• डॉ ऋषि कटियार

कायर



१.

उसके 6x6 फीट के कमरे की हर दीवार पे छिपकलियाँ रहती हैं,हर छिपकली का उसने नाम रखा हुआ है,दाईं ओर वाली दीवार पे रहने वाली मोटी सी छिपकली शायद इन सब की माँ होगी, क्योंकि पीछे और सामने वाली दीवार की छोटी छिपकलियाँ उसके आस-पास मंडराती रहती हैं, रात भर वो सब साथ में बाल कृष्ण के कैलेंडर के पीछे, अंग्रेजों के ज़माने वाली उस टिक-टिक करती दीवार घडी के नीचे, गैस सिलिंडर, गैस स्टोव, उसकी दो थालियों, चार कटोरियों, कुकर आदि कुछ और जरुरी बर्तनों की कोने में बनी सीमित किचेन के आगे पीछे खेलती रहती हैं . बाएँ दीवार वाली छिपकली या कह लो छिपकला इन सब का बाप होगा, क्योंकि अक्सर वो किनारे कोने में उपेक्षित सा पड़ा रहता है. कई बार वो कोशिश करता है बाकियों के पास जाने की, फिर रुक जाता है, कुछेक बार तो उनके पास जाके कुछ सर हिला के देख के कुछ बात सा भी करता है शायद, पर वो सब उसे छोड़ के आगे बढ़ जाती हैं और वह फिर अकेला रह जाता है और फिर लौट के अपने कोने में चला जाता है.चुपचाप, गुमशुम, हारा हुआ, अपराधी सा.

रात में सोते वक़्त अक्सर वो एक ही सपना देखता था,वो भागने की कोशिश करता, पर उसके हाथ पाँव नहीं हिलते, वो डर के जम जाता, वो हताश हो गिर जाता है, उसकी आँखों के आँसू अंदर ही सूख जाते हैं. चारों ओर से लोग उसकी तरफ उँगलियाँ उठा के उसे धिक्कार रहे हैं, ’कायर’ ‘कायर’ का शोर उसके मन में गूँजने लगता है और फिर वो हाथ बढ़ाते हुए डर के उठ जाता, मानो इस बार वो वक़्त को रोक लेगा, अतीत को मोड़ देगा. रोज रात भर अकेले ही तन्हाई,मच्छरों से लड़ते,डूबते-उतराते वो सुबह का इंतज़ार करता,ताकि सुबह होते ही वो फिर से नौकरी पे जा सके.हालाँकि उसकी ड्यूटी आठ बजे शुरू होती है,पर वो सुबह जब भी उठता,जल्द से जल्द खाना बना के ब्रेकफास्ट-लंच के टिफ़िन पैक कर निकल जाता.वो कमरा अकेले उसे काटने दौड़ता था. पहले-पहल कितना कठिन लगता थउसे खाना-वाना बनाना, पर कुछ 10 साल होने को आये उसे अकेले रहते और खुद का खाना बनाते, और खाना भी बढ़िया बनाने लगा है,आखिर खिचड़ी बनाना इतना भी कठिन नहीं हैं.

उसका ‘ऑफिस’ उसके कमरा के बगल में ही है.कुल जमा दो ही तो बिल्डिंग/कमरे हैं उस वीराने में.उसका ऑफिस क्रासिंग के पास बना दूसरा कमरा है जिसमें एक कुर्सी, एक टेबल, पानी का जग, एक लोटा,दीवार पे लगा ट्रेन्स का टाइम टेबल,कैलेंडर,दीवार घड़ी,घर्र घर्र कर के डायल करने वाला फ़ोन, पीली और गर्म रौशनी फेंकता एक बल्ब भर है.कमरे के बाहर एक छोटा चबूतरा है जिसपे लाल और हरी झंडियाँ हैं, एक चटाई है,कोने में दो रजिस्टर, रात में दिखाने वाली लैंप रखी रहती है .कमरे के बगल में एक बड़ा सा नीम का पेड़ हैं जिसके नीचे हैंडपंप है,पीछे खाली खेत हैं,रोड के पार एक ढाबा और पंक्चर की दुकान,जिसमें बड़े बड़े टायर और हवा भरने की मशीन रखी है.उसकी जिंदगी इतनी खाली है कि दुनिया भर के खयालात मन में घुमड़ते रहते हैं और इतनी भरी है कि वो उस कमरे और ऑफिस को छोड़ के कहीं जाने की नहीं सोच पाता.

