूम-टहल रहे लोग भी सशंकित हो कर देखने लगे थे। राजबाला स्वयं अंदर तक कांप गई थी। माँ बाहर से डरी-डरी आई और कुरेदने लगी-

‘‘कुछ समस्या हय का? काहे आए थे ठाकुर?‘‘

‘‘हमरे सरीर की बोली लगाने‘‘ राजबाला खेाई खोई सी बोली।

‘‘का...उकी अत्ती मजाल..?‘‘ वह सकते में बैठी रही। न खाना पीना कर सकी न ही रात भर नींद ही आई। एक भयावह संकट की कल्पना से वह कांप-कांप जाती। अंततः रात बीतते-बिताते वह किसी निर्णय पर पहुँची और सुबह का इंतजार करने लगी।

सुबह

अभी सूर्य पूरी तरह से उदय भी न हो पाया था कि वह मुँह पर पानी डाल के सीधे पूर्व सरपंच ठाकुर बलजीत सिंह की तरफ निकल ली। बलजीत सिंह रिष्ते में तो दया ठाकुर के भाई ही लगते थे लेकिन दोनों में छत्तीस का आंकड़ा था जिसकी वजह कुछ खानदानी थी और कुछ राजनीतिक। फिर भी गांव में उनका दबदबा आज भी था। उनके बेटे बड़े सरकारी ओहदे पर थे। उसका भी दबाव था। राजबाला ने उनसे सारी व्यथा कह सुनाई। उन्होंने राजबाला को अष्वासन दिया-

‘‘आप अपन तमासा निश्चिंत होई कै जारी राखौ, कोई माई का लाल नाहीं जो इमा बाधा डाल सकै।‘‘

राजबाला को बड़ा इत्मीनान हुआ। वह सुकून से चली आई और तमाशा अपने समय पे होता रहा। दया ठाकुर को बड़ी कोफ्त हुई कि उनकी धमकी का कहीं कोई असर ही नहीं। उन्होंने एक दिन अपने एक कारिंदे से चेतावनी भिजवाई कि फौरन गांव खाली कर दें। कारिंदे ने राजबाला के डेरे पर जा कर अपना संदेश कहा तो राजबाला ठनक कर बोली-

‘‘ठाकुर से कह दो तमासा नाही हटैंगा, ठाकुर बलजीत सिंह कै आदेस प अब हम तमासा चलाईब‘‘ कारिंदा चुपचाप लौट गया।

जवाब में कारिंदे ने आकर जब बताया कि तमाशा नहीं हटेगा अब वो ठाकुर बलजीत सिंह की छाया में है। दया ठाकुर जलबला गया और चिल्लाया-

‘‘चला जा हमारी नजर कै सामनेस।‘‘ उसे लगा था जैसे किसी ने तड़ा तड़ कई तमाचे जड़ दिए हों। फिर मन ही मन बुदबुदाया था-

‘‘अच्छा...तो ई बात है।‘‘ और उसने मन ही मन कोई निर्णय ले लिया। तमाशा अपनी पूरी रफ्तार में था। रोज ब रोज दर्षक बढ़ते ही जा रहे थे। आस पास के गांव से भी लोग खिंचे चले आते। एक छोटा सा मेला सा लगा रहता। रोज शाम को खोंचे वाले भी वहीं पहुँच जाते। गांव बेहद सजीला सा हो गया था। हर ओर राजपुर गांव के तमासे का बोलबाला था। सबकी जुबान पर राजबाला का नाम। महिलाएं राजबाला के जैसी पहन-होड़ और साज-श्रंगार करने लगी थीं। उनकी चाल-ढाल तक में राजबाला का सा पन झलकने लगा था। वहीं दया ठाकुर को किसी करवट चैन नहीं। रात-रात को उठ बैठता। सपनों में भी तमाचों की आवाज सुनाई पड़ती। अंततः उन्हें एक युक्ति सूझी-

अलस्सुबह ही दयाप्रधान की आँख खुल गइ्र्र। उठे। नित्यकर्म से फारिग होकर वह अपने मुनीम के घर की तरफ निकल गए। मुनीम चौंक पड़ा-

‘‘अरे...सरपंच जी। अत्ती सबेरे-सबेरे?‘‘

‘‘हाँ, जरूारी काम रहा। अंदर चलौ तनि, एक कागज तैयार करैक है‘‘

फिर दोनों जन अंदर आ गए। जो-जो बताया ठाकुर ने मुनीम लिखता गया और कागज पूरा कर वह उसे लेकर घर गए मोटर साईकिल उठाई और चल दिए। पास के गांव सरैंया गए और सरपंच से मिले। सरपंच भजन सिंह देखते ही चहका-

‘‘का हो ठाकुर, तुरे गंव्वम अत्ती रऊनक हय औ तू हिंया हुंवा टहरत हव, तनि हमहौ का एक दिन दिखाए देव तमासा।‘‘ मिली जुली हंसी। गाड़ी खड़ी करके दोनों लोग बैठक में चले आए। फिर दया ठाकुर ने अपनी बात शुरू की-

‘‘दद्दा, ई जऊन तमासा की बात करत हौ हम वहय मसला लई कै आए हन। दर असल ई तमास ठाकुर बलजीत सिंह कै कारनामा आए। ऊ अपन अईय्यासी मिटावैक खत्ती ई सब रास रचिस है। बड़ी गंध फईली है। गांव कै बहु बिटिया सभै बिगड़ी जाई रहीं। उमा तुमरैव गांव कै बहु बिटिया हैं औ हमरेव। गांव वाले अलगै सिकायत लगाय रहे। इससे अब सोंचा हय ई तमासा का तमासा खतम होएक चाही। लेकिन उमा ई बलजीत ठाकुर रोड़ा बन रहा। लेकिन आप लोन कै दबदबा आए। अगर हम पांच छः जनै कै सहमति होई गई तो ऊ ससुरा कुछौ नाय बिगाड़ पायी। बस ई करार पै साईन कई देव‘‘ और दया ठाकुर ने कागज उनके आगे कर दिया। भजन सिंह ने चुपचाप सुना। कुछ सोंचा फिर बोला-

‘‘बात तो तुम सही कहि रहे।‘‘ फिर कागज ले लिया और दया ठाकुर से कलम ले के हस्ताक्षर कर दिए। यही प्रक्रिया दया ठाकुर ने बाकी के आस-पास बसे गांवों के पांचों सरपंचों के वहां की।

शनिवार का दिन। सुबह काफी खिली-खिली और धोयी-धोयी सी। दया ठाकुर सुबह ही जाग गए। जैसे रात भर वह सुबह होने का ही इंतजार करते रहे हों। फिर सुबह होते ही तमासा के डेरे की तरफ बढ़ गए। राजबाल सामने ही दिख गई। वह बेटी के साथ षौच से निवृत्त होकर वापस आ रही थी। दया ठाकंुर उसके डेरे के बाहर ही ठहर गए। समीप आ कर उसने ठाकुर को अभिवादन किया-

‘‘नमस्कार....अऊर ठाकुर का हाल-चाल‘‘ वह सीधे सपाट लहजे में बोली-

‘‘हाल-चाल मनै ई कि अबही तक हमरे हुकुम की तामील नाय हुई। ई तमासा अभी तक काहे नाय हटावा गवा‘‘

‘‘आपका परेसानी का है इससे?‘‘

‘‘हमार बहू बेटिन का खतरा हय इससे, सब बिगड़ि रही है।‘‘

‘‘ठाकुर जी बहू बेटिन का खतरा हमसे नाय आपसे हय।‘‘

‘‘हे...जबान संभाल के...ई देख छः गंवन कै राजीनामा लाए हन, पढ़ ले। अब तो तुका गांव खालिन करैक पड़ी।‘‘ राजबाला ने उसे हाथ में लिया और अगले ही क्षण उसके कई टुकड़े कर दिए और उनकी तरफ बढ़ाती हुई बोली-

‘‘लेव अपन राजीनामा....‘‘ दया ठाकुर गुस्से से कांप रहा था। अपना अंगौछा झटका-

‘‘हुंह....अब होई आर पार कय लड़ाई।‘‘ कहते हुए वह पांव पटकते हुए चला गया।


राजबाला अंदर आ कर बैठ गई थी। उसने बाहर ठाकुर से धृष्टता तो कर ली थी लेकिन भीतर-भीतर सिहर गई थी। फिर धीरे-धीरे बात आई गई हो गईं। राजबाला को ठाकुर बलजीत सिंह से बहुत संबल मिला था। वह एक समझदार, सुलझे हुए और सज्जन व्यक्ति थे। गलत विचारों और गलत लोगों का न तो वह साथ देते और न ही उसे फलने-फूलने देते। पिछले कई साल से वह गांव के मुखिया रह चुके थे लेकिन इस बार चाल उल्टी चल के मुखिया की जगह दया ठाकुर ने ले ली थी। लेकिन इसके बावजूद जो दबदबा ठाकुर बलजीत सिंह का था वो दया ठाकुर का नहीं था। उनकी वजह से ही राजबाला निष्चिंत थाी। तमाशा अपने शबाब पर था। इसकी धूम दूर-दूर तक गांवों में थी। शाम को तमाम बैलगाड़ियां आ कर उस मैदान में फेल जातीं। दूसरे गांवों से गाड़ी भर-भर के लोग आते तमाशा देखने। इस प्रकार तमाशा अपनी जगह बरकरार था।



इतवार का दिन था। देवी ठाकुर ने आस पास के गांव के उन पाँचों प्रधानों को रात के खाने पर बुलाया था। पाँचों प्रधान मौजूद थे। रात आठ से दस के बीच खाना पीना हो गया था और पीने पिलाने का दौर जारी था। जब सब पी के टुन्न हो गए तो दया ठाकुर ने कहना शुरू किया-

‘‘दद्दा लोन, हम आप लोगन का हिंयां कौनव खास मकसद से बुलावा हय‘‘

‘‘अच्छा...तो बोलव‘‘ एक साथ ही कई स्वर उभरे।

‘‘दद्दा, ऊ का हम उई दिन आप लोगन सनी एक कागज प साईन करावा रहय।‘‘

‘‘हाँ....हाँ...ऊ तमासा वालीक निकारै खत्ती....का गई नाहीं अभीन?‘‘

‘‘कहाँ दद्दा, ऊ त आपौ लोन कै गारी निकारत हय। कहत है ठाकुर बलजीत सिंह कै आगे ऊ सबै की कऊन अऊकात‘‘

‘‘का....ऊ नचनियां अस बोलिस‘‘

‘‘अब त इका सबक सिखावैक परी‘‘

‘‘तो देरी काहे की, उठ लेव‘‘ देवी ठाकुर ने लोहा गर्म देख के उकसाया। कोई थोड़ा झिझका-

‘‘अभिन?‘‘

‘‘अऊक्का...अग्नि मैया जिन्दाबाद। चलौ दस मिनट मां काम तमाम होई जाई।‘‘ दया ठाकुर ने जोर दिया।

‘‘ठीक है चलौ, छमिया का निबटाईन आई।‘‘ और सभी छः जन चल पड़े डेरे की ओर।


रात के लगभग तीन बजे होगे। रात 12 बजे तक तमाशा चला था। एक बजे तक सारे कलाकार घोड़ा बेच के सो गए थे। थकान की वजह से सबको नींद भी जल्दी ही आ गई थी। रात तीन बजे के करीब अचानक राजबाला की बेटी के पेट मे कुछ गड़बड़ी महसूस हुई। वह दर्द से उठ गई और माँ को जगाने लगी। माँ गहरी नींद में थी। कुनमुना के रह गयी और कह दिया-

