• महेश चन्द्र द्विवेदी

प्रतिशोध

मैं एक प्रादेशिक स्तर के समाचार पत्र का इन्वेस्टीगेटिव जर्नलिस्ट (खोजी-पत्रकार) हूं. उस दिन प्रातः के ६ बज रहे थे, जब मैने कुनमुनाते हुए फोन को उठाया था. सम्पादक महोदय की आवाज़ सुनकर मेरी नींद पूर्णतः खुल गई थी. उन्होंने बिना किसी दुआ-सलाम के सीधे पूछा था कि मैने पुलिस में बढती अनुशासनहीनता का समाचार पढा.? मेरे ’न’ कहने पर वह बोले थे कि मैं तुरंत आज का यह समाचार पढ़कर उस थाने चला जाऊं, जहां एक सिपाही को बंदी बनाया गया है और उसकी अनुशासनहीनता के कारणों का पता लगाकर विस्तृत रिपोर्ट भेजूं. लगभग सभी समाचार पत्रों में उस दिन का शीर्ष समाचार था, "पुलिस बेलगाम-दीवान ने पुलिस उपाधीक्षक पर हमला किया और उनको गंदी-गंदी गाली दीं- एस.सी/एस.टी ऐक्ट में गिरफ़्तार". समाचार सचमुच सनसनी फैलाने वाला था क्योंकि पुलिस जैसे अनुशासित विभाग में किसी कनिष्ठ कर्मचारी द्वारा इतने उच्च पद पर आसीन अधिकारी पर हमला करना एवं गाली देना अनुशासन की गंभीर चिंताजनक स्थिति का द्योतक था. एक सप्ताह की अनवरत छानबीन के उपरांत जो तथ्य उभरे, उन पर आधारित रिपोर्ट मैने सम्पादक महोदय को प्रेषित कर दी, परंतु वह प्रकाशित नहीं हुई. उस समय के राजनैतिक माहौल में उसे प्रकाशित करना उन्हें राजनैतिक रूप से पत्र के हित में नहीं लगा होगा. आज जब राजनैतिक माहौल बदल चुका है, तब मैं उसे अन्य सम्पादकों को इस आशा से प्रेषित कर रहा हूं कि अब कोई न कोई तो इसे प्रकाशित करने का साहस दिखायेगा. मेरी रिपोर्ट निम्नांकित है-




"अंतर्मुखी स्वभाव के भूधर की आज पुलिस रिक्रूट ट्रेनिंग सेंटर की बैरक में पहली रात थी. रिक्रूट ट्रेनिंग सेंटर की वह बैरक काफ़ी पुरानी थी, और उसका लम्बा-चौड़ा आकार, बिना प्लास्टर की ईंटों की दीवालों पर पुता गेरुआ रंग और ऊंची छत पर समय की मार से काले होते खपरैल उसे भुतहा सा बना रहे थे. गांव में कच्ची मिट्टी के बने दड़बे जैसे मकान में रहने वाले भूधर को वह एक महल से कम नहीं लगी थी, परंतु बैरक की विशालता एवं प्राचीनता उसके मन को आश्वस्त करने के बजाय उसमें व्याप्त आशंकाओं एवं उद्विग्नता को बढ़ा रही थी. प्रातः ट्रेनिंग सेन्टर में पहुंचने के चार घंटे पश्चात ही उसे अन्य रंगरूटों के साथ परेड-ग्राउंड की सफ़ाई आदि के काम में लगा दिया गया था और सायं ६ बजे छोड़ा गया था. पुलिस संस्कृति में यह विश्वास व्याप्त है कि नये भर्ती हुए रंगरूटों से व्यवहार में एवं काम लेने में जितनी अधिक कठोरता दिखाई जायेगी, कालांतर में वे उतना अधिक आज्ञाकारी रहेंगे एवं सख़्त ड्यूटी करने से नहीं घबरायेंगे. आज भी आज्ञा को ठीक से न समझ पाने अथवा पालन में कोताही होने पर उस्ताद ने उसे अनेक बार डांटा-फटकारा था और छोटे-मोटे अपशब्द भी कहे थे. इससे उसका मन बड़ा खिन्न था और रुक-रुक कर नेत्रों में अश्रु भी भर आते थे.