आखिर जाए भी कहाँ और क्यों और किसके लिए. माँ-बाप की मौत के बाद गोरखपुर के उस अनाम से गाँव में बस एक खंडहर सा मकान ही तो बचा होगा कहीं. वो बीमार रहते थे,बुलाते रहते थे अपने बेटे को अपने पास रहने को. नया-नया गेट मैन बना था तब. महत्वाकांक्षा और कैरियर इमोशन पे भारी था.वो बीमारी में बुलाते रहे, वो उन्हें बहलाते रहा,बहाने बनाते रहा, और वो आस लिए दरवाज़े पे आँखे टिकाए विदा हो गए.शादी के बाद गाँव से कुछ बरस और नाता जुड़ा रहा, पर फिर दस बरस पहले जब वो भी उसे छोड़ के चली गई, तब से उसने गाँव छोड़ दिया. इस क्रासिंग की एक कमरे की गुमटी में नौकरी करते हुए उसे करीब 25 बरस बीत चुके थे. मूछों के पहले रोयें से ले, कानों के पीछे झाँकते पहले सफ़ेद बाल को भी उसने यहीं देखा था.

कानपुर जिले के अरौल कसबे के रेलवे स्टेशन के बाद ये दूसरी रेल क्रासिंग गुमटी थी. जी टी रोड से आकर और रेलवे लाइन क्रॉस कर ये सड़क कई गाँवों में ले जाती थी, सबसे नजदीकी गाँव करीब एक किलोमीटर दूर था. रामेश्वर करीब 45 के का होने को आया था. बड़े-बूढ़े उसे रमेसर,जवान दद्दा,चच्चा,ताऊ,भैया और बच्चे और नई उमर के लड़के ओये, गेटवाले, अबे आदि कह के संबोधित करते थे.और वो सभी नामों की पुकार का जवाब अपनी शांत भावहीन मुस्कान से देता था.

हर बार ट्रेन के अगले या पिछले स्टेशन से छूटने पे फ़ोन की घंटी बजती और वो निर्देशानुसार लीवर खींच के फाटक बंद कर वहीं खड़ा रहता.उसे पता है अभी काम खत्म नहीं हुआ है .अभी ट्रेन पकड़ने वाले मोटरसाइकिल और गाड़ियों से जल्दी मचाते हुए निकलेंगे और उससे थोडा गेट उचका देने की गुहार, मनुहार, आदेश देंगे और ना खोलने पे देख लेने की धमकी देंगे .उम्र ने उसे सहनशील बना दिया है,वो तालियों और गालियों को बिना भाव, मुस्करा के सुन लेता है. पहले दस पाँच मिनट तक गाड़ी पकड़ने वालों के लिए वो गेट खोल देता है, पर इसके बाद कभी भी गाड़ी आने का अंदेशा रहता है तो इसलिए गाली, धमकी के बावजूद नहीं खोलता.कुछ 300 मीटर दूर जाकर पटरियाँ बगल वाली ग्रैंड ट्रंक रोड के साथ साथ दायें मुड़ जाती हैं और इतनी ही दूर तक देखा जा सकता है .कभी कभी गाड़ी टाइम पे रहती है, कभी कभी 15-20 मिनट लेट भी रहती है, इस दौरान वो दर्जनों गालियाँ सुनता है .फाटक के नीचे से गाड़ी झुका के निकलने वालों को रोकता भी है, पर वो हाथ तो नहीं पकड़ सकता. उसे समझ नहीं आता कि ये नई पीढ़ी इतनी जल्दी में क्यों रहती है, उसी ‘नौकरी’ पे जाने के लिए ना, जिसे वो दिन रात गरियाते रहते हैं.