‘‘लल्लू को साथ ले जा‘‘ उसने लल्लू का पट्टा पकड़ा और बाहर निकल गई।

लेकिन जब बाहर निकली तो उसे पण्डाल के पीछे की ओर कुछ आहट सी महसूस हुई। वह कुछ ठिठकी। फिर कुछ सोच कर या षौच की हड़बड़ी में उसने पीछे जा कर देखा नहीं बल्कि सीधी गांव के उस छोर की तरफ निकल गई जिधर लोग षौच के लिए जाते थे। कुत्ते लल्लू को कुछ दूरी पर ही बैठा के वह खेत के बीच गुम हो गई। लेकिन अभी वह बैठी ही थी कि एक दम से उसे अपने डेरे की ओर से आग की लपटें उठती सी दिखीं। वह उल्टी-सीधी शरीर पर पानी डाल के भागी। एक हाथ में पानी का खाली डब्बा दूसरे में कुत्ते की रस्सी। तेजी से दौड़ती हुई आई और फिर कुछ फर्लांग पीछे ही ठिठक गई। पूरा पण्डाल आग से घिर चुका था। अंदर से चीखें आ रही थीं। सूर्या को कंपकंपी सी हो गई। ठंड के मौसम में भी वह पसीने से भींग रही थी। बदहवास सी देखे जा रही थी। सामने आठ आठ दस लोग खड़े जोर-जोर से हँसे जा रहे थे। उनमें वो व्यक्ति भी था जिसे लोग ठाकुर कहते थे और जो अक्सर उसकी माँ से भिड़ने आया करता था। उस आग के उजाले में उन दरिंदों के चेहरे साफ नजर आ रहे थे। उसका चेहरा आंसुओं से भीगता जा रहा था लेकिन आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं हो रही थी यह सोंच कर कि अभी उसका भी वही हस्र होगा। तभी कुत्ता रस्सी छुड़ा के भाग खड़ा हुआ और डेरे के पास आ के उछल-उछल कर भोंकने लगा। किसी ने कहा उनमें से कि-

‘‘सार, यहौ का किरिया करम कई देव, बडका स्वामी भक्त बनत हय‘‘ और किसी ने उसे पकड़ना चाहा, लेकिन कुत्ते ने उछल कर उसे दबोच लिया और पूरा चेहरे पर का मांस उतार कर तेजी से भाग खड़ा हुआ। यह दृष्य देख बच्ची की हिम्मत जवाब दे गई। बिना कुछ सोंचे समझे उसने डेरे की उल्टी दिशा की ओर बेतहाशा दौड़ लगा दी जिधर षौच के लिए गई थी। बिना यह जाने कि वह किधर जा रही है, वह दौड़ती जा रही थी जान छोड़ के। फिर दौड़ती गई जहाँ तक दौड़ पाई।



आज सुबह काफी कोहरा था। पूरा आस पास कोहरे में डूबा हुआ था। लोग बाग अभी जाग ही रहे थे। लेकिन जब तक दिन निकलता-निकलता गांव एक मनहूस गंथ से भर उठा था। तमाशे के डेरे के पास भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। लेकिन वहाँ तमाशे का कोई आदमी नहीं दिख रहा था केवल उनका मलबा दिख रहा था। पूरा डेरा राख का ढेर बन चुका था। पुलिस और गांव के लोग राख कुरेद-कुरेद लोगों की अस्थियां तलाश कर रहे थे। उनमें छोटे-छोटे बच्चे तक थे। गांव की महिलाएं जोर-जोर से कारन करके रो रही थीं जैसे कोई उनके घर का ही व्यक्ति चला गया हो। पुलिस ने इसे आकस्मिक दुर्घटना मान कर लाषों का पंचनामा किया और पूरा मलबा गाड़ी में भरवा के नहर में फिंकवा दिया। हांलांकि गांव वाले सब समझ रहे थे मगर ऐसे उद्दण्ड व्यक्ति के सामने किसी का साहस ही न हुआ कि चूं तक करे।


राजपुर से ही लगा हुआ ग्राम सेमरा था जहां लोग बाग अभी जागने-जागने को हो रहे थे। एक कच्चे रास्ते पर काला कुत्ता बैठा बड़ी देर से कूं-कूं कर रहा था। सुबह के चार बजे थे। तभी उधर से एक साईकिल चालक गुजरा और कुत्ते के पास पहुँच कर ठिठक गया। क्या देखता है कि कुत्ते के पास एक छोटी सी बच्ची भी बेहोश पड़ी है। उसने उसे फौरन उठाया और किसी तरफ छाया में ले जा कर जेब से माचिस निकाली और आस-पास से पत्ते इकट्ठा कर उन्हें सुलगा दिया। बच्ची को अपना कोट पहना दिया। उसके पैरों को रगड़ता रहा। कुछ देर बाद उस बच्ची की आँख खुली। वह सहमी सी इधर-उधर देख रही थी। जैसे कुछ तलाश रही हो। व्यक्ति ने सोंचा अभी उसकी मनःस्थिति काम नहीं कर रही है। उसने उसे साईकिल पर बिठाया और चल दिया। पीछे-पीछे कुत्ता भी। घर पहुँच कर व्यक्ति ने बच्ची की दवा दारू शुरू की और फिर धीरे-धीरे वह थोड़ा सामान्य हुई तब उस व्यक्ति ने पूछा उसके बारे में। बच्ची ने उसे पूरी सूरत-ए-हाल बता दी। सुन कर वह सन्न रह गया। उसने बच्ची को दिल से लगा लिया-

‘‘अब से तु हमारी औलाद।‘‘ कुत्ता कृतज्ञता से दुम हिलाते हुए कूं...कू...करने लगा।

सूर्या को अपने घर लिवा लाने वाला व्यक्ति एक किन्नर था। सेमरा गांव के हाट में फल-फ्रूट की दुकान लगा कर वह अपना जीवनयापन कर रहा था। उसे अच्छा लगा कि उसके उपेक्षित जीवन में एक फूल खिला है। अब सूर्या का वही घर था। घर में तीन सदस्य हो गए थे, वो किन्नर रंगी, सूर्या और कुत्ता लल्लू। धीरे-धीरे घाव भर गए थे। रंगी सूर्या को जान की तरह संभाल के रखता। पास के स्कूल में उसका दाखिला भी करवा दिया। वह नया परिवार पा कर धीरे-धीरे अतीत से उबर गई थी। मगर उसकी आँखों के सामने से वो दृष्य कभी न ओझल हो सका था। उसकी माँ का आग से लिपटा शरीर, नानी का रूदन और सभी साथियों की बेबस चीखें। फिर उन राक्षसी शैतानों का शैतानी अट्ठास। कभी-कभी वह नींद से जाग जाती और चीख पड़ती। वो आग उसके भीतर कभी ठण्डी नहीं पड़ी। वो आग हमेशा उसके सीने में दहकती रही थी जिसमें वह झुलसती रहती और खुद से कोई वादा करती रहती। धीरे-धीरे दिन व्यतीत हुए। सूर्या भी नए मौसम की तरह खिल गई थी। पढ़ाई में भी अव्वल। युवा अवस्था आते-आते अपनी पढ़ाई पूरी कर ली और उसने रंगी से फिर तमाशा शुरू करने की इच्छा जाहिर की। रंगी खुश हो गया-

‘‘जरूर...जरूर..., यह तुम्हारा पुस्तैनी पेसा भी है। अगर मेरे लायक कोई काम हो तो बताना मैं भी उसी में लग जाऊंगा।‘‘

‘‘ठीक है मामा‘‘ सूर्या ने रंगी के सहयोग से जल्दी ही एक टीम तैयार कर ली। कुछ पहले से अनुभवी तमाशे वालों को अपने साथा जोड़ लिया जिनका काम बंद पड़ा था। वे खुशी-खुशी जुड़ गए सोंचा सुंदर और युवा लड़की के बल पे तो तमाशा चल निकलेगा। इस प्रकार पूरा एक ग्रुप मुकम्मल हो कर तैयार हुआ ‘‘सूरजबाई का तमासा‘‘




10 साल बाद

ग्राम राजपुर। वही कुंवार का गुलाबी महीना। सांझ थोड़ी कालिमा लिए हुए धीमे-धीमे नीचे उतर रही थी। गांव के बाशिंदे यहाँ-वहाँ बैठक जमाए थे। बच्चे इधर-उधर भागम-भाग मचाए थे। घरों से चावल-दाल सीझने की और सब्जियां छौंकने की सोंधी सुगंध हवा में फैल रही थी। आकाश थोड़ा-थोड़ा सुर्खी लिए हुए था। तभी सयास बैलगाड़ियों का एक बड़ा सा काफिला मेन रोड से गांव के खलिहान की ओर मुड़ा। खलिहान वास्तव में गांव के मुख्यद्वार जैसा है। लोग चौंक पड़े। अचरज से देखने लगे। दस साल पूर्व जो दुर्घटना घटी थी उसके बाद गांव वालों ने कभी ऐसी कल्पना तक न की थी कि फिर कभी फूल, गुम्मों से सजा-धजा बैलगाड़ियों का काफिला उस गांव में प्रवेश करेगा। क्योंकि तमाशे, नौटंकी वालों के मन में तबसे इस गांव के प्रति बेहद नफरत और उपेक्षा भर गई थी। वे कभी इधर का रूख करना गवारा न समझते। लेकिन आज सयास ये चमत्कार हुआ तो लोगों के अंतस में फूल ही फूल खिल गए। समां आह्लादित हो उठा था। बच्चों ने लम्बी दौड़ मारी और काफिले के साथ हो लिए। बड़े लोग भी उधर ही लपक आए और पास आ के जायजा लेने लगे। सबसे आगे की गाड़ी पे पोस्टर लगा था जिसपे कुछ शब्द चमक रहे थे। उसी पे लटक रहे लाल छोटे बल्ब की गुलाबी रोशनी में पढ़ा गया-‘‘ सूरजबाई का तमासा‘‘

पढ़ते ही लोगों की बांछें खिल गईं। क्या स्त्री क्या पुरूष। सूर्यबाला की दूधिया बांह गांव वालों के अभिवादन में पर्दे के बाहर लहरा रही थीं और लोग गोरी चांदनी सी बांहें देख-देख मयूर हो रहे थे। चलते-चलते काफिला उसी गांव के उसी छोर पे जा पहुँचा। हालांकि अब वह मैदान काफी संकरा हो गया था पहले की अपेक्षा फिर भी जगह पर्याप्त थी। गाड़ी से उतरने के बाद सूर्यबाला ने सबसे पहले आँखें मूंद कर हाथ जोड़ के मन ही मन अपनी गुजरी हुई माँ और साथियों का स्मरण किया और फिर सारे लोग काम में लग गए। इसी बीच मुखिया के वहाँ खबर पहुँच गई थी। वह भागे-भागे आए और मैदान में आ के रूके। आवाज को काफी रोबीली बना के बोले-

‘‘कऊन हो...कहां से आए हौ तु लोन, किससे पूछ के आएव?‘‘ तभी पीछे से सूर्यबाला आई।

‘‘नमस्ते मुखिया जी। हमरा नाम है सूरजबाई औ ई हमरा तमासा। सूरजबाई का तमासा। आपसे अनुमति ले आइतेन रहा। बिना आपसे पूछै कुछ थोड़ै करेंगे।‘‘

‘‘त कब पुछतीव? तमासा सुरू होएक बादे ?‘‘

‘‘अरे ठाकुर जी, नाराज न हुआ जाए। हम सुना कि मुखिया जी बहुतै नरमदिल इंसान हंय त सोंचा अनुमति दईन देहंय। अत्ती उदारता त कयिन देहंय‘‘

दया ठाकुर थोड़े ढीले पड़ गए-

‘‘ठीक हय, हफ्ता भर से जादा न रूकेव‘‘

‘‘जईसी आकी इच्छा‘‘ दया ठाकुर ने एक गहरी निंगाह से सूर्यबाला के सौंदर्य को नीचे से ऊपर तक निरखा और क्षण भर को उनकी आँखों के सामने से वो अग्निदहन गुजर गया। वह बेचैन से हो गए और तुरंत वापस मुड़ गए।