‘भूधर, तुम तौ बड़ी जल्दी आय कें बैरक मैं जम गये!’- भूधर के सोने हेतु लगे तख्त के बगल के तख्त पर आकर खिलंदड़ी स्वभाव का रिक्रूट श्रीकुमार ऐसे बोला था जैसे भूधर के बचपन का दोस्त हो. इस आत्मीयता से भूधर आश्वस्त हुआ था और श्रीकुमार को उसकी अपनी कन्नौजी बोली में बोलते हुए सुनकर उसे अपनेपन का आभास भी हुआ था. श्रीकुमार को ध्यान से देखते हुए उसने कहा,

‘हां, थक गये हते.’ फिर कुछ रुककर पूछा था, ‘भैया, कहां के रहिबे बाले हौ?’

‘अपयें जिला के ही समझ लेउ. तुम इटाये के हौ, और हम कन्नौज के.’ - श्रीकुमार ने पहले ही बैरक में आकर अपने बगल के तख़्त वाले भूधर का नाम जानकर उसे अनुसूचित जाति की चयनित सूची में देख लिया था और उसके गांव व जिले का पता लगा लिया था.

फिर देर रात तक दोनों घरेलू बातें करते रहे थे और अप्रयास ही मित्र बन गये थे. यह मानव स्वभाव है कि अपने गांव अथवा नगर के वही व्यक्ति जिन्हें हम जानते तक नहीं हैं अथवा जानते हुए भी जिनसे हम दुआ-सलाम नहीं करते हैं, किसी अनजाने स्थान अथवा दुरूह परिस्थितियों में मिल जाने पर बड़े अपने लगने लगते हैं. प्रशिक्षण के दौरान सभी प्रशिक्षणार्थियों की दिनचर्या एक जैसी रहती है, और सभी के सामने प्रतिदिन अनेक ऐसे कठिन प्रकरण आते हैं, जिनसे साथ-साथ निपटने की दुरूहता उनमें प्रायः एकात्म-भाव स्थापित कर देती है. श्रीकुमार स्वभावतः हंसमुख था और सम्वेदनशील भी और दब्बू प्रकृति के भूधर को ऐसे ही साथी की आवश्यकता थी. वह श्रीकुमार पर विश्वास करने लगा था एवं उसमें अपनी समस्याओं के समाधान के लिये उस पर निर्भरता का भाव आ गया था. अतः दोनों की मित्रता दिनों-दिन प्रगाढ़ होती गई.

प्रशिक्षण की समाप्ति पर अंतिम परीक्षा में श्रीकुमार समस्त प्रशिक्षणार्थियों में द्वितीय स्थान पर रहा था. भूधर भी द्वितीय स्थान पर रहा था - परंतु नीचे से. बिछुड़ने का समय निकट आने पर एक दिन भूधर बोला, "यार, अबै लौ तौ संग संग अच्छी कट गई, अब देखौ तुम कहां जात हौ और हम कहां?"

श्रीकुमार को भी भूधर से बिछुड़ने का दुख था, पर अपने आशावादी स्वभाव के कारण वह बोला, ‘अरे यार, रहयैं तौ यू. पी. मैं ही, सो फिर मिलयैं और हुइ सकत है कि फिर कहूं संग-साथ पड़ जाय.’

पर तब दोनों के सुखद आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब जनपदीय ट्रेनिंग के लिये दोनो को बुलन्दशहर जनपद के देहात के एक ही थाना में नियुक्त कर दिया गया. देहात के थानों पर एक ही बैरक होती है, जिसमें अविवाहित एवं परिवार साथ न रखने वाले सिपाही रहते हैं. अतः यहां भी भूधर और श्रीकुमार को एक ही बैरक मिली. उनमें से जब भी कोई गश्त, पहरा, समन-तामीला, बदमाशों को पकड़ने आदि की थकान भरी ड्यूटी से वापस आता, तो मौका मिलते ही दूसरे को अपने नवीन अनुभव सुनाता. पुलिस की दिनचर्या के हाय-तौबा, गाली-गलौज और मारपीट के द्वारा उत्पन्न तनाव बहुत कुछ इन अनुभवों के आदान-प्रदान के दौरान विलुप्त हो जाते और फिर दोनों निश्चिंत होकर गहरी नींद में सो जाते. ट्रेनिंग के नियम के अनुसार दोनों को दिन भर में किए गये कार्यों का विवरण एक रजिस्टर में लिखना पड़ता. लिखा-पढ़ी में कमज़ोर होने के कारण भूधर इसमें बहुत कुछ श्रीकुमार की सहायता पर निर्भर रहता.


