• डॉ. रमाकांत शर्मा

सुलझते धागे मोह के...

उसने सोच लिया था कि अब वह मोह-माया से दूर ही रहेगा। अवधूत जी बिलकुल ठीक ही तो कहते थे - “यह पूरा संसार ही मिथ्या है। मोह-माया से कब तक बंधे रहोगे? जिस दिन हमेशा के लिए आंखें बंद होंगी, सबकुछ पीछे छूट जाएगा। फिर किसका मोह और कैसा मोह? जितनी जल्दी हो सके इस मोह माया से बाहर निकलना होगा, वरना इहलोक तो बिगड़ेगा ही, परलोक भी बिगड़ जाएगा।“

सत्संग में जाना उसने अभी कुछ दिन पहले ही शुरू किया था। अवधूत जी जो कुछ बोलते हैं, वह उसे सच्चा लगता है। वे समझाते भी तो कितनी अच्छी तरह हैं। अभी आज ही उन्होंने एक दृष्टांत दिया था – “एक राजा था। बड़ी मन्नतों के बाद उसे संतान की प्राप्ति हुई। वह अपने बेटे को कलेजे से लगाए फिरता। कहता यह मेरे कलेजे का टुकड़ा है, इसके लिए मैं सारा राजपाट छोड़ सकता हूं। राजकुमार धीरे-धीरे बड़ा होता गया। राजा भी बूढ़ा हो गया। उसने राजकुमार को युवराज घोषित कर दिया और यह घोषणा कर दी कि वह शीघ्र ही वानप्रस्थ अपनाएगा और उसका प्रिय राजकुमार राज गद्दी संभालेगा।

जैसे ही उसने यह तय किया उसके मन में भांति-भांति के विचार घुमड़ने लगे। जिस राज्य को बनाने-संवारने में उसने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया, जिस प्रजा को उसने बच्चों की तरह पाला और जिन लोगों के बीच रह कर उसने अब तक का जीवन बिताया क्या उसे पल भर में त्याग कर वह सुखी रह सकेगा। क्या वह अपनी रानी और अपने प्रिय राजकुमार को देखे बिना जी सकेगा। जिन भोगों का वह आदी हो चुका था क्या उनके बिना उसका जीवन व्यर्थ नहीं हो जाएगा। उसके सारे अधिकार और शक्तियां क्षण भर में खत्म नहीं हो जाएंगी।

राजा को अनमना और चिंतित देख कर उसके महामंत्री ने जब इसका कारण पूछा तो उसने उसे अपने मन में घुमड़ते सारे विचारों से अवगत करा दिया। सबकुछ सुन कर महामंत्री ने कहा – “महाराज, हम सभी को कभी न कभी तो शरीर त्यागना ही है, आपके न रहने पर युवराज ही आपकी जगह लेंगे। आपको वानप्रस्थ का निर्णय त्याग देना चाहिए।“ राजा ने अपने मन की सी बात सुनी तो तुरंत ही उसे स्वीकार कर लिया और अपना निर्णय बदल दिया।

राजा को ईश्वर ने बहुत लंबी उम्र दी थी। वह बूढ़ा होता गया, गद्दी पर बैठने का राजकुमार का सपना लंबा होता गया। इंतजार की हद होते देख उसने एक दिन अपने मित्र की मदद से राजा को सोते में मौत के घाट उतार दिया और राजगद्दी पर बैठते ही अपने मित्र को अपना महामंत्री घोषित कर दिया।

काश, राजा ने मोह त्याग दिया होता, काश महामंत्री ने उसे मोह-माया से बंधे रहने की सलाह न दी होती तो दोनों का इतना बुरा अंजाम न होता।“

