• मनमोहन भाटिया

भावनात्मक रिश्ता



ऑफिस में लंच के समय श्वेता ने व्हाट्सएप संदेश देखा “आज शाम छः बजे।“ श्वेता ने तुरंत उत्तर दे दिया “ठीक है।“ ऑफिस से छः बजे श्वेता नीचे उतरी। इंद्रनील उसका इंतजार कर रहा था। दोनों पैदल समीप के मॉल की ओर बातें करते हुए चल दिए जहाँ कॉफ़ी हाउस में एक कोने की सीट पर बैठ कर कॉफ़ी पीने लगे। इंद्रनील आज चुप था, वह श्वेता की ओर न देख कर विपरीत दिशा में देख रहा था।

"क्या बात है इंद्रनील, उधर क्या देख रहे हो?"

"कुछ नहीं, बस यूँ ही।"

"चुप भी हो?"

श्वेता के पूछने पर भी इंद्रनील चुप रहा।

"कॉफ़ी भी नहीं पी रहे हो। टकटकी लगा कर उधर देखे जा रहे हो। कौन है वहाँ?"

इंद्रनील ने अब श्वेता की ओर देखा और धीरे से कहा "श्वेता अब विदा होने का समय आ गया है।"

"समझी नहीं?"

"मैं दिल्ली छोड़ कर वापिस कोलकता जा रहा हूँ।" इंद्रनील ने श्वेता की ओर पहली बार देखते हुए कहा।

"क्या सदा के लिए?" श्वेता कुछ उदास हो गई।

"हाँ तभी तुमसे कह रहा हूँ। शायद आज अंतिमबार मिलना हो। मैं कल सुबह कोलकता रवाना हो रहा हूँ।"

"इतनी जल्दी?"

"हाँ सब अचानक से हो गया और निर्णय भी तुरंतही लेना पड़ा।" इंद्रनील ने एक पल की चुप्पी के बाद फिर श्वेता को बताया।

"श्वेता नौकरी छोड़ दी है। आज मेरा अंतिम दिनथा,सबको अलविदा कहा। बिना तुम से मिले कैसे जा सकता हूँ। एक तुम ही तो हो जिसके साथ हर सुख और दुख सांझा किया है।"

"पहले बता देते?" श्वेता के इस प्रश्न पर इंद्रनील भावुक हो गया।

"बस दस बारह दिनों में घटनाक्रम इतनी तेजीसे घूमा कि तुमसे बात नहीं कर सका।"

"कुछ बताओ, दिल पर पड़ा बोझ हल्का हो जाएगा।" श्वेता ने इंद्रनील से कहा।

"श्वेता पिछले महीने श्यामली की मृत्यु होगई।"

"तुमने बताया ही नहीं?"

"मुझे भी नहीं मालूम था। कोई बारह दिन पहलेश्यामली की चाची ने अस्पताल में दोनों बच्चों सुब्रता और सांवली को मेरी माँ के हवाले कर दिया। बच्चों की खातिर ही दिल्ली छोड़ कोलकता जा रहा हूँ।" कह कर इंद्रनील चुप हो गया।

इंद्रनील और श्वेता कॉफ़ी के घूंट पीते हुए अतीतमें चले गए। श्वेता और इंद्रनील पिछले लगभग दस वर्षों से मित्र हैं। दोनों की उम्र लगभग चालीस वर्ष के आसपास है। श्वेता दस वर्ष पहले जब ऑफिस में काम करने पहली बार आई थी तब इंद्रनील के साथ वाली सीट पर बैठ कर काम करना आरंभ किया। साथ-साथ बैठ कर काम करते-करते दोनों घनिष्ठ मित्र बन गए। दोनों में एक बात समान थी कि दोनों उस समय तलाकशुदा थे। श्वेता का एक चार वर्ष का पुत्र जिसका नाम शौर्य था और अपने माता-पिता के संग रह रही थी। इंद्रनील कोलकता का रहने वाला था और वह भी तलाकशुदा था उसके दो बच्चे थे चार वर्षीय पुत्र सुब्रता और दो वर्षीय पुत्री सांवली। तलाक के समय छोटे बच्चों की परवरिश माँ को मिली। इंद्रनील कोलकता से दिल्ली आ गया। कभी-कभी जब कोलकता जाता तब बच्चों से मिलता। शुरू-शुरू में बच्चों से मिलना लगा रहा फिर बच्चे भी कभी-कभी मिलने वाले पिता से घुलमिल नहीं सके और इंद्रनील ने बच्चों से मिलना छोड़ दिया। कुछ यही हाल श्वेता का भी था। वह शौर्य को अपने पिता के साये से दूर रखना चाहती थी और दो वर्ष बाद दूर हो ही गया। श्वेता की समस्या उसका पुत्र था जिस कारण उसका दूसरा विवाह नहीं हुआ। उसके माता-पिता तो दूसरा विवाह चाहते थे लेकिन सामाजिक बेड़ियों ने एक बच्चे वाली माँ का दूसरा विवाह नहीं होने दिया। इंद्रनील ने एक बार दूसरा विवाह करने की सोची लेकिन पुराने कटु अनुभव ने उसे रोक लिया।