‘भूधर! कल से तुम मेरे साथ जीप पर चला करोगे.’ थानेदार बेनीराम दोहरे थाने के बीचोबीच बने चबूतरे, जो छप्पर से छाया हुआ था और थानेदार के कार्यालय-कक्ष के रूप में उपयोग में लाया जाता था, में बैठे हुए था. उसने वहीं से आदेश दिया. यद्यपि आदेश सामान्य सा था, परंतु इसमें दो असामान्य बातें छुपी हुईं थी - एक तो यह कि थानेदार के साथ चलने वाला सिपाही उनका विश्वासपात्र समझा जाने के कारण बड़ा पावरफ़ुल हो जाता है और उसका अन्य सब पर रुआब रहता है और दूसरी यह कि इतने अनुभवहीन सिपाही को शायद ही कभी किसी थानेदार ने अपना कारख़ास बनाया हो. अतः यह आदेश सुनकर अन्य उपस्थित पुलिस-जनों के कान खड़े हुए, परंतु कोई कुछ बोला नहीं. गश्त से लौटने पर सायंकाल जब श्रीकुमार को भूधर ने यह खबर सुनाई, तो वह भी बस एक फीकी सी मुस्कराहट ही अपने चेहरे पर ला सका, क्योंकि उसके मन में यह बात आये बिना न रह सकी कि दिन-रात गधे की तरह काम वह करता है, और थानेदार साहब ने कारखास बनाया भूधर को.

दूसरे दिन से भूधर थानेदार दोहरे के साथ जीप पर चलने लगा और श्रीकुमार वही अपनी पुरानी सायकिल पर. शनैः शनैः दोनों के स्तर का यह अंतर उनकी दिनचर्या, आय, रहन-सहन एवं अन्यों के प्रति दृष्टिकोण में भी आने लगा. मेहनत के एवं जोखिम भरे काम जैसे रात्रि-गश्त, बदमाशों की गिरफ़्तारी, मुकदमों की पैरवी, पहरा आदि श्रीकुमार को सौंपे जाते और भागी लड़कियों की बरामदगी, चोरी किए जानवरों की फिरौती, मद्य-सम्बंधी प्रकरणों की जांच, ट्रकों की चेकिंग जैसे कमाऊ कार्य भूधर को सौंपे जाते. थाने में आने वाले लोगों को अब थानेदार से मुलाकात करने से पहले भूधर से मिलना पड़ता. भूधर उनकी पीड़ा, मजबूरी, पहुंच एवं जेब की गरमाहट का अनुमान लगाकर थानेदार को सूचित करता, तब वह यह निश्चित करता कि किससे पहले मिलना है अथवा मिलना भी है या नहीं. थानेदार लेन-देन के मोल-भाव का कार्य भी भूधर से ही लेने लगा.

उन्हीं दिनों ज़िले के पुलिस कप्तान का इस थाने के वार्षिक निरीक्षण का कार्यक्रम आ गया. यह कार्यक्रम पुलिस कप्तान ने विशेषतः इसलिये लगाया था क्योंकि इस थाने पर घूसखोरी व रिपोर्ट न लिखे जाने की बहुत सी शिकायतें उन्हें मिली थीं. कप्तान साहब को खुश रखने के लिये थाने की सफ़ाई व खाने पीने के भरपूर प्रबंध किए गये, परंतु युवा पुलिस कप्तान ने इस सब के बजाय थाने पर हुए अपराधों व अपराधियों की धरपकड़ हेतु की गई कार्यवाही को अधिक ध्यान से देखा एवं जनता के दुख-दर्द को अकेले में सुना. इसमें उन्हें गम्भीर त्रुटियां मिली और उन्होंने थानेदार को यह चेतावनी दी कि यदि एक माह में स्थिति न सुधरी तो थानेदार को लाइन-हाज़िर कर दिया जायेगा. पुलिस कप्तान के जाने के बाद थानेदार से कहीं अधिक भूधर का मुंह उतरा हुआ था. वह एकांत मिलने पर थानेदार से बोला,