उसने अवधूत जी को मन ही मन प्रणाम किया और सोचा परिवार के मोह से उसे निकलना ही होगा। मकान और मकान की चीजों से क्या मोह रखना, ये तो आदमी का दिमागी संतुलन ही बिगाड़ देती हैं। अब देखो न, बाबूजी मरते दम तक अपनी उस अलमारी का मोह नहीं त्याग पाए जो उन्होंने कभी मात्र चालीस रुपये में खरीदी थी। टीन की उस अलमारी का रंग जगह-जगह से उड़ गया था। उसमें जंग लग चुका था और वह जगह-जगह से टूट रही थी। अलमारी के दोनों किवाड़ों में चार-चार आर-पार दिखने वाले शीशे लगे हुए थे। बिलकुल नीचे वाले दोनों ओर के शीशे टूट चुके थे, जिनमें उन्होंने उसी आकार के गत्ते के टुकड़े काट कर लगा दिए थे। उनकी सभी जरूरी चीजें उसी अलमारी में रखी रहतीं। ऊपर की चटकनी बड़ी मुश्किल से खुलती और बंद होती, पर वे अपनी बूढ़ी उंगलियों से थोड़ी मशक्कत के बाद उन्हें खोल लिया करते और फिर बंद भी कर देते।

उनके कमरे के कोने में रखी उनकी अलमारी अन्य नए सामान के साथ कीमती कपड़े में पैबंद जैसी दिखती और वे सब यदा-कदा उनसे कहते रहते – “बाबूजी, यह अलमारी अब किसी काम की नहीं रही है, इसकी जगह एक नई अलमारी ले लो।“ वे कभी हंस कर, कभी नाराज होकर तो कभी चुप रह कर टाल जाते।

उसे लगता, इतना सब कमाने का क्या फायदा, जब वह चाह कर भी बाबूजी को एक नई अलमारी लेकर नहीं दे सकता। उसे बस बाबूजी की ‘हां’ ही तो चाहिए थी। पैबंद जैसी दिखती उस अलमारी से छुटकारा मिल जाता और बाबूजी भी नई अलमारी में अपनी चीजें बेहतर तरीके से रख सकते। पर, बाबूजी को समझाए कौन?

उस दिन उसने तय कर लिया कि आज वह बाबूजी को मना कर ही दम लेगा। उनके पास जाकर उसने कुछ देर इधर-उधर की बातें कीं और फिर वह अपने असली मकसद पर आ गया –

“बाबूजी, देखो न, यह अलमारी जगह-जगह से टूट चुकी है। जंग लग चुका है इसमें। इसकी रिपेयर भी नहीं हो सकती। कहो तो इसे निकाल कर एक नई अलमारी ले आऊं?”

बाबूजी कुछ देर तक सिर झुकाए बैठे रहे, फिर बोले – “जैसी भी है, रहने दे। कितनी बार ही तो मना कर चुका हूं।“

“लेकिन, बाबूजी नई अलमारी आ जाएगी तो आपको ही अच्छा लगेगा। आपकी चीजें अच्छी तरह से रख जाएंगी। रोजाना इसे खोलने-बंद करने में आपको जो कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है, वह भी खत्म हो जाएगी।“

“मेरी सारी चीजें ठीक तरह रखी हैं। अलमारी खोलने-बंद करने की मुझे अटकल हो गई है। कोई मशक्कत नहीं करनी पड़ती मुझे। जब मुझे कोई परेशानी नहीं है तो क्यों बार-बार इस बात को उठाते हो। मेरे मरने के बाद फेंक देना इसे।“

“बाबूजी ऐसी बात नहीं है, यह बहुत पुरानी टूटी-फूटी हो चुकी है । घर में रखी अच्छी भी नहीं लगती। देखने वाला यही कहेगा कि कमाऊ बेटे के होते हुए भी बाप ऐसी टूटी-फूटी, जंग लगी बेकार सी अलमारी में अपना सामान रखता है। मेरे लिए शर्म की बात है, बाबूजी। है कि नहीं?”

बाबूजी ने उसकी तरफ अजीब सी नजरों से देखा था। वह कुछ कह पाता कि उनकी आंखों से बह कर गालों पर लुढ़क आए आंसुओं को देख कर स्तब्ध रह गया।

“क्या हुआ बाबूजी? मैंने ऐसा तो कुछ नहीं कहा। आपको इतना बुरा लगा है तो मैं फिर कभी ये बात नहीं छेड़ूंगा।“