दस मिनट बाद पुरानी यादों के चलते नम आँखों के साथ वर्तमान में आ गए और कॉफ़ी हाउस से बाहर मॉल में चहल कदमी करने लगे। एक दुकान के अंदर श्वेता इंद्रनील के लिए शर्ट पसंद करने लगी और इंद्रनील श्वेता के लिए साड़ी पसंद करने लगा। एक दूसरे के लिए शायद अंतिम उपहार उन दोनों ने खरीदा था। आज कोई बात नहीं हो रही थी सिर्फ एक दूसरे की आँखों में आँखें डाल कर दिल की बात कह और सुन रहे थे। मॉल से बाहर आने पर श्वेता ने शर्ट का पैकेट इंद्रनील को दिया "इंद फिर कब मिलना होगा?"

इंद्रनील ने साड़ी का पैकेट श्वेता को देते हुएजवाब दिया "मुझे स्वयं नहीं मालूम। फोन करूंगा।"

बाए कह कर इंद्रनील और श्वेता अपने घर की ओर चल दिए। इंद्रनील ने सुबह की गाड़ी पकड़नी थी इसलिए उसने सारा सामान पैक कर रखा था लेकिन उसकी आँखों से नींद नदारत थी। आज दस वर्ष से उसकी श्वेता से पहचान है। श्वेता से वह ऑफिस में ही मिलता था और ऑफिस से बाहर सिनेमा भी देखते थे, मॉल भी घूमते थे और अक्सर इंडिया गेट के लॉन या पुराना किला के अंदर दीवार के साथ बैठ कर बातें करते थे। इंद्रनील किराए के कमरे में रहता था और कभी भी श्वेता को अपने कमरे में ले कर नहीं गया। वह श्वेता पर किसी तरह का लांछन नहीं लगने देना चाहता था कि उसका मकान मालिक या पड़ोसी श्वेता और उसके रिश्ते पर कोई उंगली उठाएं। ठीक उसी तरह वह कभी भी श्वेता के घर नहीं गया कि कहीं श्वेता का परिवार, रिश्तेदार, पड़ोसी उनकी मित्रता को गलत समझें। इन दस वर्षों में उन दोनों का रिश्ता सिर्फ भावनात्मक ही रहा। वे दोनों कभी भी नहीं बहके और लक्ष्मण रेखा को नहीं लांघे। ऑफिस में उनकी नजदीकियों पर सहकर्मी उपहास करते थे लेकिन यह अधिक समय नहीं रहा क्योंकि एक वर्ष बाद इंद्रनील ने नौकरी बदल ली और ऑफिस के बाद या अवकाश के समय ही मिलते थे। दस वर्षों में इंद्रनील और श्वेता ने कई नौकरी बदली लेकिन एक अनोखा भावनात्मक रिश्ता मजबूत होता गया।

श्वेता की भी नींद नदारत थी। वह इंद्रनील के बारे में सोचती रही कि दोनों एक दूसरे के नजदीक होते हुए भी दूर रहे। एक ख्यालात, एक सोच लेकिन एक नहीं हुए। पिछले दस वर्षों से वेदोनों कहें तो दोहरी जिंदगी जी रहे थे।