‘सर, अब क्या होगा?’

‘तुम देखो तो- कौन किसको लाइनहाज़िर करता है’, थानेदार वक्र मुस्कराहट के साथ बोला.

दूसरे दिन थानेदार ने रोज़नामचा में अपनी रवानगी बवास्ते तफ़्तीश लिखी और भूधर को लेकर शहर को चल दिया. वहां सीधा सत्ताधारी पार्टी के डिस्ट्रिक्ट कोआर्डीनेटर के घर पहुंच गया, जिन्होंने उसका सप्रेम स्वागत किया क्योंकि विगत चुनाव में थानेदार दोहरे ने उनकी पत्नी को जिताने में हर नियम-कानून एवं जनतांत्रिक पद्धतियों की धज्जियां उड़ा दी थीं.

‘सर, नये कप्तान साहब तो बड़े उड़ रहे हैं. मेरे थाने पर मुआइने के लिये आये थे और मुझे धमकी देकर गये हैं कि एक महीना में काम में सुधार न आया तो लाइनहाज़िर कर देंगे.’

डिस्ट्रिक्ट कोआर्डीनेटर यह सुनकर हंसा और बोला, ‘अच्छा, तो क्या चाहते हो? उसे समझा दूं या उसी को पी. ए. सी. में लाइन-हाज़िर करा दूं.’

‘अब सर, आप जो ठीक समझें- बस मेरा नुकसान न हो.’

‘अच्छा, तो अपने कप्तान से फोन मिलाओ.’

थानेदार ने डिस्ट्रिक्ट कोआर्डीनेटर के घर के फोन से कप्तान साहब का नम्बर मिलाकर उसे दे दिया.

‘कप्तान साहब, नमस्कार. मैं डिस्ट्रिक्ट कोआर्डीनेटर बोल रहा हूं.....सुना है कि आप थानेदार दोहरे से कुछ नाराज़ हैं, उसका काम तो बहुत अच्छा है.’

उत्तर मिला, ‘मैं उसी के थाने का मुआइना करके लौटा हूं. काम के विषय में गम्भीर शिकायतें हैं.’

‘आप अभी नये हैं- आप को यहां के बारे में जानने में वक्त लगेगा. मैं ज़िले का डिस्ट्रिक्ट कोआर्डीनेटर हूं. दोहरे के काम को अच्छी तरह जानता हूं. मेरी आप को राय है कि दोहरे को परेशान न करें और वहीं रहने दें.’

कप्तान साहब का क्रोधपूर्ण परंतु भाषा में संयमित उत्तर मिला,

‘आप कोआर्डीनेटर अवश्य हैं, पर अपने कर्मचारियों के विषय में मैं अच्छी तरह जानता हूं, और मैंने उसे सुधार के लिये एक माह का समय भी दिया है- अपने को सुधार ले तो ठीक है, नहीं तो परिणाम भुगतेगा ही.’

‘यह बात है, तो आप जल्दी ही देखियेगा कि परिणाम कौन भुगतेगा.’- धमकी भरे स्वर में बोलकर कोआर्डीनेटर ने फोन काट दिया.