तमाशा का पण्डाल सज गया था। पूरे राजपुर में धूम मची थी जैसे किसी पर्व पर होती है। लोग खूब उत्साहित थे। पहले षो से ही भीड़ उमड़ना शुरू हो गई। तिल रखने की भी जगह न बचती। हफ्ते भर बाद सूर्यबाला ने रंगी से दया ठाकुर को बुलवा भेजा। पहले तो ठाकुर को झिटका सा लगा-

‘‘ हैं उकी ई मजाल...हम उके नौकर हंय‘‘ मन ही मन बड़बड़ाए। फिर अगले क्षण सूर्यबाला की मनोहारी छवि उनके सामने घूम गई और वह ढीले पड़ गए-

‘‘ठीक है चलौ‘‘ और रंगी के साथ हो लिए। डेरे पे पहुँच के रंगी ने ठाकुर को सूर्यबाला के कोठरे में भेज दिया। सूर्यबाला एक अजब मुद्रा में पलंग पे लेटी हुई थी। ठाकुर के भीतर का पुरूश फनफना के उठ बैठा। आगे बढ़ते हुए थोड़ा सकुचाए तो सूर्यबाला ने हौसला दिया उठते हुए बोली-

‘‘आईए..आईए ठाकुर साहेब। माफ किहा जाई हम खुदै चल कै आतीन आपके पास मगर हम जैईसै निचले दर्जे की स्त्रियान का किसी सरीफ घर में जाना कहाँ उचित हय यही के वजह से आपका तकलीफ दिहा, आप इज्जतदार लोग‘‘

‘‘अरे नहीं, ई त एक कला आए। कऊनव बुरी चीज थोड़ै आए। हमार भारतीय संस्कृति कै पहिचान। हमसे कम इज्जत तू लोन कै थोड़ै हय।‘‘

‘‘ई त आपका बड़प्पन आए मुखिया जी। बतावा जाए का सेवा करी आपकी। जाम पियोगे हमरे हाथे से?‘ जैसे ठाकुर को नया जीवन सा मिल गया। सत्तावन की उमर में पच्चीस के हो गए। उससे लग कर बोले-

‘‘जाम तो का....तुरे हाथ से तो जहरौ पी लेब‘‘

उहौ पियाए देंगे ठाकुर साहेब.....तनि मउका त दिहा जाए हमका‘‘ कहते हुए सूर्यबाला ने बांई आँख दबाई। ठाकुर गदगद हो गए। आज उन्हें मानो स्वर्ग मिल गया था। अब वह कैसे भी सूर्यबाला को हथियाना चाह हे थे।

खैर कुछ देर बार वह चले गए। लेकिन ऐसा महसूस हो रहा था जैसे स्वर्ग से हो कर आए हों। अब वह आए दिन सूर्यबाला के डेरे पे खड़े रहते। एक से एक कीमती उपहार लाते। उन्हें सूर्यबाला की लत लग चुकी थी। वह सूर्यबाला को कई बार अपनी कोठी में आने का न्योता दे चुके थे। आखिर सूर्यबाला ने उन्हें इतवार का समय दे दिया।



ठाकुर बड़ी बेचैनी से चहलकदमी कर रहे थे बालकनी में। कोठी में आज अलग ही सुगंध फेली हुई थी। 57 साल के ठाकुर आज उत्साह और जोश से भरे हुए थे। शाम को छः बजे का समय दिया था सूर्यबाला ने। ठीक छः बजे कोठी के बाहर बैलगाड़ी रूकी। चांदनी रूप में सूर्यबाला बैलगाड़ी से छमर-छमर करती उतरीं। कोठी में संगीत सा भर गया। पीछे-पीछे रंगी। ठाकुर स्वागत में खड़े थे। सूर्यबाला को बड़े अदब से अपने अंतःपुर में ले गए और रंगी को किसी दूसरे कमरे में नौकर के साथ भेज दिया। ठाकुर का अंतःपुर किसी दुल्हन की तरह सजा था। बोले-

‘‘यही हमारा अंतःपुर है, पत्नी की मौत के बाद यहाँ आना ही बंद कर दिया था। आज तुमरे खत्ती मुद्दतों बाद इका फिर सजावा है। उम्मीद हय तुमहूं हमार सूनी उजड़ी जिंनगी सजाए देहेव‘‘

‘‘हमारा सौभाग्य ठाकुर जी। हमार जिंनगी तो बस तम्बू कनात मां ही बीती हय आज तक। लागत हय कहूं स्वर्ग मां आए गई हन‘‘ और फिर ठाकुर उसके बाजू में बैठते हुए बोले-

‘‘तुमरे जईसी सुंदर स्त्री आज तक कहूं नाय देखा‘‘

‘‘कईसे देखोगे ठाकुर...तुम लोग अच्छी स्त्रियन का जीयै कहाँ देते हो‘‘ वह कंटीली मुस्कान बिखेरती बोली तो ठाकुर सकपका गए जैसे। फिर बोली-

‘‘आज हमरे हाथों से जाम नाहीं पियोगे?‘‘

‘‘आज तुमरे हाथों से नहीं तुम्हारी आँख्खें से पिएंगे‘‘

‘‘हुँ...‘‘ वह हँसी। वह बोले-

‘‘पहले खाना खाते हंय‘‘

‘‘ठीक हय‘‘

वे एक तरफ लगी चैकी पर जा बैठे जिस पर खाना लगा हुआ था। खाना जल्दी खत्म करके सूर्यबाला मुखिया जी के लिए पैग बनाने लगी। दूसरे कोने पर जा के ब्लाउज के भीतर से दो पारदर्शी गोलियां निकालीं और उनके गिलास में डाल दीं। वे फौरन घुल गईं। उसने ला के ठाकुर को पकड़ा दिया। ठाकुर एक ही बार में पूरा गिलास उतार गए। अब वह बिस्तर पे आ कर बैठ गए थे। बगल में सूर्यबाला बैठी थी। अचानक उसने कहना शुरू किया-

‘‘ठाकुर....सुना हय हिंयां दस वर्ष पहिले भी कउनव तमासा लगा रहा। जऊन किसी साजिश कै चलते फूंक दिहा गवा रहा‘‘

‘‘हाँ, ऊ एक पापिन अऊरत थी‘‘

‘‘काहे...का अपनी कला बेच कै रोटी कमाना पाप था, ई तो भारतीय संस्कृति की पहिचान है। मान है।‘‘ ठाकुर ने चौंक कर देखा फिर लड़बड़ाते हुए बोले-

‘‘ई हमरे गले मां का होई रहा है...जुबान थोथी होत जाय रही‘‘

‘‘वहय होई रहा जऊन बहुत पहिलै होई जायक चाही रहा‘‘

‘‘मतलब?‘‘

‘‘ठाकुर हम वहय पापिन कय इकलौती संतान होई। तुमका याद होई उकै एक बिटिया भी रही सूर्यबाला, औ तुमका वहय रस्ता भेजै आई हन जऊन रस्ता प चल कै पापी जात हंय‘‘

‘‘न.....न....‘‘ ठाकुर की आवाज गले में ही फंस कर रह गई। बोल निकल ही नहीं रहे। जुबान तलुवे से ही चिपक कर रह गई। लड़खड़ाते से उठे और फिर से बिस्तर पर गिर पड़े। सूर्यबाला ने उनके चेहरे पर झुक कर कहा-

‘‘परेसान न होना। अभी तुमका मरने में चार-पांच घंटे लगेंगे। पापियन का मुक्ति अत्नी आसानी सै नहीं मिलती। बस तुम बोल नही पाओगे। हिल डुल नहीं पाओगे। बस चुपचाप लेटे-लेटे अपन मऊत से साक्षात्कार करौ औ मजे लेव‘‘ ठाकुर की आँखों में मजबूरी और बेबसी के आँसू भर आए थे। सूर्यबाला उन्हे देख के मुस्कुराई और बाहर आ गई।

सुबह पूरे गांव में खबर थाी ठाकुर को दिल का दौरा पड़ा और मौत हो गई।

दया ठाकुर का छोटा बेटा भानु ठाकुर प्रायः सूर्यबाला को चलते-फिरते भेंटा जाता और कुछ न कुछ बोल देता। हालांकि वह तमाशा देखने कभी न जाता। उस दिन जब वह रंगी के साथ हाट से वापस आ रही थी तो वह रास्ता रोक कर खड़ा हो गया था-

‘‘काहे हो मैडम....जवानी बर्बाद किहे हव। भरी जवानी मां एक हिजड़क साथे निभाय रही हौ। मरद मरि गए हंय का....‘‘ सूर्या ने उसे चीखते हुए थप्पड़ मारने को हाथा उठाया लेकिन रंगीं ने बीच में ही हाथ पकड़ लिया- ‘‘नहीं...नहीं बेटा जिसके पास जो होगा वही तो हमे देगा। लेकिन हमारे पास सबके लिए सम्मान है हम सम्मान देंगे।‘‘

सूर्यबाला ने दांत पीसते हुए कहा- ‘‘देख ले अपने संस्कार और एक हिजड़े के संस्कार।‘‘

भानू ठाकुर खीझ कर रह गया- ‘‘जाओ...जाओ...बड़ी हिरोईनी बनत हव, देख लयिब‘‘ और खिसियाया सा चला गया।



ठण्ड थोड़ी बढ़ गई थी। बर्फ की किरचियां फुहारें बन कर जमीन पर गिर रही थीं। रंगी सिर से पांव तक ढका हुआ साईकिल से सालेमपुर की तरफ बढ़ रहा जा था। करीब एक घण्टे बाद वह सालेमपुर पहुँचा। सालेमपुर के मुखिया लल्लन तिवारी अपने घर के बाहर ही बैठे लोगों के साथ अलाव जलाए बैठे थे। इधर-उधर कई चारपाईयां पड़ी थीं। रंगी ने उनके कान में कुछ कहा पास जा कर और वह उठ कर रंगी के साथ कुछ दूरी पर चले गए। तब रंगी ने उन्हें सूर्यबाला का संदेश कह सुनाया। वह सुन कर गदगद हो गए और बोले-

‘‘हाँ, हमहुं बड़ी धूम सुना हय तमासा की, सोंचा रहा ठण्ड थोड़ी हल्की होय तो हमहूं जायक ठहिल आई, मनै अब त जरूर आईब। सूरजबाई से कहि दिहा कि परसों साम कै हम पहुँच जाईब‘‘‘ फिर कहीं उतरते हुए से बोले थे-‘‘दस साल पहिलौ एक तमासा आवा रहा...खैर छोड़ौ‘‘

सूर्यबाला ने आज अपने डेरे में एक खास तैयारी की थी। सारा खाना अपने ही हाथों से बनाया था। पूरे डेरे में पकवानों की महक भरी पड़ी थी। आज सालेमपुर के मुखिया लल्लन तिवारी की दावत थी। शाम सात बजे मुखिया डेरे पर पहुँचे। तमाशा शुरू हो चुका था। सूर्यबाला ने आज अपना षो पहले ही कर लिया। मुखिया लल्लन तिवारी मुँह फाड़े देखते ही रह गए सूर्यबाला का नृत्य। मन ही मन निर्णय लिया अपने गांव में भी कुछ दिन के लिए तमासा बुलाएंगे। इसके बाद सूर्यबाला भीतर चली आई और तिवारी की मेहमान नवाजी की तैयारी करने लगी। लल्लन तिवारी अभी भी दर्षकों में बैठे मंत्रमुग्ध से बाकी कलाकारों का प्रदर्षन देख रहे थे। कुछ देर बार एक लड़का उन्हें बुलाने आया और सूर्यबाला के कोठरे तक छोड़ आया। सूर्यबाला ने खाना लगा दिया था। वह मुक्तकंठ से कभी सूर्यबाला के खाने की कभी उसकी तमाशा वाली प्रतिभा की तारीफ किए जा रहे थे। अंततः वह सूर्यबाला की मेहमान नवाजी से बेहद खुश हुए और तीन दिन बाद अपने घर में उसे खाने पर आने का निमंत्रण दे दिया। यह भी तय कर लिया कि इस गांव के बाद वह आपना अगला पड़ाव उनके गांव को बनाएगी। सुर्यबाला ने वादा किया। चलते-चलते उन्होंने उसका धन्यवाद अदा किया-