इंद्रनील कोलकता चला गया और श्वेता ऑफिस के बादउदास रहने लगी। पुत्र शौर्य अब चौदह वर्ष का हो गया है और पढ़ाई के साथ खेल में व्यस्त रहने लगा है। श्वेता रात को इंद्रनील के बारे में ही सोचती रहती और इंद्रनील श्वेता के बारे में सोचता रहता। इंद्रनील का पुत्र सुब्रता भी अब चौदह वर्ष और पुत्री सांवली बारह की हो गई। इंद्रनील कई वर्षों से बच्चों से नहीं मिला था। तलाक के बाद श्यामली अपने माता-पिता के संग रह रही थी लेकिन वे श्यामली से पहले ही दुनिया से कूच कर चुके थे। श्यामली की मृत्यु पर दोनों बच्चे अकेले रह गए। सड़क दुर्घटना के बाद अस्पताल में श्यामली ने अपने सास-ससुर को संदेश भिजवाया और बच्चों को अस्पताल में दादा-दादी को सुपुर्द करके दुनिया छोड़ गई। माता-पिता से सूचना मिलने पर इंद्रनील कोलकता चला आया। अंतिम समय में श्यामली की आर्थिक स्थिति दयनीय थी और बहुत मुश्किल से गुजर बसर हो रहा था। स्कूल की फीस भी नहीं भरी थी। इंद्रनील सोचने लगा कि दस वर्ष पूर्व श्यामली ने तलाक पर एक मुश्त दस लाख रुपये की रकम ली थी, यदि वह उस रकम को बैंक में फिक्स्ड डिपाजिटपर रखती तब आज इतनी दयनीय स्थिति नहीं होती। इंद्रनील की कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे?बच्चे उसके पास थे लेकिन सहमे हुए क्योंकि वर्षो बाद अपने पिता से मिल रहे थे जिसकी उनके मनपटल पर कोई स्मृति शेष नहीं थी। इंद्रनील ने सबसे पहले बच्चों की स्कूल फीस भरी और उनको स्कूल भेजना शुरू किया। श्यामली ने सड़क दुर्घटना के पश्चात अस्पताल में बच्चों को उनके पिता के बारे में बताया और दादा-दादी के सुपुर्द किया।

इंद्रनील को कोलकता आए एक महीना हो गया। इस एक महीने में श्वेता और इंद्रनील के बीच कोई बात नहीं हुई। श्वेता ने फोन करने की सोची लेकिन संयम रखते हुए अपने हाथ खींच लिए। अब उसने अपना समय पुत्र शौर्य के संग बिताना आरंभ किया। इंद्रनील अपने जीवन में तालमेल नहीं बिठा सका और एक दिन श्वेता को फोन कर ही दिया।

"श्वेता कैसी हो?"

"तुम बताओ?"

"चलो एक दूसरे को अपना हाल बता देते हैं।"

"यह ठीक है इंद्रनील, जीवन का नया पड़ाव कैसालग रहा है?"

"श्वेता इन परिस्थितियों के बारे में कभीसोचा नहीं था इसलिए हालात से समन्वय नहीं बन पा रहा है।"

"इंद्रनील जीवन अनिश्चितता से भरपूर है। भविष्यएक रहस्य है कि कल क्या होगा? हमने विवाह किया तब यह नहीं सोचा था कि हमारा तलाक होगा लेकिन हुआ। जब हमने उस परिस्थितियों को जिया तब अब भी जी सकते हैं। थोड़ा समय दिक्कत होती है फिर हम सब नई परिस्थितियों के आदी हो जाते हैं।"

"श्वेता तुम्हारी दार्शनिक बातें सुनकर मनका बोझ हल्का हुआ कि हालात से समझौता करना ही पड़ता है।"

"इंद्रनील जीवन अपने आप में ही समझौता है।हर पल में समझौता करना होता है। अगर हम यह बात पहले समझ जाते तब हो सकता है कि तलाक ही नहीं होता लेकिन हुआ क्योंकि कहीं न कहीं हमारा अहम टकरा गया और हम पीछे नहीं हटे। जीवन के अनुभवों से ही हम सीखते हैं।"

"श्वेता मेरी समस्या बच्चों के साथ तालमेलकी है। आज वर्षो बाद बच्चे साथ है, समझ नहीं आ रहा कि मैं उनके साथ कैसा व्यवहार करूं।"

"इंद्रनील बच्चे तो तुम्हारे अपने हैं बसअंतर सिर्फ इतना है कि तुम बर्षो बाद बच्चों से मिल रहे हो। समझ लो कि विदेश में रहते थे, अब वापिस अपने घर आए हो।"

"श्वेता तुम तो उदाहरण भी ऐसे देती हो किमेरे पास कोई उत्तर ही नहीं सिवा इसके कि तुम्हारे सुझाव पर अमल करूं।"

"इंद्रनील यह महिला दिमाग का कमाल है जो पुरुषदिमाग से सदा आगे रहता है।"

फोन पर बात समाप्त होने पर शौर्य ने माँ श्वेतासे पूछा "मम्मी किसके साथ बात कर रही थी, बहुत लंबी बात हो गई?"