भूधर कमरे के दरवाज़े पर कान लगाये खड़ा था और कोआर्डिनेटर द्वारा कही बात स्पष्ट सुन रहा था. उसने अपने थाने के इलाके की जनता पर थानेदार का रुआब देखा था और वह जानता था कि कप्तान थानेदार से बहुत ऊंचा अफ़सर होता है, अतः कोआर्डीनेटर द्वारा कप्तान साहब से ऐसी बात कहे जाने पर वह आश्चर्यचकित था. वह सोच रहा था कि अब कोआर्डिनेटर की खैर नहीं है, परंतु दूसरे दिन जब पुलिस कप्तान का उस ज़िले से दूर एक पी. ए. सी. बटालियन को स्थानांतरण का वायरलेस आ गया, तब भूधर कहीं अधिक आश्चर्यचकित हुआ. जब उस स्थानांतरण आदेश में निहित जातिवादी पावर का संदेश भूधर को आत्मसात होने लगा, तब उसे वह अनुचित आदेश भी उचित लगने लगा। उसे वह अपने ग्राम में उसकी जाति के प्रति होने वाले जातीय-भेदभाव का प्रतिशोध लगने लगा. इस आदेश ने भूधर का जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदल दिया. प्रतिकार की अपनी क्षमता का आभास होने के साथ उसके मन में प्रतिकार का भाव भी तीक्ष्ण हो गया. इस नवीन दृष्टिकोण का प्रभाव शनैः शनैः श्रीकुमार से उसके सम्बंधों में भी आने लगा. अभी तक श्रीकुमार से दूरी का मुख्य कारण केवल थानाध्यक्ष का पक्षपात था, परंतु अब उसमें भूधर के मन में उत्पन्न हुआ अहम भी सम्मिलित हो गया. थाने का प्रशिक्षण छः माह का था एवं उसके समाप्त होने के पश्चात दोनों अलग-अलग स्थानों पर नियुक्त हो गये. विछोह के समय दोनों को पुराने दिन याद आ गये एवं उनके नेत्र सजल थे.

‘भूधर, हम दोनों की सीट इसी कमरे में हैं’- भूधर को अपनी सीट ढूंढने हेतु लाइन में लगे देखकर श्रीकुमार प्रसन्न होकर बोल पड़ा. भूधर का चेहरा भी खिल गया. आज तीन वर्ष पश्चात दोनों मिले थे. दोनों कांस्टेबिल के पद से सीधे सब-इंस्पेक्टेर के पद हेतु आयोजित प्रोन्नति-परीक्षा देने आये थे. परीक्षा के उपरांत दोनों ने साथ साथ भोजन किया और इस बीच के अपने अनुभवों के विषय में खूब बातें भी कीं. फिर दोनों अपने-अपने थाने को चले गये. कुल १०० नम्बर की परीक्षा में भूधर के ३५ अंक आये और श्रीकुमार के ६० अंक, परंतु प्रोन्नति में आरक्षण के कारण भूधर को प्रोन्नति मिल गयी और श्रीकुमार को नहीं मिली. केवल अपनी जाति के कारण अपने प्रति हुए इस अन्याय का श्रीकुमार को बुरा तो बहुत लगा, परंतु शालीनतावश उसने फिर भी भूधर को एक बधाई-पत्र भेज दिया, जिसका उसे कोई उत्तर नहीं मिला.

आगे के वर्षों में दो बार और सब-इंस्पेक्टर पद पर प्रोन्नतियां हुईं, परंतु शासन ने उन सब को बैकलाग भरने के नाम पर आरक्षित कर दिया. इस प्रकार दस वर्ष और बीत गये. इस दौरान भूधर को तीन वर्ष तक छोटे दरोगा रहने के पश्चात ही थानेदार बना दिया गया था क्योंकि थानेदार पद पर नियुक्त किए जाने में भी आरक्षण का शासनादेश था और श्रीकुमार अब तक सिपाही का सिपाही ही रह गया था. अब तक दोनों की स्थिति में कतिपय अन्य परिवर्तन भी आ गये थे- भूधर पर लक्ष्मी बरस रही थी और वह बड़े पहुंच वाला थानेदार समझा जाता था और श्रीकुमार अब एक थका-हारा सिपाही था और बस अपनी पुरानी साइकिल को नया करवा पाया था. भूधर अपने प्रथम गुरु थानेदार दोहरे से नेताओं को खुश करने की कला में प्रवीण हो जाने के कारण अपने उच्चाधिकारियों को ठेंगे पर रखता था. जब वह छोटा दरोगा था, तो सामान्य जाति के उसके थानेदार ने उसे हत्या के अपराधियों को बचाने हेतु घूस लेने पर डांट दिया था और उसके विरुद्ध रिपोर्ट करने की धमकी दे दी थी, तो उसने उस थानेदार को स्पष्ट कह दिया था,

‘थानेदार साहब, मेरे विरुद्ध आप जो चाहें लिख दें, इंस्पेक्टर तो मैं आप से पहले ही बनूंगा.’