ट्रेनों की तरह ही उसका टाइम टेबल भी निर्धारित था. रात की ड्यूटी वाले लोकल गेट मैन से चार्ज लेना, रजिस्टर में हाजिरी लगाके कुर्सी पे बैठ के जब-तब आने वाले स्टेशन मास्टर के फोन का इंतज़ार करना.फ़ोन आने के बाद क्रासिंग बंद करना, जाती ट्रेन को झंडियाँ दिखाना,इसके बाद पटरी पे लाल झंडा लगाना और फिर क्रासिंग खोलना.बीच बीच में गाँव से आने वाले थक के नीम तले सुस्ताते लोगों से गप्पें लड़ाना, पटरी चेक करना और पटरी के किनारे लगाये अपने फूलों के पौधों, जामुन के पेड़ और उसपे चहचहाती चिड़ियों को सूनी आँखों से देखते रहना. उसकी जिंदगी की गाड़ी इन्ही दो पटरियों के इर्द गिर्द ही सिमटी हुई थी. ये पटरियाँ उसकी जिंदगी भी रही हैं,और उसकी जिंदगी का अंत भी . इसी रोजमर्रा के तयशुदा ढर्रे पर वह जिंदगी काट रहा था. वो रेल के किसी बेजान पुर्जे की तरह ही हो गया था. लक्ष्यहीन, भावहीन, संवेदनशून्य.


२.

पिछले कुछ दिनों से उसकी दिनचर्या में कुछ नयी चीजें भी जुड़ गई हैं.जैसे अब दोपहर और लम्बी हो गई है .आठ-दस साल की उस बच्ची की स्कूल की छुट्टी करीब सवा तीन बजे होती थी और वो ३ बजे से ही उसका इंतज़ार करने लगता है .उसकी छोटी सी नाक,बड़ी बड़ी आँखे,दो चोटियों में बंधे बाल,निर्झर झरती हँसी उसको किसी की याद दिलाती थी,उसकी बेटी भी तो इसी उमर की होगी. वो बच्ची और उसकी उमर की उसकी दोनों सहेलियाँ साथ-साथ खरगोश जैसे फुदकते हुए आती हैं और दबे पाँव उसकी नज़रें बचा पटरी के किनारे लगाये गेंदे, गुड़हल,सदाबहार,गुलाब,कनेर आदि के फूल तोड़ने लगतीं, वो उन्हें आँखों के कोर से देख के अनदेखा कर देता, ‘फिर कौन है वहाँ’,’अभी रुको,’ कह धीरे-धीरे उनके पीछे भागता. वो उसको चिढाते हुए हँसते हुए, अंगूठा दिखाते हुए भाग जातीं और दूर खड़े हो चिढ़ाती.


वो उसकी नक़ल उतारते हुए भारी आवाज़ में गातीं और खूब हँसती ,

चिरैया चुन चुन दाना खाए

सुनहले सपने दिन देखें जाए

कि डोली में बैठ के नैहर जाए

पर पिंजरे में जीवन रही बिताए

चिरैया चुन चुन दाना खाए......


वो नकली गुस्सा करता,चिल्लाता और मुँह घुमा के हँस लेता,निहाल हो जाता,उसके बेसुरे गीत और फूल सार्थक हो जाते.


धीरे धीरे ये उसकी दिनचर्या का अभिन्न अंग बन गया,उन कुछ पलों के लिए वो फिर अपनी बेटी को पा लेता, उसे महसूस कर लेता, उसके साथ खेल लेता. धीरे धीरे वो तीनों भी उससे घुल मिल गई.वो उनके लिय फूल तोड़ के रखता, उनके लिए जामुन बीन के रखता,वो बच्चे भी उससे बतियाते, हँसते, गाना सुनाने की फरमाइश करते, वो थोड़े न नुकुर के बाद कुछ पुराने लोक गीत सुनाता.वो वहीँ उसके चबूतरे पे गुट्टे खेलतीं,आपस में फूलों और जामुनों के लिए लड़तीं, वो इनको देखता रहता.अपने खोये हुए दिनों की यादें फिर ताजा हो जातीं, अजीब सा हो जाता उसका मन, न जाने कितने भाव आते जाते रहते उसके अंदर.प्रेम, वात्सल्य,टीस,गिल्ट,अपराधबोध.वो बुरी यादों को,उस दिन को परे हटा परिवार के साथ वाले खुशनुमा दिन याद करने की कोशिश करता, पर उसका गिल्ट बलात सबको हटा उसपे हावी हो जाता.