"शौर्य मैं इंद्रनील से बात कर रही थी। मेरेसाथ ऑफिस में काम करते थे आजकल कोलकता में रहते हैं। कई बार बात होती रहती हैं। इनका लड़का भी तुम्हारे जितना बड़ा है चौदह वर्ष का।"

"इंद्रनील अंकल कभी घर नहीं आए, कभी देखा नहीं?"

पुत्र के इस प्रश्न पर श्वेता को आश्चर्य हुआ किआज पहली बार शौर्य उससे ऐसा प्रश्न कर रहा है। अब वह बड़ा हो गया है और दुनिया की ऊंच नीच भी समझने लगा है। फिर चुटकी में अपने भावों को नियंत्रित करते हुए श्वेता ने शौर्य को समझाया "हमारे ऑफिस में बहुत कर्मचारी हैं और मैंने चार कंपनी में काम किया, वहाँ अनेकों के साथ मेरी मित्रता रही लेकिन मैं किसी के घर नहीं जाती थी क्योंकि तुम छोटे थे और ऑफिस के बाद तुम्हारे साथ समय बिताना मेरी प्राथमिकता रही है इसी कारण मैं किसी को अपने घर भी नहीं बुलाती थी क्योंकि तुम्हें मालूम है कि मेरा और तुम्हारे पापा का दस वर्ष पूर्व तलाक हुआ था। मैंने तुम्हारी परवरिशको सबसे बेहतर रखने की कोशिश की ताकि तुम्हें पिता की कमी महसूस न हो। अब तुम बड़े हो गए हो तुम चाहोगे तब मैं अपने मित्रों को भी घर बुलाऊंगी।"

"मम्मी मैं तो सिर्फ इसलिए पूछ रहा था किमेरे मित्र घर आते हैं तब आपके क्यों नहीं आते हैं?"

"वो इसलिए कि तुम मित्रों के संग पढ़ते हो।मेरे मित्र आएंगे तब सिर्फ गपशप होगी और तुम्हारी पढ़ाई में खलल होगा।"

"कभी-कभी तो बुला सकती हो?"

"अब तुम चाहते हो तब इसी रविवार को अपने मित्रोंके संग महफिल सजा दूंगी।" श्वेता ने मुस्कुराते हुए शौर्य को कहा और शौर्य भीमुस्कुरा दिया।

खैर शौर्य की मंशा श्वेता समझ गई कि बच्चा अब स्यानाहो गया है और रिश्तों के साथ मित्रता की भी अहमियत समझने लगा है। श्वेता ने अपनी तरफ से इंद्रनील को फोन नहीं किया। उसे शायद डर था कि शौर्य उसके इंद्रनील के साथ पवित्र रिश्ते को कहीं गलत न समझ ले कि उसकी माँ दोहरी जिंदगी जी रही है। उसने रिश्ते पर पूर्णविराम लगा दिया। इंद्रनील कभी-कभी श्वेता से फोन पर बात कर लिया करता था, वह सिर्फ अपने बच्चोंसे जुड़ने पर ही विमर्श करता था।

इंद्रनील ने कोलकता में नौकरी कर ली और छुट्टीवाले दिन बच्चों के साथ रहता और उनके साथ घूमने जाता। श्वेता ने इंद्रनील को सलाह दी कि वह बच्चों को आर्थिक संरक्षण प्रदान करने के साथ उनके साथ भावनात्मक रूप से भी जुड़े। इंद्रनील छुट्टी वाले दिन बच्चों के साथ घूमने जाता। धीरे-धीरे बच्चे इंद्रनील से जुड़ने लगे। इंद्रनीलके बच्चों से जुड़ाव के बाद श्वेता ने इंद्रनील से फोन पर बात भी बंद कर दी।

एक वर्ष बाद सर्दियों की ठंड में श्वेता बालकनीमें बैठ कर धूप सेंक रही थी। शौर्य की दसवीं की बोर्ड परीक्षा नजदीक थी वह भी धूप में श्वेता के नजदीक बैठ कर पढ़ रहा था तभी डोरबेल बजी।

"शौर्य जरा दरवाजा खोलना।"

"मम्मी मैं पढ़ रहा हूँ, आप खोलिए।"

श्वेता ने दरवाजा खोला, दर