‘‘बहुत-बहुत धन्यवाद सूरजबाईं। तुरा तमासा देख, तुरे हाथ कै खाना खाएक हम धन्य होई गएन‘‘

‘‘आपका हमरे डेरप पधारेक बहुत बहुत धन्यवाद मुखिाया जी। फिर कभी सेवा कै मौका दिहा जाई‘‘

‘‘काहे नाय...काहे नाय...तु तो अब चढ़ि गई हव दिमाग प‘‘


सोमवार का सूर्य सूर्यबाला के लिए नई चुनौती ले कर आया था। वह बहुत उत्साहित थी। दिन भर तैयारी में बीता। शाम पाँच बजे वह सालेमपुर में थी। जिस समय मुखिया की हवेली पहुँची मुखिया बैठे शतरंज खेलने में मशरूफ थे। सूर्यबाला को देखते ही उनकी आँखें तर गईं-

‘‘आओ सूरजबाई....आओ...अऊर सब?‘‘

‘‘सब ठीक तिवारी जी।‘‘

‘‘जरा देर रूकैक पड़ी। ई चाल खतम होई जावै।‘‘

‘‘हम रूकी हन। आप आराम से निबटााओ। ई त हमार नसीब होय कि हम्का आपकी कोठीम आवैक सौभग मिला।

‘‘अरे नाहीं...‘‘ वह हँस के रह गए।

‘‘दरअसल, सतरंज होतेन अईसी चीज है। ई नाचीजौ इमा पारंगत हय‘‘

‘‘हैं...का कहत हव?‘‘ वह चौंके।

‘‘.......‘‘ वह बस मुस्कुरा भर दी उनको देखती हुई। और इसी निंगाह पर वह लुट गए। चहक पड़े-

‘‘वाह...तब तौ मजा आए जाई‘‘

और उत्सुकतावश उन्होंने साथ खेलने वाले नौकर को उठा दिया-

‘‘जाओ तू अब इनके खाने पीनेक इंतजाम करौ..‘‘

और वहां सूर्यबाला को बैठा दिया। रंगी वहीं बैठ कर उनका खेल देखता रहा। कुछ देर बाद नाष्ता पानी करवा के रंगी को नौकर के साथ दूसरे कमरे में भेज दिया। खेल पूरे शबाब पर था। सूर्यबाला उन्हें मात पर मात दे रही थी। वह चकित से बोले-

‘‘तू त मात पै मात दै रही हव।‘‘ सूर्यबाला ने एक गहरी मुस्कान के साथ उनकी तरफ देखा और बोली-

‘‘मात ही दे तौ आई हन मुखिया जी‘‘ वह ठठा कर बोले-

‘‘तुमसे मात खावा भी कोई जीत से कम थोड़ै हय सूरज बाई, हम त वहय दिन सब कुछ हार गए रहन, तबसे हमका नींदै कहाँ आई‘‘

‘‘कोई बात नाहीं, आज अईसी नींद सुलाईब कि आपका स्वर्गै स्वरग नजर आई।‘‘ और मुखिया जी घायल हो गए। उसका हाथा पकड़ कर बेचैनी से बेाले-

‘‘अब छोडौ ई बाजी, चलौ हमका सोवाईन देव। अईसा सोवाव कि कभौ नींद न खुलै।‘‘ और बाईं आँख दबा दी। आठ बज चुके थे। आखिर खाने की बारी आई। मुखिया ने खाना कमरे में ही मंगवा लिया। दारू की बोतलें भी मंगवा लीं। हलांकि सूर्यबाला ने बताया कि वह दारू नहीं पीती तो मुखिया ने आँख मारते हुए कहा था-

‘‘पीती नहीं ना...पिलाय तो सकती हव‘‘

‘‘बिल्कुल‘‘ खाने के बाद मुखिया बेड पर गाव तकिए के सहारे टेक लगा के बैठ गए। और बोले-

‘‘हाँ भई त अब तनि पियै पियावैक कारिकरम सुरू किहा जावै।‘‘

सूर्यबाला उठ कर उस टेबिल के पास गई और पैग बना लाई। मुखिया उसके हाथ से गिलास लेते हुए बोले-

‘‘वईसै इकी जादा जरूरत नाई हय। तुम खुदै नसा से भरी हव। यकीन मानौ कि ई बूढ़ी हड्डियन मां जवानी दऊड़ गई हय।‘‘

सूर्यबाला मुस्कुरा दी और उनके हाथों से गिलास ले कर खुद ही उनके होंडों से लगा दिया। वह गट-गट पीते गए और फिर तीन बार में उन्होंने गिलास खाली कर दिया। फिर सूर्यबाला उनके बाजू में अधलेटी सी होती हुई बोली-

‘‘मुखिया जी, सुनाई पड़ा है कि करीब दस साल पहिलेव राजपुर मां कोई तमासा आवा रहा।‘‘

‘‘हाँ..लेकिन उका देखैक साईत नाहीं आईं। दया सार हुंवा अगजनी करवाय दिहिस। हमहूं लोन का उकै पाप कै भागीदार बनाय दिहिस‘‘

‘‘तुम काहे सामिल रहौ‘‘

‘‘हमका मलूम कहाँ रहा उकै मंसूबा। हम लोन का रात कै खानेप बुलाईस। खूबै दारू पियाय दिहिस। फिर जानै कऊन पट्टी पढाई दिहिस। हम लोन त तमासा देखै के इच्छुक रहन, मगर दया कै मंसूबै अलग रहा। हम लोग का ठाकुर बलजीत सिंह औ उ तमासे वाली के बारेम खूब कान भरि दिहिस। हम लोन दारूक झोंक मां जऊन कहिस ऊ करत गएन। बाद मां बड़ा पछतावा हुआ। सुना बलजीत सिंह नाहीं, बल्कि वहैक नियत खराब रहा तमासेवाली खाती। तमासावाली कै दस साल कै बिटियौ रहा। उ बखत सही निर्णय नाय लई सकेन, का बताई।‘‘

‘‘तब त तुमका मुखिया कै पद से इस्तीफा दई देक चाही। लेकि अत्ती बड़ी दुर्घटना कै अंजाम दई कै बादौ तू मुखिया की कुर्सी प बरकरार रहेव। अईसे अदमी का त ई पद सोभा नाही दई रहा जो अत्ता संवेदनहीन होय औ हत्या जईसे अपराध का साझीदार होय।‘‘

मुखिया ने सूर्यबाला की बात अनसुनी कर दी और आँख मिचमिचाता हुआ कुछ थम के बोला-

‘‘लागत हय दारू जादा चढ़ गई। बोला नाय जाय रहा।‘‘

‘‘तिवारी, असल मा तुम सही समय प सही निर्णय नाय लय सकेव त सही निर्णय हमका लेक पड़ा।‘‘

‘‘का मतलब?‘‘

‘‘मतलब ई कि जऊन आदमी सही समय प सही निर्णय ना लई सकै उका जीवैक कोई अधिकार नाहीं। अब तू बहुत जी लिहेव। तुम जऊन तमासावाली कै दस साल की बिटियक बात करत हौ ऊ बिटिया आज तुमरे सामने खड़ी हय अपन माई कै प्रतिसोध ले के खत्ती। जिंदगी अत्ती सस्ती नाहीं होत ही तिवारी ई अभै तुमका पता चली। अब हम चलित हय‘‘

‘‘म....त.....लब...?‘‘ तिवारी से बोला नहीं जा रहा था। वह भय से कांप रहा था। सूर्यबाला के सामने हाथ जोड़ दिए लेकिन कुछ कह नहीं सका।

‘‘मतलब अब तू कुछै घण्टन कै मेहमान हौ। जईसै वै लोग तड़प-तड़प कै मरे तुमहौ अपने आपका मरत देखौ।‘‘

‘‘ना....हीं....‘‘ तिवारी की आवाज गले में ही अटक गई और वह निढाल हो कर बिस्तर पर गिर पड़ा। वह तेजी से बाहर निकल गई। गांव पूरा कोहरे में सोया पड़ा था। हाथ को हाथ नहीं सूझ रहे थे। वह बैलगाड़ी तक पहुँची। रंगी सो गया था उसी में। उसे जगाया और फिर चल दी बैलगाड़ी।

इसी तरह पाँच दरिंदों को वह गहरी नींद सुला चुकी थी। जिनमें मल्हीपुर का प्रधान राजेश वर्मा, गोपीगंज का पूर्व प्रधान रनबीर उपाध्याय और चंदनपुर का पूर्व प्रधान मनप्रीत सिंह थे।

अगले दिन वह पैदल ही हाट से अकेली आ रही थी कि भानु ठाकुर टकरा गया था-

‘‘का हो विश-सुंदरी, एक बात पूछैं?

वह ठिठक कर रूक गई-

‘‘का बात हय‘‘?

‘‘अईसा कऊन सा जहर लिहे घूमत हव कि जहाँ जात हव डस लेत हव?‘‘

‘‘जिंदगी से बड़ा जहर का होत हय ठाकुर?‘‘

‘‘त हमहुक पियाय देव एक प्याला, मुक्ति दियाय देव ई जिंदगी कै जहर से‘‘

‘‘मतलब?‘‘ वह जैसे चकरा गई।

‘‘ कुछ नाहीं, जाओ..‘‘ वह ठठा कर हँस पड़ा और आगे बढ़ गया। वह भीतर तक हिल गई थी। कान में भानू ठाकुर की आवाज गूंज रही थी। उसके ठहाके बड़े भयावह लग रहे थे। वह अच्छे बुरे डेरे पर पहुँची और अपने कोठरे में जा कर ढेर हो गई। रंगी ने पुकारा वहीं से-

‘‘क्या बात?‘‘ और उसने सारी बात उसे बताई। सब सुन कर वह बोला-

‘‘ठीक है, हिम्मत और धैर्य से काम लो। ई आखिरी काम निबटाय लेव और फिर एक दो दिन में निकल चलते हैं, और रंगी उसके सिर पे हाथ फेर बाहर निकल गया।


सायं काफी तुर्शी लिए हुए थी। बदन कंकपा रहे थे उसके बावजूद तमाशे के बाहर मजमा लगा था। पब्लिक की काफी डिमांड पर आज लैला-मंजनू का नाटक खेला जाना था। सभी कलाकार भी काफी उत्साहित थे, लेकिन सूर्यबाला के चेहरे पर कोई उत्साह नहीं दिख रहा था। वह कोठरे में अकेली बैठी थी चुपचाप। तभी रंगी भीतर आ कर देखा तो ठिठक गया-

‘‘अरे...अभी तैयार नहीं हुईं? बाहर भीड़ जमा हो चुकी है।‘‘

‘‘बाबा, अब जी उक्तावै लगा है ई जिंदगी से‘‘

‘‘अरे...परेशानी की का बात है, तूने 90 परसेंट कामयाबी पाए ली है। अब छठवें का भी किनारे लगा दे और फिर चले चलते हैं वापस, हमरा मन भी काफी उक्ताए गवा है हिंया से‘‘