रविवार को वो बोर होता रहता था जब बच्चों के स्कूल की छुट्टी होती थी.उस दिन दिन काटे नहीं कटता,बाकियों के उलट उसको सोमवार का इंतज़ार रहता. खली समय में फिर उसकी यादों का पिटारा खुल जाता. ना जाने कितनी यादें जुड़ गई है उसकी इस जगह से .पहले कितना महत्वकांक्षी था वो. रेलवे गार्ड बनने का सपना था उसका. उसे आकर्षित करत था झक्क सफ़ेद ड्रेस में टाई लगा के ट्रेन में पीछे बैठ के ताव से झंडी देना और ट्रेन के साथ रोज नई नई जगह घूमना. शादी के बाद दुलारी को वादा भी किया था उसने कि कैसे वो गार्ड बनने के बाद उसे हर जगह घुमाने ले जाया करेगा .उसकी बेटी को भी तो घूमना पसंद था ना बहुत. कितने सारे सपने बुने थे उन लोगों ने साथ में.इसी जगह पर,ये कमरा कभी खुशगवार भी हुआ करता था, जीवित! फूलों की और अगरबत्तियों की खुशबूओं से महकता हुआ.ये क्यारियाँ,फूल और जामुन के पेड़ उन्होंने मिल कर ही तो लगाये थे,कैसे उतावली रहती थे उसकी बेटी अपने नन्हे नन्हे हाथों से इनमे पानी डालने के लिए, फूल चुनने,तितलियाँ पकड़ने के लिए.

यादों के सहारे ही इंसान जीवित रहता है, यादों के वो कुछ भी तो नहीं ,चाहे भले ही वो यादें सुखद हो या दुखद. इन बच्चों के आ जाने से उसके सपने इतने डरावने और बदरंग नहीं रहे,अब उनमें फूलों के कुछ रंग,जामुन की मिठास घुलने लगी थी, लोगों के तानों में कुछ कुछ निश्छल हँसी और बेसुरे गीत भी सुनाई देने लगे थे. अब भी वो रातों में जग जाया करता था और नींद न आने पे दीवार पे टंगी उस घडी की तरफ देखता था और हर बार सोचता था कि इस बार वो जरुर इन घड़ी की सुइयों को चलता हुआ रंगे हाथ पकड़ लेगा,वो उन्हें लगातार देखता रहता है तब तो वो मानो एक ही जगह रहती हैं और फिर जाने कैसे आगे बढ़ जाती हैं . वो छुप-छुप के अचानक से पलट के देखता है तो पाता है कि वक़्त तो रुका हुआ है फिर ये अचानक आगे कैसे बढ़ जाता है.पिछले कई बरस से वक़्त के साथ उसकी आँख मिचौली चल रही थी, जहाँ वक़्त रुका हुआ था,और जिंदगी अंत की तरफ चुपके से बढती जा रही थे.


३.

आज 26 जनवरी है. सुबह जल्दी उठ के रंग डाले थे उसने रजिस्टर के कुछ पन्ने और टांक दिया था गोंद से उन्हें छोटी छोटी डंडियों पर.कितनी खुश हुईं थीं वो सब इन झंडों को लेकर. 12 बजे इलाहाबाद से आने वाली ट्रेन शायद ही कभी टाइम पर आती थी, पर आज अधिक लेट थी. दो बजने को आये थे, आखिरी सूचना के अनुसार ट्रेन अरौल आने वाली थी थोड़ी देर में. उसने रजिस्टर में एंट्री की और उसके पास पड़े हुए सरसों के फूलों का देखा, आज वो उन लोगों को सरसों के पौधे से माला बनाना सिखाएगा.