बाबूजी ने अपने गले में पड़े गमछे से आंसू पौंछते हुए कहा – “तुम्हारे लिए शर्म की बात हो सकती है, बेटा। पर हमने यह अलमारी उस समय खरीदी थी जब चालीस रुपये हमारे लिए बहुत बड़ी रकम थी। दस रुपये देकर यह अलमारी मैं घर ले आया था, बाकी पैसे किस्तों में चुकाए थे। जब मैं यह अलमारी लेकर घर पहुंचा तो तुम्हारी मां खुशी से उछल पड़ी थी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह अलमारी हमारी हो चुकी थी। छोटी से छोटी चीज को तरसती तुम्हारी मां की आंखों में जो चमक मैंने देखी थी, वह मेरी यादों में आज भी ताजा है। वह तुरंत ही इधर-उधर डिब्बों में, गठरियों-थैलों में संभाल कर रखी अपनी चीजें उठा लाई और करीने से उन्हें अलमारी में रखने लगी। बड़े गर्व से उसने सबको बताया कि हमने अलमारी ले ली है। ये वे दिन थे जब अलमारी जैसी चीज साधारण मध्यम वर्ग के लिए विलासिता की चीज थी। सच कहूं, इस अलमारी से मेरी सैंकड़ों यादें जुड़ी हैं, और इसके पोर-पोर में मैं आज भी तुम्हारी मां की छुअन महसूस करता हूं।“ कहते-कहते बाबूजी का गला रुंध गया, शायद वर्षों पहले जा चुकी मां की याद पिघल कर बाहर छलक आई थी।

उस दिन के बाद से उसने अलमारी के बारे में कहना बिलकुल बंद कर दिया। बाबूजी भी जब मां के पास चले गए तब उसने अलमारी से सामान निकाल कर उसे कबाड़ी को बेचा तो पता नहीं क्यों उसका मन जी भर कर रोने के लिए किया था। अलमारी की खाली हो आई जगह उसके भीतर एक अजीब सा खालीपन भरती रही।

उसे समय रहते इस मोह माया से बाहर निकलना ही होगा। अवधूत जी ने कहा था किसी छोटी सी आदत को छोड़ने में भी काफी लंबा समय लगता है, फिर यह तो उस मोह-माया से बाहर निकलने का मामला था, जिससे ज्ञानी-ध्यानी भी सहजता से बाहर नहीं निकल पाते। इसलिए धीरे-धीरे ही इससे बाहर निकलने का रास्ता खोजना होगा। उसने तय कर लिया कि वह कुछ दिन घर से कहीं दूर जाकर अकेला रहेगा ताकि मोह बंधन से धीरे-धीरे बाहर आ सके।

कुछ दिन अकेले बाहर जाने की उसकी बात सुन कर उसकी पत्नी ने कहा – “तुम कभी मुझे अकेला छोड़कर बाहर नहीं गए। अब क्या हो गया? मैं भी चलूंगी तुम्हारे साथ।“

वह उसे नहीं बताना चाहता था कि वह मोह-माया के बंधन से निकलने के लिए यह पहला कदम उठा रहा था। उसे चुप कराने के लिए उसने कहा – “कमर के दर्द की वजह से तुमसे चला नहीं जाता, नहीं तो क्या मैं तुम्हारे बिना जाता? कुछ दिन अपनी पुरानी जगह घूमूंगा और फिर वापस आ जाऊंगा।“ पत्नी का हाथ तुरंत अपनी कमर पर चला गया और फिर उसके मौन ने उसे जाने की इजाज़त दे दी।

उसने जाने के लिए जाना-पहचाना वह शहर चुना जहां उसका बचपन बीता था। उसे याद नहीं था कि पिछली बार वह वहां कब आया था। अनगिनत वर्षों बाद उस शहर में आने के बाद एक धर्मशाला में रुकना उसे अजीब सा लगा था। वह हर उस जगह गया जो उसकी स्मृतियों में अब भी सुरक्षित थीं। अपना वह घर भी देखने गया जहां उसका बचपन बीता था। घर देखते ही उसके जेहन में मां-बाबूजी, बहनों, भाइयों और पड़ोसियों की यादें ताजा हो आईँ, जिन्होंने उसे विचलित कर दिया। उस घर में रहने वालों को जब यह पता चला कि वह बहुत पहले वहां रहा करता था तो उन्होंने उसे घर के अंदर बुला लिया। वह उन कमरों, दीवारों, बारामदों और सीढ़ियों को छूकर महसूसने लगा जिनमें उसके बचपन की खुशबू बसी थी। कितनी ही भूली-बिसरी यादें अचानक उसके सामने आ खड़ी हुईं और वह भावुक हो आया।