‘‘हाँ, अब इस काम से भी मन घबराए गया है बाबा। इसको भी छोड़ना है।‘‘

‘‘ई सब देखा जाएगा, फिलहाल अपने लक्ष्य पे घ्यान देव‘‘



लैला मंजनूं की धूम कई दिनों तक रही थी। दूर-दूर के गांवों में भी इसकी बहुत चर्चा थी। इसी शोर की डोर थामें सूर्यबाला ने रंगी को लालपुर के पूर्व मुखिया बब्बन सिंह के पास भेजा। रंगी ने पहुँचते ही बबबन सिहं को उसका संदेश सुना दिया था-

‘‘मुखिया जी हम तमासा से आए हंय‘‘

‘‘ अच्छा चर्चा तो बड़ी सुना हय तमासा की। हमरे गांव से भी तमाम लोग रोज जात हंय देखै, सुना, कलिहा लैला मजनू खेला गवा रहा।‘‘

‘‘हां...वही तो, असल मां मुखिया जी गांव वालेन की बहुतै डिमांड पर हम लोग ई नाटक दुबारा खैलै जाईत हय। वहव आपके सम्मान मां। हमार मालकिन कै ख्वाहिस हय कि अबकी बार आपौ आवा जाए नाटक देखैं।‘‘

‘‘काहे नाय...काहे नाय...बिल्कुल‘‘ मुखिया बब्बन सिंह गदगद हो गए।

जहाँ तमाशे की पूरे गांव में धूम थी वहीं निरंतर हो रही इन मौतों से गांव के कुछ वयो वृद्ध लो खास चिंतित थे। यद्यपि दया ठाकुर के बड़े बेटे रानू ठाकुर ने एक दो बार तमाशे को लेकर कुछ षंका जताई थी। इसी को लेकर उसने गांव के कुछ जिम्मेदार लोगों की एक बैठक बुलाई थी। शाम का समय था। सुरमई स्याही फजां में घुल गई थी। दया ठाकुर के बंगले में रानू ठाकुर, दूसरे नंबर का लड़का बाबू ठाकुर और सबसे छोटा लड़का भानू ठाकुर मौजूद थे। कुछ गांव के वयोवृद्ध लोग थे पांच-छः लोग। रानू ठाकुर ने बोलना शुरू किया-

‘‘...चाचा लोन, हम ई बईठक एक जरूरी सल्लाह मसौरा के खत्ती बुलावा है। आप लोन एक बात प ध्यान दिहे होईहौ..कि जबसे ई तमासा गंवम आवा है कई मौतैं होई गई हैं औ होतिन जाए रही हैं। हमार बाबू चले गए, हम लोन दुर्घटना मान लिहेन। लेकिन उकै बादौ आसौ पास केर गांव मां मउत रूक नाय रही। त हमका लागत हय ई तमासा केर पीछे कउनव साजिस रची जाय रही है।‘‘

लोगों ने हां में हां मिलाई। साठ वर्षीय पटेसर बोले-

‘‘बात त सोंचै वाली है। बिचारेक चाही...‘‘ कि भानू ठाकुर भन्ना गया-

‘‘का बिचारेक चाही पटेसर काका। ऊ अउरत जात औ ऊ हिजड़ा का साजिस करी...ऊ जउन मरे त अपन मउत मरे। बूढ़ होई गए रहे आज न तो कलिहा मरिबै करत।‘‘

‘‘...अच्छा...हो....तो का सभै का आगेन पीछेन मरेक रहा बलजीत ठाकुर नाय मरि गए..वहौ त नब्बे पार करै वाले हंय।‘‘ बाबू ठाकुर ने अपनी बात रखी। भानू ठाकुर ने अपना तर्क दिया-

‘‘..त उका का करिहव, जिंदगी मउत कहूं अपने हाथे हय। उ नेक अदमी हंय, भगवान उनका नाय बुलाय रहे त जाओ भगवानेस पूछौ।....औ एक बात सुन लेव....इतिहास दोहरावैक कोसिस न किहेव...दया ठाकुर केर जमाना गवा....‘‘

रानू ठाकुर, बाबू ठाकुर बगलें झांकने लगे। बैठक में आए लोग भी सिटपिटा गए और एक दूसरे का मुँह तकने लगे फिर रानू ठाकुर को सलाम बजाते वहाँ से कम हो लिए। औरे बाहर आ कर भानू ठाकुर की ही बात पर मुहर लगा दी क्योंकि रानू ठाकुर और बाबू ठाकुर के चाल चलन अपने पिता से कुछ कम नहीं थे इसलिए बैठक में आए लोगों ने उनके तर्कों को इतर कर भानू ठाकुर की बात को अधिक महत्व दिया और ‘‘..मरैं सार....का करैक है हमका तुमका...‘‘ कहते हुए अपने-अपने रस्ते हो लिए।




सूर्यबाला पीपल के नीचे अपने डेरे से कुछ दूरी पर अकेली गुमसुम सी बैठी थी। तभी कोई बाजू में आ कर बैठ गया। उसने घूम कर देखा। भानू था। फिर इधर मुँह घुमा लिया। वह मुस्कुरा दिया-

‘‘काहे हो विष-सुंदरी, हम अतना बुरे लगीत हय?‘‘

‘‘तुमरेम अच्छी बात का हय?‘‘ वह कुछ नहीं बोला। कुछ देर बैठा इधर-उधर देखता बोला-

‘‘नहीं अच्छा लग रहा तो चले जाते हैं‘‘

‘‘हम काहे कही, तुमरा गांव तुमरी जगह‘‘

‘‘लेकिन गांव मां बोल बाला तो तुमरै हय आज कल, हर ओर सूरजबाई सूरजबाई....‘‘

‘‘तुम तो साईत कभी देखै नाहीं आते‘‘

‘‘तुमका कईसे मालूम हम देखने नहीं आते।.....वईसे ई सही है, हम देखने नहीं आते। सोंचा बहुत बार। लेकिन उधर का रूख करतेन एक हूक सी उठत है दिल मां‘‘

‘‘काहे...अईसा का?‘‘

‘‘तुमका मालूम होईहय, दस साल पहिलेव हिंयां एक तमासा आवा रहा। मगर कुछ बड़ा लोगन कै बदनियति का सिकार होई गवा। एक दिन रातौ रात उका फूंक दिहा गवा। उमा बड़े सज्जन लोग रहा। उकै मालकिन राजबाला बड़ी सीधी सरल औ मिलनसार रही। मगर....उके एक दस बारह साल कै बेटिव रहा। ऊ वखत हमरिव उमर 13 14 के आस पास रहा। छोटा मोटा अभिनय वहव करत रही। हम खाली उकै देखे खत्ती आईत रहा तमासा मां। तमासा कै बादौ उकै डेरा के आस पास मंडरावा करी। एक दिन स्कूल मां जब दोस्तन से चर्चा किहा त ऊ लोग बताई तुमका तो पियार होई गवा हय। अऊर मह आसमान मां उड़ै लगेन। सुना कि प्रेम की सुरूआत फूल दई कै की जात है। हम स्कूल की क्यारी से एक फूल तोड़ा औ बस्तेम रख लाएन। सोंचा सुबह स्कूल जातेम उका देंगे। डेरा हमारे स्कूल कै रस्तेन मा पड़त रहा। रात भर आँखन मां नींद नाय आई सोंच-सोंच कै कि फूल दे के वखत कईसा महसूस होई। ऊ कईसै लेगी हमरे हाथ से। कौनै जगह पर देना ठीक रही। यही उघेड़ बुन मां जानै कब नींद आई गई। औ जब सुबह उठेन तो जईसे पूरे गांव प मनहूसियत छाई रहा। जब बाहर निकलेन तो एक दोस्त दाऊड़ा आवा बताईस कि डेरा फुंक गवा। हम जान छोड़ कै उधर दऊड़ लगाए दिहा। देखा सब स्वाहा। हर तरफ राखी और जले भुने सामान। हम ऊ राख मां टटोल-टटोल ऊ नन्हीं परी का तलासा किहेन। सायद उका केाई नन्हां सा हाथ या पांव मिल जाए। उकी आँखैं मिल जाएं।‘‘ कहते-कहते वह सुबकने लगा। सूर्यबाला उधर मुँह किए बैठी थी। चेहरा आंसुओं से भींग चुका था। वह चेहरा पोंछते बोली-

‘‘ठीक हय, अब चली। सम्भालौ अपने आप का‘‘

‘‘लेकिन तुमरी आँखन मां आंसू..?‘‘ वह आंखें पोंछते बोला।

‘‘हमहू तो इंसान होई भानु ठाकुर। दूसरेन की व्यथा सुन कै आंखें भींगै जात हंय।‘‘

‘‘ठीक हय, आज जाने कऊन झोंक मे हम ई कहि गए। बुरा न मानना न तो किसी से कहना। बस हमरे दिल का बोझ आज बहुत हल्का होई गवा।‘‘ और जाने के लिए मुड़ गया।

सूर्यबाला डेरे पे आ कर जैसे ढह सी गई। जो कुछ सुन कर वह भानू से आई थी उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे किस तरह से ले। अचानक वो जगह-जगह पे छेड़ा छेड़ी करने वाला भानु उसके भीतर एक नजुक फूल बनके उगने लगा था। वह आँखें बंद किए लेटी थी और भानू जेहन में चलचित्र की तरह घूम रहा था। कोई सवाल सर उठाने लगा था-‘‘क्या बाता दूं भानू को सच्चाई?‘‘ कि कोई मुँह पर हाथ रख देता- ‘‘नहीं....नहीं...अभी तो वही काम करने का समय है जिसके लिए यहां आया गया है। भटकना नहीं है। ये प्यार मोहब्बत सिर्फ व्यक्ति को कमजोर बनाते हैं।‘‘ इसी उधेड़ बुन में वह सो गई।

उधर भानू को काफी राहत सी महसूस हुई थी। लेकिन वह सोच रहा था कि वह एकबारगी सब कैसे कहता चला गया उससे और क्यों। शायद इसलिए कि वह एक बोझ उठााए सालों से चल रहा था वो आज उसके सिर से हट गया था। लेकिन आज अचानक वो सारा समां बहुत याद आया था फिर एकदम से पिता का चेहरा सामने घूम गया था तो मन एक कसैलेपन से भर गया था। उस हादसे के कुछ दिन बाद ही धीरे-धीरे यह राज खुल गया था कि ये सब दया ठाकुर का किया धरा है और पूरा गांव का गांव उनसे नफरत करने लगा था। दबी जुबान में लोग कहते लेकिन कभी उसका विरोध कोई नहीं कर सका। यही नहीं उसका भव इतना था कि गांव में दूसरा कोई उसके मुकाबले चुनाव में खड़ा ही नहीं होता और वह निर्विरोध प्रधान चुन लिया जाता। इस प्रकार उसकी गद्दी बरकरार थी। लेकिन भानू पर जिस दिन यह राज खुला वह सन्न रह गया। उस दिन से वह पिता से गई हद तक नफरत करने लगा था और स्वयं हमेशा एक अपराध बोध से दबा रहा। उसको ये नहीं भूलता कि जिससे वह बेहद प्रेम करता था उसकी हत्या उसके पिता के हाथों हुई है और कसम खाता कि इस आदमी को कभी माफ नहीं करूंगा।

आज तमाशा काफी चमक-दमक लिए हुए था। लैला-मजनूं के नाम पर आस-पास के कई गांव उलझ पड़े थे। सुबह से ही टिकट लगा दिया गया था। फिर डेरे में बब्बन सिंह के आने की धूम अलग ही थी। बब्बन सिंह चार बजे ही पधार गए थे। डेरे में उनकी काफी आवभगत हुई। सूर्यबाला ने उन्हें बताया कि उसने आज उनके लिए आपने हाथों से रसोई बनाई है। वह खुशी से निहाल। रात भर तमाशा चला। रात तीन बजे खत्म हुआ। बब्बन सिंह काफी थक गए थे। वहीं डेरे में ही उनके सोने का बंदोबस्त कर दिया गया। सुबह वह जब घर जाने लगे तो सूर्यबाला से बोले थे-