स्टेशन मास्टर का फोन आया कि ट्रेन अरौल आ चुकी है, उसने गेट बंद किया और पटरी पे लगाया लाल झंडा हटा कर ट्रेन पास करने के लिए हरी झंडी लेने के लिए झुका.तभी उसकी नज़र पटरी के किनारे लगे फूलों के पौधों पे गई. जहाँ वो बच्चे उसे चौकाने और डराने के लिए छुपे बैठे थे.बच्चे इस वक़्त कैसे,फिर उसे याद आया कि आज गणतंत्र दिवस है और छुट्टी जल्दी होती है.उसने उन सबको आवज़ दे कर केबिन के पास आने को कहा, उधर से कोई आवाज़ नहीं आई .वो जल्दी से उनकी तरफ जाने लगा,अपने हाथ में ली हुई झंडी से उसे याद आया कि ट्रेन का समय हो गया है .वो तेजी से उनकी तरफ बढ़ा,पास आने से पहले ही वो हँसते हुए पौधों से निकल के उसे चिढ़ाते हुए भागीं.अचानक ट्रेन की कर्कश आवाज़ ने उसका ध्यान खींचा,जो तेजी से उनकी ओर ही बढती चली आ रही थी.एक बारगी उसके हाथ पाँव सब सुन्न हो गए,एक अनहोनी की आशंका ने उसे घेर लिया.उसने अपने जीवन की सारी ताकत बटोरी और बच्चों की ओर दौड़ लगा दी,जो आवाज़ सुन पटरी पर ही घबरा के गिर गए थे.उसकी जंग आज ट्रेन के साथ साथ ‘कायर कायर’ एक शोर से भी थी, जो हर वक़्त उसके जेहन में बजती रहती थी. अंत में उसे इतना ही याद रहा कि उसने उस बड़ी बड़ी आँखों और निर्झर हँसी वाली बच्ची को जो बिलकुल उसकी बेटी की तरह दिखती थी, पटरी से हटाने में सफल रहा था.

उन अंतिम क्षणों में धुंधलाती और बंद आँखों के सामने मानो पूरा अतीत ही चलचित्र की तरह घूम गया.१० साल पहली की वो शाम, उसकी बेटी,यही फूल, तितलियाँ,इसी केबिन के चबूतरे पे उसके बैठी उसकी पत्नी, ट्रेन, उसकी शून्यता, भय से हाथ पाँव का जम जाना,और अपनी आँखों से अपनी दुनिया खत्म होते देखना,लोगों की धिक्कार भरी निगाहें, पत्नी के आँसू,निर्जीव सा चेहरा, उसे छोड़ हमेशा के लिए चले जाना और उसके पास उसे रोकने की शक्ति भी ना होना.

आस पास से लोगों की भीड़ उसके चारों तरफ जमा हो गई थी,जो उसकी हालत पे दुःख व्यक्त कर रहे थे और बहादुरी की तारीफ़ कर रहे थे, जिसने एक बच्ची की जान बचा दी. अंतिम सांसों के बीच उसने बच्ची को देखा और सही सलामत देख के चैन की साँस ली. जीवन भर की कायरता का भार आज उतर गया था.


 

लेखक परिचय




नाम :डॉ॰ ऋषि कटियार निवास : ग्राम महदेवा, पोस्ट-गजना, अरौल कानपुर नगर। शिक्षा: प्रारम्भिक शिक्षा नवोदय विद्यालय फर्रुखाबाद में हुई। HBTI कानपुर से केमिकल इंजीनियरिंग में बी.टेक. वर्तमान में ONGC आंध्र प्रदेश में कार्यरत। प्रकाशित कृतियाँ : एक कहानी संग्रह –पारिजात के फूल , नवभारत टाइम्स में व्यंग्य लेखन, कई प्रतिष्ठित ऑनलाइन पत्रिकाओं में कहानियाँ और व्यंग्य प्रकाशित। विभिन्न पत्रिकाओं में सतत लेखन ईमेल : rishi.katiyar.hbti@gmail.com फोन: +91-9491069181



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