वह तुरंत ही वहां से निकल पड़ा, जिन मोह के धागों से वह पीछा छुड़ाने के लिए निकला था, उन्हीं में वह उलझ गया था।

उसने तय किया कि वह किसी ऐसे शहर में जाकर रहेगा जहां वह कभी नहीं गया हो। उस अजनबी शहर में उसने महीने भर के लिए किराए पर एक कमरा लिया और मोह-माया से छुटकारा पाने के अपने उद्देश्य को सफल बनाने में जुट गया। वह उस नए शहर के मंदिरों में गया, दर्शनीय स्थलों में गया और गलियों-गलियों भटका। तीन-चार दिन कहां निकल गए पता ही नहीं चला। पर, उसके बाद अकेलापन उसे खाने लगा। कोई भी तो अपना नहीं था उस शहर में, जिससे वह बातें कर सके। उसे घर की सुविधाएं-असुविधाएं याद आने लगीं। पत्नी और बच्चों का ख्याल उसे बेचैन करने लगा। उसने जितना ही उन सबसे ध्यान बंटाने का जतन किया, उतना ही वह उसमें लिप्त होता गया। आखिर, जबरदस्ती कुछ और दिन काटने के बाद वह अपने घर वापस जाने के लिए निकल पड़ा। निकलने से पहले उसने किराए के उस कमरे को ध्यान से देखा जहां अपनी जिंदगी के कुछ दिन उसने बिताए थे। उसने कमरे को प्रणाम किया। कुछ दिन रहने पर भी वह कमरा उसे अपना सा लगने लगा था। वह वहां से निकलने के लिए उतावला था, पर न जाने क्यों वह कमरा छोड़ते समय उसे अजीब सा लग रहा था।

वह घर पहुंचा तो उसे ऐसा लगा जैसे जहाज का पंछी फिर जहाज पर लौट आया हो। बीबी और बच्चों के चेहरों पर उसके लौट आने की खुशी दिख रही थी। पोते-पोती तो उससे चिपट ही गए।

दिवाली आने वाली थी, घर की सफाई चल रही थी। बच्चों ने नये सोफे का आर्डर दे दिया। वह जिस सोफे पर वर्षों से बैठता आ रहा था, वह दूसरे दिन चला जाने वाला था और उसकी जगह नया सोफा आने वाला था। पता नहीं, वह उस सोफे पर क्यों हाथ फिराने लगा। अगले दिन जब मजदूर वह सोफा घर से बाहर निकाल रहे थे, उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपना हमेशा के लिए उससे बिछड़ रहा हो। क्या हो रहा था उसे, वह निर्जीव चीजों से भी अपना मोह नहीं हटा पा रहा था, फिर जीते-जागते इन्सानों से मोह कैसे हटा पाएगा।

अवधूत जी के पास जाते-जाते वह ठिठक कर रुक गया। उसके जेहन में एक प्रश्न बार-बार उठ रहा था, अगर मोह-माया इतनी ही बेकार चीज है तो ईश्वर ने उसे बनाया क्यों? ईश्वर ने कोई भी तो चीज बेकार नहीं बनाई है। यहां तक कि उसका बनाया जहर भी दवा का काम करता है। लोगों को आपस में बांधे रखने के लिए मोह –माया की डोर बनाने के सिवा शायद उसके पास और कोई विकल्प नहीं था। यह मोह ही तो कर्तव्यों के निर्वहन के लिए लोगों को प्रेरित करता है। जिन चीजों का वे उपयोग करते है, अगर उनसे मोह न हो तो वे उन्हें ठीक-ठाक और साफ-सुथरा क्यों रखेंगे? पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियां निभाने का दायित्व भी तो उसी ईश्वर ने दिया है, जिसे पाने के लिए मोह-माया से दूर रहने के लिए कहा जाता है। हां, किसी भी चीज की अधिकता तो निश्चय ही बुरी है। भगवद् गीता के तेरहवें अध्याय के ग्यारहवें पद में कहा गया है – ‘खुशी बहुत सी चीजों को इकट्ठा करने में नहीं है, बल्कि उनमें आसक्ति कम करने में है’। मोह के धागों को उलझाने की जगह उन्हें सुलझाने की समझ भी तो ईश्वर ने ही दी है।