‘‘रानी खुस कइ दिहेव, बहुत आनंद आवा। तुका बड़ा-बड़ा आभार। अब हमरी भी इच्छा सुन लेव। ‘‘

‘‘जी‘‘ सूर्यबाला ने हाथ जोड़ दिए।

‘‘ई इतवार कै हमरी झोंपड़ी कै सान बढ़ाओ, हम इंतजार करीब‘‘

‘‘जी जैसी आपकी आज्ञा‘‘

‘‘हम नौकर को भेजेंगे तुमका लिवाने। हुंआ से वापस भी वही लोग तुमका घर पहुँचाय जाएंगे।‘‘

‘‘ठीक है मुखिया जी।‘‘


दिन इतवार।

समय पाँच बजे। डेरे में बब्बन सिह के नौकर ने प्रवेश किया। सूर्यबाला ने उसे चाय पानी कराई फिर उसके साथ चल दी। बब्बन सिंह कोठी में अकेले ही रहते थे। बाकी एक नौकर और एक रसोईया। आज उन्होंने बहुत किस्म के व्यंजन बनवाए थे। शाम साढ़े छः तक सूर्यबाला को लेकर नौकर कोठी में पहुँचा। बब्बन सिह प्रतीक्षा ही कर रहे थे। उसे देखते ही खिल गए। कोठी काफी आलीशान थी। बब्बन सिंह उसे लेकर एक बहुत ही विशाल भीतरी हॉल में गए। कोठी की चकाचैंध देख कर सूर्यबाला के मन में हलचल सी उठ ही थी। वह हर तरफ आँखों फाड़े देख रही थी। तभी बब्बन सिंह एक थाल ले कर आए जो सोने और हीरों के गहनों से भरा हुआ था। उसकी तरफ बढ़ाते हुए बोले-

‘‘लो हमारी तरफ से भेंट।‘‘ उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। बब्बन सिह फिर बाहर चले गए और वह असमंजस की स्थिति में थाल थामे खड़ी ही रह गई। कहीं से आवाज आ रही थी-

‘‘देख यह कितना निछावर है तुझ पर और तू इसके लिए कितना जहर भर कर लाई है।‘‘ घड़ी भर को वह ढीली पड़ी कि तभी अन्य स्वर लहराया-

‘‘तेरी माँ और उन साथियों की जान के सामने इसकी क्या बिसात? फिर आदमी को अपने लक्ष्य से डगमगाना नहीं चाहिए। कुरुक्षेत्र में कोई मोहमाया नहीं, केवल युद्ध, नजर केवल मछली की आँख पर होनी चाहिए‘‘

उसे बल मिला। सम्भल कर बैठ गई। बब्बन सिंह वापस आ गए। वह उसकी गोद में सिर रख कर बोले-

‘‘आज हमारी कोठी फिर से दुल्हन बन गई।‘‘ वह अनमना सी गई। कुछ जवाब नहीं दिया। कुछ देर बाद वह बोले-

‘‘चलो खाना खाए लो फिर आराम करेंगे अउर साथ-साथ पियार भी करेंगे।‘‘ वह उठ कर बाहर गए और कुछ देर बाद वापस आए-

‘‘चलो खाना लागाए दिहा हय।‘‘ वह बाहर एक बड़े से हॉल में आई। डायनिंग टेबिल पर बिल्कुल शहरी अंदाज में खाना लगा हुआ था। उसे आश्चर्य था इस आदमी के पास इतनी दौलत आई कहाँ से। बाकी मुखियन की हालत तो इतनी अच्छी नहीं है। तभी उसने घ्यान दिया टेबिल पर और मुखिया से मुखातिब हुई-

‘‘अरे...मुखिया जी, दारू वारू तो हिंयां कहीं नाय दिखाई दे रही।‘‘ वह जोर से हँसे-

‘‘असल मां हम निरामिस होई। दारू मांस मछली कुछ नाहीं छुईत हय। हम बाभन होई त इका छूनै पाप समझित हय।‘‘

‘‘अच्छा....और पर-स्त्री को हाथ लगाना?‘‘ वह हो हो हँसे और झेंपते हुए बोले

‘‘तुमहौ का बहस लई कै बईठ गईव। चलौ खाना खाव टैम न खराब करौ।‘‘

‘‘नाहीं, ई बताव नाही पियै की कसम त नाय लिहे हव ना? कसम लिहे हव त कोई बात नहीं, बाकी रात कै नसा त तब चढ़त हय जब एक हाथ मां दारू औ दुसरे हाथ मां जोरू होय।‘‘

‘‘का कह रही हौ?‘‘

‘‘सही कह रही हन मुखिया जी। लागत हय तू बिल्कुल्लै अनाड़ी हव अउरत के मामलेम।‘‘ वह फिर झेंप गए। बोले-

‘‘कईसी बात...अभी लेव मंगाए दे रहें हंय। आज सारी कसम तोड़ देक हय।‘‘ और बाहर जा कर नौकर को शराब लाने दौड़ा दिया। 15 मिनट में दारू हाजिर। खाना शुरू हुआ। सूर्यबाला ने पैग बना लिए और एक खुद ले लिया और एक बब्बन सिंह की तरफ बढ़ा दिया। वह खाने के साथ-साथ ही दारू पीते जा रहे थे। कुछ ही देर में गिलास खाली हो गया। अब उनकी जुबां से अस्पष्ट शब्द निकल रहे थे। जुबां काफी मोटी हो गई थी। हाथ पांव षिथिल से पड़ने लगे। आदी नहीं थे इसलिए शराब भी असर कर रही थी। वह खुद बोले-

‘‘पहली बार दारू पिया है ना....तो असर जादा कई रही। सब हाथ पांव ढीले होए लगे हंय। अईसे मां का करि पईबै।‘‘

‘‘कोई बात नाय, कुछ घण्टेम सब ठीक होई जाई। आप स्वर्ग मां पहुँच जईहव‘‘

‘‘सच्ची?‘‘ वह गदगद हो गए।

‘‘हाँ मुखिया जी। ‘‘ फिर उसने अपनी रामकहानी छेड़ी थी-

‘‘का मुखिया जी, सुना दस साल पहिलेव राजपुर मां कोई तमासा आवा रहा।‘‘

‘‘हाँ, बाकी याद न दिलाव बड़ी पीड़ाजनक याद हय उसकी।‘‘

‘‘मतलब?‘‘

‘‘ई दया ठाकुर बड़ा हरामीपन किहिस। अपन खुन्नस निकारै खत्ती हम पाँच जनेन का अउर सामिल किहिस, हमार तो तमासा देखैक तमन्ना रहा। अउर ऊ दुसरै तमासा दिखाई दिहिस। ऊ अगजनी आजौ नाय भूलत हय, तमासा कै उ नायिका तुरेन जईसेी सुंदर रहा। हम देखा तो नाय रहा उका मगर अंदाजा लगाय लिहा रहा ई बात का, भलै उ आग मां लिपटी हुई इधर उधर भाग रही थी लेकिन वहुम उ नागिन कै जैसी मादक लागत रही।‘‘

‘‘तुमका लगा नाहीं कि उ सबका बचावैक चाही?‘‘

‘‘सही कहैं तो नाय लगा, काहेस कि हम पहिलै मन बनाए लिये थे इस दृष्य का, दुसरे दारू केर नसौ रहा, हमका तो जबरन पियाय दिहा गवा रहा दोस्ती यारी मां तो हमरेप त अउर चढ़ी रहा, जईसे आज तू पियार से पियाय दिहे हव अउर अब हमार जईसे जानै जाए रही हय अइ्रसे लागत हय।‘‘

‘‘मुखिया जी, अगर उ छहौ लोगन मा कोनौ का भी जमीर जाग गवा होता तो इतती बड़ी दुर्घटना घटने से बच जाती। मगर तुम पैसे के मद में चूर लोगन की नजर मां दूसरे की जान की कीमत कहाँ रहती। जब एक अउरत जान कै भीख मांग रही होत हय तो तुमका उके आग से लिपटे सरीर मां नागिन की मादकता नजर आवत हय।‘‘

‘‘अ...अरे...तू अत्ती उत्तेजित काहे होए जाए रही हव।‘‘

‘‘क्योंकि उ अउरत हमारी माँ थी।‘‘

‘‘क्....का...?‘‘ मुखिया के हाथ का निवाला बीच में ही रह गया। हाथ रूक गए। वह वैसे ही उठ गए हाथ धुला, पांव सनसना रहे थे, जुबान भी लड़खड़ाने लगी थी। बेडरूम की तरफ भागे और बेड पर जा के गिर पड़े। पीछे-पीछे वह-

‘‘मुखिया जी तुम्हें उ अउरत का सरीर बड़ा मादक लगा रहा न। उसको तो हिंया नहीं ला सकती मगर तुमका तो उसके पास पहुंँचाने का बंदोबस्त कर सकित रहा सो कई दिहा।‘‘

‘‘मतलब?‘‘

‘‘मतलब तुमसे कहा रहा न कि आज तुमका स्वर्ग पहुँचावैक हय। सो बिस्तरेप लेट कै यमराज की प्रतीक्षा करौ। आतेन होंईहंय।‘‘

मुखिया जी गला पकड़े पूरी ताकत से चिल्लाने की कोषिश कर रहे थे और उनकी आवाज खत्म होती जा रही थी। रात के दस बज चुके थे। उसने बाहर जा कर नौकर को बुलाया-

‘‘मुखिया जी जादा पी लिहिन हंय उ सोए रहे हंय। तुम हमका हमारे डेरे पर छोड़ आओ चलौ। अउर इका रक्खौ।‘‘ कहते हुए उसने वो गहनों वाला थाल उसे पकड़ा दिया। वह उसे हतप्रभ सा देखने लगा तो वह बोली-

‘‘लई लो बाबू, ई सब त घर मां रहय वाली अउरतन कै सिंगार हय। हमरा न घर न ठिकाना। आज हिंया डेरा कल हुंवां डेरा। बंजारन अईसी जिंदगी मां का साज सिंगार। कहूं चोरी वोरी होई जाई त अउरे बवाल। अपन सुरक्षा करीब कि इकै। रख लेव हमरी तरफ से भेंट। हाँ मुखिया जी का न बताएव न कोई अउर का।‘‘

जिस समय सूर्यबाला ने बब्बन सिंह के नौकर के साथ गांव में प्रवेश किया, भानू ठाकुर ने कहीं से उसे देख लिया और मन नही मन बुदबुदाया-

‘‘कल फिर कउनव खुसखबरी मिली‘‘

सुबह लालपुर में हर तरफ खबर थी कि मुखिया जी ज्यादा दारू पीने के कारण चल बसे।


डेरे में कदम रखते ही रंगी ने उसे गले से लगा लिया था-

‘‘शाबाश मेरी बेटी। मैं बहुत चिंतित था तू अकेली गई थी इसलिए।‘‘ वह थकी सी कोठरे में गई और निढाल सी बिस्तर पर पड़ रही। रंगी ने पानी दिया। आँखें बंद करेत-करते उसके अंतस में कई रंग के फूल खिलने लगे थे। भानू की छाया किसी घने पेड़ की तरह उसके ऊपर आ के टिक गई थी। एक अदद इमानदार छाया सबको चाहिए होती है। उसको भी दरकार थी। मगर कुछ सायों के नेपथ्य में भयावह सन्नाटे भी होते हैं, इसी बात से वह डर जाती। फिर भी मन गाहे बगाहे भानू की ओर भाग लेता। वह खुद समझ नही पा रही थी कि यह हो क्या रहा है। इसी उहापोह में गोतम-गोता होती उसे जाने कब नींद आ गई।