यह ज़मीनी असलियत थी जिसे सुनकर थानेदार चुप हो गया था, परंतु उसने भूधर की शिकायत कप्तान साहब से कर दी थी. कप्तान साहब ने भूधर के विरुद्ध जांच बैठा दी थी. जाँच के उपरांत भूधर की चरित्र पंजिका में एक दुष्चरित्र लेख लिखा गया था एवं वार्षिक प्रविष्टि देते समय उसकी सत्यनिष्ठा सत्यापित नहीं की गई थी.


इस घटना के आठ वर्ष पश्चात इन्स्पेक्टर के पद पर प्रोन्नति हेतु कमिटी बैठी थी. शासन के आदेशानुसार प्रथम और उसके उपरांत प्रत्येक पांचवीं रिक्ति जातीय आरक्षण से भरी जानी थी. आरक्षित वर्ग में अच्छी चरित्र पंजिका वाले पर्याप्त सब-इंस्पेक्टर उपलब्ध ही नहीं थे, अतः भृष्ट होने का प्रमाण-पत्र पाया हुआ भूधर इंस्पेक्टर पद पर प्रोन्नत हो गया था और उसका वह थानेदार, जिसने हत्या के प्रकरण में घूस लेने पर भूधर को डांटा था, सब-इंस्पेक्टर ही रह गया था. भूधर का साथी श्रीकुमार अब तक सिपाही के पद से हेड-कांस्टेबिल के पद पर पहुंच पाया था.

समय बीतता रहा और कुछ वर्ष पश्चात भूधर पुनः आरक्षण का लाभ पाकर पुलिस उपाधीक्षक (राजपत्रित अधिकारी) पद पर प्रोन्नत हो गया. श्रीकुमार अभी भी हेड कांस्टेबिल ही था. अब तक दोनों के सामाजिक स्तर एवं जीवन के प्रति दृष्टिकोण में ज़मीन-आसमान का अंतर हो गया था- भूधर सत्ता सम्पन्न साहब हो गया था और अधीनस्थ कर्मचारियों को मुंह लगाने में अपनी हत्तक समझने लगा था, जब कि श्रीकुमार प्रोन्नति के पक्षपातपूर्ण नियमों का बारम्बार शिकार होकर नैराश्य के गर्त में डूबा हुआ एक अन्तर्मुखी इंसान बन गया था.

कहावत है कि दुनियां बड़ी छोटी है और भूले बिसरों से हम कहीं न कहीं टकरा ही जाते हैं. इस वर्ष की सब-इंस्पेक्टर की प्रोन्नति-परीक्षा में कुछ पद सामान्य जाति के हेड-कांस्टेबिलों हेतु भी छोड़े गये थे. हेड-कांस्टेबिल श्रीकुमार ने सब-इंस्पेक्टर के पद पर प्रोन्नति हेतु फ़ार्म भरा था. वह आउटडोर परीक्षा हेतु जनपद मुख्यालय आया था। कल प्रातः जब श्रीकुमार परेड-ग्राउंड की ओर आउटडोर विषयों की परीक्षा हेतु जा रहा था, तभी उसके सामने भूधर पड़ गया था. अपनी अन्यमनस्कता की स्थिति में अकस्मात भूधर को सामने देखकर श्रीकुमार का चेहरा खिल गया था और वह अनायास बोल पड़ा था,

‘अरे, भूधर तू यहां कहां?’