उसने तय किया कि इस सबके लिए उसे घर छोड़ने की जरूरत नहीं है। साधु-संतों का काम उनके लिए ही छोड़ देना चाहिए। अवधूत जी के पास जाने का इरादा उसने पूरी तरह छोड़ दिया है।


लेखक डॉ. रमाकांत शर्मा – परिचय

मेरे बारे में

मेरा जन्म 10 मई 1950 को भरतपुर, राजस्थान में हुआ था. लेकिन, पिताजी की सर्विस के कारण बचपन अलवर में गुजरा. घर में पढ़ने पढ़ाने का महौल था. मेरी दादी को पढ़ने का इतना शौक था कि वे दिन में दो-दो किताबें/पत्रिकाएं खत्म कर देती थीं. इस शौक के कारण उन्हें इतनी कहानियां याद थीं कि वे हर बार हमें नई कहानियां सुनातीं. उन्हीं से मुझे पढ़ने का चस्का लगा. बहुत छोटी उम्र में ही मैंने प्रेमचंद, शरत चंद्र आदि का साहित्य पढ़ डाला था. पिताजी भी सरकारी नौकरी की व्यस्तता में से समय निकाल कर कहानी, कविता, गज़ल, आदि लिखते रहते थे.

​ग्यारह वर्ष की उम्र में मैंने पहली कहानी घर का अखबार लिखी जो उस समय की बच्चों की सबसे लोकप्रिय पत्रिका पराग में छपी. इसने मुझे मेरे अंदर के लेखक से परिचय कराया. बहुत समय तक मैं बच्चों के लिए लिखता और छपता रहा. लेकिन, कुछ घटनाओं और बातों ने अंदर तक इस प्रकार छुआ कि मैं बड़ों के लिए लिखी जाने वाली कहानियों जैसा कुछ लिखने लगा. पत्र-पत्रिकाओं में वे छपीं और कुछ पुरस्कार भी मिले तो लिखने का उत्साह बना रहा. महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का भी पुरस्कार मिला. कहानियां लिखने का यह सिलसिला जारी है. अब तक दो कहानी संग्रह – नया लिहाफा और अचानक कुछ नहीं होता प्रकाशित हो चुके हैं. तीसरा संग्रह भीतर दबा सच प्रकाशनाधीन है. कहानियां लिखने के अलावा व्यंग्य लेख और कविताएं भी लिखता रहता हूं.

हर कोई अपने-अपने तरीके से अपने मन की बात करता है, अपने अनुभवों, अपने सुख-दु:ख को बांटता है. कहानी इसके लिए सशक्त माध्यम है. रोजमर्रा की कोई भी बात जो दिल को छू जाती है, कहानी बन जाती है. मेरा यह मानना है कि जब तक कोई कहानी आपके दिल को नहीं छूती और मानवीय संवेदनाएं नहीं जगा पाती, उसका आकार लेना निरर्थक हो जाता है. जब कोई मेरी कहानी पढ़कर मुझे सिर्फ यह बताने के लिए फोन करता है या अपना कीमती समय निकाल कर ढ़ूंढ़ता हुआ मिलने चला आता है कि कहानी ने उसे भीतर तक छुआ है तो मुझे आत्मिक संतुष्टि मिलती है. यही बात मुझे और लिखने के लिए प्रेरणा देती है और आगे भी देती रहेगी.

नौकरी के नौ वर्ष जयपुर में और 31 वर्ष मुंबई में निकले. भारतीय रिज़र्व बैंक, केंद्रीय कार्यालय, मुंबई से महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति के बाद अब मैं पूरी तरह से लेखन के प्रति समर्पित हूं.

ई-मेल – rks.mun@gmail.com

मोबाइल 9833443274

लेखक डॉ. रमाकांत शर्मा का साहित्यिक परिचय


- शिक्षाएम.ए. अर्थशास्त्र, एम.कॉम, एलएल.बी, सीएआइआइबी, पीएच.डी(कॉमर्स)