सुबह आठ बजे का समय। सूर्यबाला पूर्व मुखिया ठाकुर बलजीत सिंह के घर की तरफ बढ़ी जा रही थी। तभी दूर से भानू ने उसे देखा और चौंक पड़ा-

‘‘हे भगवान्....‘‘ उसने छुपते हुए उसका पीछा करने का इरादा किया। सूर्यबाला ठाकुर बलजीत सिंह की कोठी में जा कर रूकी। उनके नौकर से संदेश कहलाया। कुछ देर में वह आया और सूर्यबाला को भीतर भेज दिया। तभी भानू उसी नौकर के पास आया और उससे कुछ बात की और कुछ देन-लेन किया और उसकी शर्ट और गमछा अदला-बदली कर ली। तभी अंदर से आवाज आई-

‘‘हो नन्हें‘‘

‘‘जी बाबू जी‘‘

‘‘कुछ पानी वानी लाओ।‘‘ वह तेजी से रसोई में गया, फिर इधर-उधर टटोलता रहा जहां से कमरे पर नजर रखी जा सकती हो। उसे जगह मिल ही गई। वह मिठाई और पानी रसोई से लेकर दे आया फिर बाजू वाले कमरे में जा कर खिड़की से कान लगा कर बैठ गया। यह खिड़की ठाकुर साहब के कमरे में ही खुलती थी। वहीं बैठ गया। उधर से आवाजे ंसाफ आ रही थीं-

‘‘बाबू जी हमार नाम सूर्यबाला है। एक महीना से हमार तमासा हिंयां लगा है साईत सुने हो आप‘‘

‘‘अरे...‘‘ वह चौंक कर शांत हो गए। फिर लंबी सांस खेंचते बोले-‘‘ देखौ बेटा, हम तुमका यही राय देंगे कि तमासा हिंया से हटाय लेव। ई गांव इसके अनुकूल नहीं है। अभी तुम बच्ची हौ, भगवान की दया से सुंदर भी हौ। तुम्हारे लिए बहुत खतरे हैं हिंयां।‘‘ फिर कुछ देर षांत बैठे रहे, जैसे कुछ याद कर रहे हों फिर बोले-

‘‘दस साल पहिले भी हिंया एक तमासा आवा रहा। वहू बड़ी सुंदर, सुशील औ सभ्य महिला थी। बेचारी अपन कला बेच कै अपना परिवार पाल रही थी। दस-ग्यारह साल की छोटी बच्ची भी थी। मगर दुष्ट दया ठाकुर की नियत उके पर खराब थी। अभी हालेम मरा है। तो उकी मंसा ऊ महिला कामयाब नाए होए दिहिस, तो जऊन नाय गत किहिन उकी। पाँच-छः गांव के मुखिया सल्लाह कई के ऊ पूरा डेरै फूंक दिहिन। ऊ अबला का ई लोन जियै नाय दिहिन।‘‘ कहते-कहते उनकी आँखें भींग गईं। फिर कुछ संयत हो कर आगे बोले-

‘‘स्त्री की सुंदरतै उकी शत्रु बन जाती है, उकै लड़कै भी वईसेन उजड्ड। छोटा वाला सही है, भानू ठाकुर। जब समझदार हुआ चीजन का समझिस तो उहै दिन से घोषणा कई दिहिस कि ई संसार मां हमार बाप नाहीं, औ वही दिन से वह अपने पिता से नफरत करैक सुरू कई दिहिस‘‘ फिर कुछ देर खामोशी रही। फिर ठाकुर ही बोले-

‘‘बिटिया, भलाई यही मां है कि तुम अपन तमासा कहूं सरीफ गांव मां लई कै जाओ। हम 90 साल कै होई गए हन। अब हम दुनियौ से सरोकार खत्मै कयि दिहा है। अब इतना बल नाई हय कि हम तुम्हार कौनव सहायता कर सकी। बस सलाह दयि सकित हय कि ई दरिंदेन से दूर रहेक कोसिस करौ और ई गन्दे गांव मां एकौ क्षन न टिकौ‘‘ कह कर उन्होंने अपनी बात खत्म की। कुछ देर शान्ति रही फिर वह सन्नटा तोड़ते हुए बोली-

‘‘बाबू जी, हम कोई सहायता ले नाए आई हन आपसे। हमका सिर्फ आपकै आर्सीवाद चाही। बाकी एक खुलास्ता करना चाहीत हय आपसे कि ऊ जऊन तमासा वाली कै दस साल कै बिटिया रही, ऊ हमहिन होई।‘‘

‘‘अरे....?‘‘ उधर खिड़की के बाहर भानू के सिर पे बम फूटा-

‘‘हैं...!‘‘

‘‘जी बाबू जी, जिस वखत डेरा मा आग लगी हम सौच का गई रहन। रात तीन बजे के आस पास की बात है। हम निकलेन तो आस-पास कुछ लोगन कै आवाज तो सुना मगर कोई दिखाना नाय। सब पीछे की ओर रहे। एक मन मां आवा कि देखी लेकिन बाल मन, हमें सौच की जल्दी रहा, उधर निकल गएन। औ जईसेन खेत मां जाएक बईठेन डेरा की ओर से लपटैं उठती दिखाई दी। हमारे साथ हमार कुत्ता लल्लू भी रहा। हम उल्टे पांव भाग कै आएन तो देखा हमरा डेरा आग से घिरा हुआ हय। अम्मा, नानी अउर साथी सब चीख-चिल्लाए रहे। वहीं उ दरिंदे थोड़ी दूर प खड़े ठहाके लगाए रहे थे। हम झाड़ के पीछे खड़ी सब देखत रहिन, भय के मारे आगे नाय आएन बल्कि गांव कै उल्टी तरफ भागे लगिन। औ भागतीन गईन। सुबह दूसर गांव मां हम बेहोस पड़ी मिलिन एक हिजड़ा का। वहय हमका पालीन पोसिन। वहय हमरे माई बाप। अउर दस साल बाद हम हिंयां अपन अम्मा औ साथिन कै बदला ले आई रहन। हमरा तमासा एक महीनस हिंयां लागा हय और बाबू जी हम उ सबका ठिकानक लागाय दिहा जउन हमार अम्मा कै गूनहगार रहा। दया ठाकुर समेत। अब कल हमरी जवाई है बाबू जी। जावैस पहिलै हम आपकै आसीर्वाद चाहीत है।‘‘

‘‘साबास...बिटिया..., अइसै होएक चाही अउलादन कै। आज जी ठंडा कयि दिहेव। भगवान तुमरा साहस और सौर्य बरकरार राखै।‘‘

और उठ कर आलमारी खोली एक जोड़ी सोने के कड़े निकाले और उसकी तरफ बढ़ा दिये-

‘‘तुमरी बहादुरी का इनाम, आज हम तर गएन। ई सही होई गवा कि अपराधिन का देर सबेर उनके किहे का बदला ईष्वर दईन देत है। ई कंगन हमरी घरवाली कै होंय। उकी निसानी रहा। और तुमका हम अपनी सबसे कीमती चीज देक चाहित रहा। इससे कीमती हमरे पास कुछ नाहीं।‘‘

‘‘हमरे लिए सबसे कीमती आपका आशीर्वाद है बाबू जी।‘‘

‘‘इका हमरा आसीर्वादय समझौ‘‘ और उसके सिर पर स्नेह से हाथ फेर दिया। उधर भानू बैठा-बैठा सुबक रहा था। वह उठी और बाहर निकल आई और लम्बे-लम्बे डग भरती अपने डेरे की ओर बढ़ी जा रही थी। अभी वह कुछ दूर ही चली थी कि पीछे से एक स्वर कौंधा-

‘‘अरे हो विष सुंदरी, कब्बौ हमहौं क एक विश का पियाला पियाय देव, पियाला न सही एक घूंटै सही‘‘ सूर्यबाला धक से रह गई । झटके से पीछे मुड़ी और संभलती सी बोली-

‘‘का बात हय, काहे पीछे-पीछे फिरते रहिते हौ?‘‘

‘‘तुमसे अकेले मां एक बार बात करनी हय, हमका कोई टाईम देव। रात के अंधेरे मां नाहीं, दिन के उजारे मां‘‘

‘‘हम लोग कल जाए रहे हैं। डेरा उखाड़ रहे हैं।‘‘ वह मन को कठोर बनाती बोली।

‘‘एक दिन अउर ठहर जाओ, हमारे लिए ही सही, अत्ते दिन जिंदगी ले के खत्ती ठहरी थीं एक दिन जिंदगी देवै के खत्ती ठहर जाओ‘‘ उसकी बातें सुन कर वह सिहर सी गई। क्षण भर को भानू का चेहरा एक गहरी सेंक के साथ देखती रही, जैसे उसे अपने अंतस में उतार लेना चाहती हो। फिर संभालती सी बोली थी-

‘‘ठीक है, ठहर जाते हैं, कल सामने वाली अमराई मां चले आना‘‘

‘‘बहुत-बहुत धन्यवाद, हमें मालूम था तुम मना नाहीं कारेगी। टैम...?‘‘ उसने हाथ जोड़ते हुए पूछा।

‘‘वहय...इग्यारह बजे के करीब।

‘‘...बड़ी....मेहेरबानी......‘‘ उसने हाथ जोड़ दिए। वह मुड़ गई।


रात सूर्यबाला को जैसे नींद ही नहीं आ रही थी। वह बेचैनी में करवट बदले जा रही थी। अंदर से उसका जैसे गांव छोड़ने का भी मन नहीं हो रहा था। लगता था कहीं किसी खोह में जा के छुप जाए जहाँ उसे कोई देख न सके। जहाँ उसे कोई छू न सके। भानू की स्नेहिल छवि बार-बार उसे अपनी ओर खींचती। वह बेचैन हो उठती।

उधर भानू ठाकुर का हाल भी कुछ अलग नहीं था सूर्यबाला से। उसके मन में बार-बार यही बात कौंध रही थी कि वो यही भ्रम पाले बैठा रहा कि सूर्यबाला जीवित ही नहीं है। कितनी बड़ी भूल हो गई। बेचारी सारी जिंदगी अकेली ही संघर्ष करती रही। काश! पहले उसे पता चल गया होता। उसे भी वैसी ही बेचैनी थी। कब सुबह हो और वह सूर्यबाला से जा मिले।

सुबह के ग्यारह बजे थे। सूर्यबाला ने आज पहली बार मन से सिंगार किया था। कल जो बलजीत ठाकुर ने कंगन दिए थे उन्हें भी हाथों में डाल लिया था। रंगी ने कई बार उसे कनखी से देखा था और मन ही मन खुश हुआ था। जब वह पूरी तरह तैयार हो गयी तो रंगी ने बलाएं ली थीं-

‘‘आज तो हमारी रानी बिटिया गजबै लग रही है।‘‘

‘‘का बाबा...ऐसे तो रोज ही सजती हूँ,‘‘

‘‘उस सज्जा में और इस सज्जा में बहुत अंतर है लाडो, वो सिंगार तुम मंच के लिए करती थीं। यह सिंगार तुमने अपने लिए किया है। अपने लिए आदमी तभी सजता है जब उसकी आत्मा सजना चाहती है, जब उसके भीतर गुलाब खिल रहे होते हैं। तुम्हारा यह रूप अलौकिक है। दैवीय है‘‘

‘‘ई हमारी कामयाबी की खुसी का असर हय बाबा‘‘

‘‘वो तो है....मगर उसके सिवा कुछ और भी है।‘‘ कहते हुए उन्होने एक आँख दबाई और बोले-

‘‘जीती रहो....अब जहाँ जा रही हो जाओ, समय न खराब करौ...शाम को निकलना भी है। हम सब सामान रखवाते हैं।‘‘