आस-पास खड़े कुछ पुलिसकर्मी श्रीकुमार की इस बात को आश्चर्यपूर्वक सुन रहे थे- एक हेड-कांस्टेबिल के मुंह से उपाधीक्षक को ऐसा सम्बोधन! यह सुनकर भूधर असहज एवं क्रोधित हो गया था और उसने अपना रुतबा बनाये रखने के लिये रूखा सा जवाब दिया था,

‘तमीज़ से बात करो.’

भूधर के मुंह से यह बात श्रीकुमार को चुभ गई थी. उसके हृदय में बरसों से घनीभूत आक्रोश फूटने को आकुल हो उठा था। अपने को संयत रखने का प्रयत्न करते हुए भी वह बोल पड़ा था, "अच्छा अब तुम मुझे तमीज़ सिखाओगे?"

भूधर अब पूरी तरह उपाधीक्षक बन चुका था. वह धमकी भरे स्वर में बोला,

‘अनुशासन में रहकर बात करो, नहीं तो तुम्हारी औकात दिखा दूंगा.’

श्रीकुमार आग-बबूला हो रहा था, और अपना संयम खोते हुए बोला,

‘पहले अपना मुंह शीशे में देखो, तब मुझे औकात दिखाना. यह औकात बनाने के लिये अपनी जाति के अलावा और कौन सा गुण तुममें है?’

आक्षेप यदि सत्य पर आधारित हो, तो कसक गहरी होती है. भूधर को भी अपनी निम्न-स्तर की सेवा होते हुए भी केवल जाति के नाम पर मिली तीन प्रोन्नतियों की बात मुंह पर कहे जाने पर बहुत चुभी और वह आपा खोकर चिल्लाया,

‘साला मुझे मेरी औकात दिखायेगा- उल्लू का पट्ठा.’

गाली सुनकर श्री कुमार भी भड़क गया, और भूधर की ओर झपटते हुए चिल्लाया,

‘उल्लू का पट्ठा तू, उल्लू का पट्ठा तेरा बाप, तेरा सारा खानदान मा......’

इस बीच आस-पास खड़े पुलिस वालों ने श्रीकुमार को पकड़ कर दबोच लिया था. उपाधीक्षक भूधर के आदेश पर उसके विरुद्ध एफ़. आई. आर. लिखकर उसे हवालात में डाल दिया गया था. उसकी जल्दी ज़मानत न हो सके, इसलिये उस पर अन्य के अतिरिक्त एस. सी. / एस. टी. के व्यक्ति को गाली देने का अपराध भी लगा दिया गया था. यह बात अलग है कि भूधर ने ही पहले श्रीकुमार को गाली दी थी परंतु उससे क्या फ़र्क पड़ता है – एस. सी. के व्यक्ति द्वारा अन्य को गाली देना कोई अपराध थोड़े ही है.”


मीडिया से मेरा अनुरोध है कि न केवल इस रिपोर्ट को प्रकाशित करे, वरन प्रोन्नति में जातीय भेदभाव से उभरे तथ्यों पर राष्ट्रीय स्तर की बहस छेड़कर उचित संशोधन का प्रयास करे, अन्यथा पुलिस विभाग में अनुशासनहीनता एवं अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाने की सम्भावना है.


 

लेखक महेश द्विवेदी – परिचय






नाम: महेश चंद्र द्विवेदी

पताः ‘ज्ञान प्रसार संस्थान’, 1/137, विवेकखंड, गोमतीनगर,

लखनउू-226010 / फोनः 9415063030


प्रकाशित पुस्तकें

1. उर्मि- उपन्यास

2. सर्जना के स्वर- कविता संग्रह

3. एक बौना मानव- कहानी संग्रह

4. सत्यबोध- कहानी संग्रह

5. क्लियर फ़ंडा- व्यंग्य संग्रह

6. भज्जी का जूता- व्यंग्य संग्रह

7. प्रिय अप्रिय प्रशासकीय प्रसंग- संस्मरण

8. अनजाने आकाश में- कविता संग्रह

9. लव जिहाद- कहानी संग्रह

10. भीगे पंख- उपन्यास

11. मानिला की योगिनी- उपन्यास

12. इमराना हाजिर हो- कहानी संग्रह

13. महेश चंद्र द्विवेदी के 51 व्यंग्य

14. वीरप्पन की मूंछेँ - व्यंग्य संग्रह

15. Interesting Exposures of Administration (ENGLISH)

16. चुनिंदा व्यंग्य

17. फ़्राडियर और नीमपागल (संस्मरण)

18. अनोखी यायावरी (यात्रा वृत्तांत)


अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भागीदारी

1. विश्व हिंदी सम्मेलन, /न्यूयार्क-2007/

2. रामायण ज्ञान केन्द्र, यू. के. /बर्मिंघम-2007/

3. शतो द लाविनी /स्विट्झरलैंड/ में अंतर्राष्ट्रीय लेखकों के साथ 21 दिन की

रेजीडेंसी- 2010

4. अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन, दुबई – 2013

5. अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन, चाइना- 2014

6. अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन, मिस्र- 2016


पुरस्कार एवं सम्मान

अः 1. सराहनीय सेवाओं हेतु पुलिस पदक

2. विशिष्ट सेवाओं हेतु राष्ट्र्पति का पुलिस पदक

3. मानवाधिकार संरक्षण समिति, छत्तीसगढ़- भारत श्री

4. लखनऊ विश्वविद्यालय मेँ गोल्ड मेडल


ब. 1. आल इंडिया कान्फ़रेंस आफ़ इंटेलेक्चुअल्स- यू. पी. रत्न

2. आथर्स गिल्ड आफ़ इंडिया, वाराणसी

3. भारत विकास परिषद, इटावा

4. अखिल भारत वैचारिक क्रांति मंच, लखनउू

5. प्रोग्रेसिव कल्चुरल सोसायटी, लखनउू

6. सर्वधर्म चेतना सेवा संस्थान द्वारा घोंघा-शिरोमणि सम्मान

7. संस्कार भारती- फर्रुखाबाद

8. महाकोशल साहित्य एवं संस्कृति परिषद- भारत भारती

9. अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन- गढ़-गंगा

शिखर सम्मान

10. हिंदी एवं संस्कृति प्रसार समिति /भारत/- हिंदी रत्न

11. इटावा हिंदी सेवानिधि- गंगदेव सम्मान

12. शब्द सरिता- काव्य रत्न

13. डा. सुरेश चंद्र शुक्ल राष्ट्भाषा पुरस्कार

14. अखिल भारतीय ब्रज साहित्य संगम, मथुरा- कला रत्न

15. अ. भा. अगीत परिषद, लखनऊ- डा. शिव मंगल सिंह

सुमन पुरस्कार

16. अ. भा. अम्बिका प्रसाद ‘दिव्य’ स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कार

सागर/मघ्य प्रदेश/

17. ‘अभिव्यक्ति’. ई-पत्रिका में कथा पुरस्कार

18. सोनांचल साहित्यकार संस्थान, सोनभद्र

19. साहित्यानंद परिषद, खीरी

15. हिंदी प्रसार निधि, बिधूना

16. अखिल भारतीय वागीश्वरी साहित्य परिषद, लखनउू

17. साहित्य प्रोत्साहन, लखनउू

18. अखिल भारतीय साहित्य परिषद, राजस्थान -प्रथम पुरस्कार

19. अनहद कृति काव्य उन्मेष – विशेष मान्यता सम्मान

20. प्रो. सहदेव सिंह स्मृति सम्मान- (मिस्र मेँ प्राप्त)- 2016

21. उत्तर प्रदेश शासन - हिंदी संस्थान- शरद जोशी पुरस्कार- 2004

22. उत्तर प्रदेश शासन - हिंदी संस्थान- हरि शंकर परसाई पुरस्कार- 2014

23. लखनऊ मैनेजमेँट एसोसिएशन व्यंग्य-सम्मान

24- रोटरी-क्लब, लखनऊ द्वारा व्यंग्य-पाठ सम्मान

25- सुंदरम सम्मान

आदि, आदि – लगभग दो दर्जन अतिरिक्त


ई-मेल सम्पर्क -maheshdewedy@yahoo.com


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