वह मुस्काती सी बाहर निकल गई।



सुबह के ग्यारह बजे थे। भानु ठाकुर कबसे आ के बैठ गया था। मोबाईल पर इधर-उधर कर रहा था और बीच-बीच में टाईम भी देख लेता। ठीक ग्यारह बजे सूर्यबाला सामने से आती दिखी। उसने राहत की सांस ली। वर्ना संशय भी था कि आए या न आए। वह समीप आ कर बैठ गई। दोनों कुछ देर खामोश बैठे रहे। फिर भानू ने धीरे से कहा-

‘‘बुरा न मानेव....तू सुंदर तो हव, मगर आज कहीं जादा सुंदर लग रही हव।‘‘

वह हल्के से मुस्कुरा दी। लगा घण्टे भर सिंगार करना वसूल हो गया। फिर भानू ने एक लम्बी सांस ले कर आगे बोलना शुरू किया-

‘‘विश सुंदरी, हम तुमरे पै पहिलै दिन से नजर रक्खे हुए थे। लेकिन ये तब भी नहीं समझ पाये थे कि दया ठाकुर की हत्या तुमने करवाई होगी। हमें लगा था अचानक कभी भी मउत आए सकती है मउत का क? लेकिन जब एक के बाद एक मउत होए लागी तो हम गउर करेक सुरू किहा। अउर हम समझ गएन दाल मां कुछ काला है। अउर उ काला तुम कर रही हव।‘‘ वह चौंक क उसे देखने लगी। भानू आगे बोला-

‘‘लेकिन हम ई मान के चलते हैं कि अगर अउरत हत्यौ कै रही है तो उ हत्यौ इमानदारी से की गई हत्या हय। काहेस कि अउरत बच्चा जनती है। जउन धरती पे जीवन लाता है उ किसी का जीवन खतम कईसे कर सकता है। अउर अगर अईसा कर रहा है समझौ कहीं न कहीं उ गहरे आघात में जी रहा है। इन हत्तयन कै पीछे कोई इमानदार औ वजिब कारण होए सकता है। इसलिए न हम आपत्ति किहा और न कोई का करै दिहा। बस देख रहे रहंय कि तुमरे ई संहारक-कार्यक्रम की हद कहाँ तक हय। लेकिन जब कल सुना कि तुम वहय भोली परी हो जिकी प्रतिमा ध्यान मां बनाएक हम जिंदगी भर पूजा किहेन तो...

‘‘ककक...का...?‘‘ वह फिर चैंकी। तो वह मुस्कुरा कर सिर हिलाते बोला था-

‘‘हाँ, तुमरे अउर बलजीत ठाकुर के बीच हुई सारी वार्तालाप हम सुन लिहा रहय। तो यकीन मानो बहुत खुसी भयी। मगर दुःख भी। खुसी इस बात की कितुम संसार मां हौ। दुःख इस बात का कि तुम ई संसार मां अपना संघर्ष अकेलिन करती रहीं औ हम बदनसीब तुमरी याद मां कलपा तो किहेन मगर तुमरे ई संघर्ष मां साथ नाय दयि सके। हमरे रहते हुए तुम्हें सब कुछ अकेली सहिना पड़ा। हमें माफ कर देना‘‘

‘‘.......‘‘ बहुत देर तक एक चुप्पी आस-पास ठहलती रही। फिर वह बोला-

‘‘तुम कुछ नहीं कहोगी?‘‘ वह कुछ सोंचती सी एक लंबी सांस लेती बोली थी-

‘‘सिर्फ इतना कि यह धरती आज तक इसीलिए अपने स्वरूप मां टिकी हुई हय काहेस कि अभी तुम जईसे सज्जन लोग बरकरार हैं। इतना आग्रह है कि इस धरती प तुम जईसे लोगन की संख्या जादा होएक चाही।‘‘

‘‘बिल्कुल...‘‘ भानू ने हाथ जोड़ दिए। वह आगे बोली-

‘‘जहां तक हमरे संघर्ष की बात है तो इस संघर्ष के अंतिम दौर मां सबसे जादा साथ तुम्हीं दिहेव। तुम सबकुछ समझेक बादौ कभी हमरे खिलाफ नाए आवाज उठाएव। नहीं तो एक बार भी अगर गांव वालेन का इसारा कर देतेव कि- ‘‘दाल मां कुछ काला हय‘‘ तो सायद हमरा भी दस साल पहिलै वाला हस्र होत, सही पूछौ तो हम तुमसे बहुत डरे हुए रहिते रहयं। हमेसा ई मनावा करित रहा कि रस्तम तुम न भेंटाय जाव। हम अपनी मां कै प्रतिषोध लिहेम अगर कामयाब हुए हैं तो इमा सबसे बड़ा योगदान तुमरै हय। तुम ई जानत हुए भी कि तुमरे पिता की हत्या हम किहा ह,ै हमका माफ किहेव...इसके लिए बहुत बहुत आभार। तुमरा इ्र उपकार कभी न भूलेंगे।‘‘ कहते हुए उसने हाथ जोड़ दिए। उसकी आँखें भर आईं।

‘‘न....नहीं...‘‘ उसने कांपते हुए उसके जुड़े हुए हाथ थाम लिए अपने हाथों में।

‘‘नहीं विशसुंदरी...ई कर्ज रहा जो हमने अनजाने मां उतारने का परियास किया।‘‘

‘‘अब चलूं....?‘‘ वह कांपती आवाज में धीरे से हाथ खींचती हईु बोली।

‘‘ज्ज्जाओगी....?‘‘

‘‘जाएक तो पड़ी‘‘ और वह भरी आँखों उधर मुड़ गई। भानू वहीं सिर पकड़ के बैठा चुपचाप उसे जाता हुआ देखता रहा।



डेरे पर सामान पैक किया जा रहा था। सामने बड़ा सा पोस्टर खड़ा था। जिस पर लिखा था ‘सूरजबाई का तमशा‘,उसे एक लड़का फिर से रंग कर नया करने की तैयारी कर रहा था क्योंकि अगला तमाशा कहीं और लगाने की तैयारी थी। सूर्यबाला ने उससे रंगने का संमान लेकर उसे भीतर भेज दिया-

‘‘तुम जाओ, पोस्टर हम बनाएंगे।‘‘ वह चला गया।



शाम के छः बजे थे। सामान सारा पैक था। बैलगाड़ियों पर लादा जा रहा था। सारे गांव वाले इकट्ठा थे। औरतें रो रही थीं। जैसे किसी आत्मीय को विदा कर रही हों। सभी अपने-अपने वहांँ से कुछ-न-कुछ भेंट ले कर आ रहे थे। कुछ गल्ला राशन और कुछ पैसा वैसा। अंत में सभी गांव वालों से कलाकारों ने हाथ जोड़ कर अंतिम विदा ली। गांव का बच्चा-बच्चा वहाँ था। लेकिन सुर्यबाला की निंगाहंे भानू को तलाश रही थीं। काफी वक्त हो गया वह नहीं दिखा तो वह निराश हो गई। तभी रंगी ने कहा-

‘‘गांव वाले भाईयों बहनों, इस स्नेह और प्रेम के लिए बहुत-बहुत आभार। कभी संयोग रहा तो फिर आएंगे। अब हमें आज्ञा देव आप लोग।‘‘

और सबको चलने का संकेत किया। सभी बैलगाड़ियों में बैठ गए। काफिला धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।

अभी गांव के मुहाने, खलिहान के समीप रेला पहुँचा था कि सूर्यबाला ने दूर खड़ी आकृति को पहचान लिया-भानू? आगे की बैलगाड़ी पर तमाशे का बड़ा सा सतरंगी पोस्टर लहरा रहा था, जिस पर सुनहरे शब्द चमक रहे थे दूधिया बल्ब की रेशनी में। भानू ने दूर से ही पढ़ लिया-

‘‘विषसुंदरी उर्फ सूरजबाई का तमासा‘‘

‘‘अ...हह अररे‘‘ एक क्षण के भीतर उसके अंदर क्या-क्या घट गया। बैल गाड़ी करीब पहुँची। सूर्यबाला ने बाहर सिर निकाला, भानू लपक कर आ गया-

‘‘पोस्टर के लिए सुक्रिया, तुम तमासा का नामै बदल दिहेव....खतरनाक नाम है‘‘ और आगे एक गुलाब का फूल बढ़ा दिया।

‘‘तुमरे लिए खतरनाक नहीं है।‘‘ कहते हुए वह मुस्कुराई और भानू से फूल ले लिया। फिर दोनों ही तरफ से कुछ बोला ही न गया। आखिर कुछ देर बाद वही बोली-

‘‘चलूँ?‘‘

‘‘ह...हाँ...ल्...लेकिन जल्दी ही फिर आना। यह गांव तुम्हारा इंतजार करेगा।‘‘

सूर्यबाला ने मुस्कुरा कर पर्दा खींच दिया। गाड़ियों का काफिला धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया। सबसे आगे वाली बैलगाड़ी से पर्दे के बाहर दूर तक एक चाँदनी सी गोरी बांँह हवा में लहराती रही और भानू खलिहान के उस मोड़ पर तब खड़ा उस मरमरी लहराती बांह को देखता रहा जब तक वो कलछऊँ सांझ के धुंधलके में खो नहीं गई।

 

लेखक हुस्न तबस्सुम निहाँ – परिचय




जनम-08 जनवरी, रानी बाग, नानपारा जिला बहराईच, उत्तर प्रदेश।

पिता- श्री अनीस अहमद खां

माँ- श्रीमती हुस्न बानो


शिक्षा-

अंग्रेजी, हिंदी, समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर । स्त्री अध्ययन और गांधीयन थॅाट में पी0जी0 डिप्लोमा, एम0फिल0, वर्तमान समय में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र में शोधरत


सम्मान-

समाज रत्न, सरस्वती साहित्य सम्मान, महादेवी वर्मा स्मृति सम्मान, स्व0 हरि ठाकुर स्मृति सम्मान। विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा मानद उपाधि विद्यावाचस्पति (2011) से सम्मानित।

भारत एवं हिंदी प्रचारिणी सभा मोरशस द्वारा अंतरराष्ट्रीय सम्मान (2016) से सम्मानित।

अंतरराष्ट्रीय अवधी महोत्सव (नेपाल) में अंतरराष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित (2018)

कविता संग्रह-चाँद ब चाँद, शीला सिद्धांतकर स्मृति सम्मान (2014) द्वारा पुरस्कृत।

कहानी संग्रह-नीले पंखों वाली लड़कियाँ, स्पेनिन साहित्य गौरव पुरस्कार-(2014) से पुरस्कृत।

कहानी संग्रह- नर्गिस फिर नही आएगी , डॉ विजय मोहन सिंह स्मृति (प्रथम पुरस्कार) पुरस्कार--(2017)


प्रकाशन-

कविता संग्रह- मौसम भर याद, चाँद-ब-चाँद

कहानी संग्रह- नीले पँखों वाली लड़कियाँ,

नर्गिस फिर नहीं आएगी,

सुनैना! सुनो ना....

गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता

उपन्यास- फिरोजी आँधियाँ

कामनाओं के नशेमन

शोध पुस्तक- धार्मिक सह-अस्तित्व और सुफीवाद

सपादित पुस्तक-

कविताओं में राष्ट्रपिता

आदिवासी विमर्श के विभिन्न आयाम

‘‘साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे (विशेष संदर्भ: हुस्न तबस्सुम निंहाँ )‘‘लघु शोध प्रबंध सुश्री मंजू आर्या द्वारा प्रस्तुत।(स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र द्वारा)

सम्पर्क-महात्मा गांधी अंतरराष्ट्री य हिंदी विश्वा विद्यालय गांधी हिल्स वर्धा महाराष्ट्र

मो0-09415778595

09455448844,

ई-मेल-nihan073@gmail.com



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