• डॉ सविता पाठक

चाँद दुर्रानी और सोनी, उर्फ़ धारणा पाहवा


दोनों की उंगलियां एक दूसरे में बंधी थी। लड़के की लम्बी पतली उंगलियां और लड़की की हल्की मोटी और छोटी उंगलियां। जैसे एक ठेले पर खीरा और ककड़ी दोनों लदे हो। लड़के ने बड़े प्यार से लड़की की आंखों में देखकर एक शेर पढ़ा -

“पढ़ लिए मैंने उलूमे शर्कों-गर्ब

रूह में बाकी है अब तक दर्दो-कर्ब

इकबाल का शेर पेशे नज़र है।”

- किसी दिन तुम कुटाओगे।

- फिर कूट के लोग क्या बनायेंगे? हिन्दू? फिर तो बढ़िया है कोई दिक्कत नहीं, फिर कहेंगे ताजा ताजा हिन्दू ले लो ...

- पता है मेरी बुआ की बेटी अपने प्रेमी को पगलवा ही कहती है।

- तो क्या तुम मेरा भी नाम पगलवा रखने वाली हो।

- बेटा तुम्हारे अब्बा को पता चल गया तो मस्जिद ले जाकर झाड़ू से इश्क का भूत उतरवा देंगे। अभी तो नाटक की रिहर्सल के लिए आ जाते हो बाद में तो सब्जी मंडी में ही नजर आओगे। फिर करना आलू ले लो प्याज ले लो ...

-कौन डरता है पिटने से? ये बात हर बार कहता बड़ी अदा से है लेकिन उसकी आंखों में घर में मचा कोहराम तैर जाता है। आठ भाईयों में चांद सबसे छोटा है डील डौल से भी। बहुत ही नाजुक। जैसे मां ने दुनिया को अलविदा कहते समय अपनी सारी नफासत उस थमा दिया हुआ। कहने को वो दुर्रानी था लेकिन न कहीं से वो डील डौल, न ही वैसे जोशीली जबान।

- अपने हाथ देखो तुम। ऊपर से अपनी ऊंगलियां सच में यार ये किसी कलाकार की है। किस जमाने में तुम्हारे पुरखों ने तलवार थामी थी तुम तो उठा भी नहीं सकते तुम तो हकदार ही नहीं हो कि तुम्हे कोई दुर्रानी कहे।

चांद हंसते हुए जवाब देता - तो क्या लिख दू चांद सोनी या चांद पाहवा!


इन दिनों शहर का रंग मोहब्बत है। सेंमल का पेड़ इस मोहब्बत में शामिल था। जब कलियां होती तो पत्ते नहीं और पत्ते होते तो फूल नहीं। छह पत्तों की छतरी बना कर पूरा पेड़ सबमें जुदा था।तेज तपती दोपहरी में वो पेड़ फूलों को टपकाता खड़ा रहता था और ठीक उसी के पास रिहर्सल करने वाली वो जगह थी। एक पुराना सा सभागार या फिर दो कमरों का मकान। वहां कि सीलन लगी दीवारों पर नमक नहीं झरा था हल्की सी काई लगी थी हर जगह ऐसी कि उगने को तैयार खड़ी हो। उस ओंदी सी जगह में शहर की वो जमात आती थी जो शहर से थोड़ी जुदा थी। वो अपने नाटकों से अलग ही रूप धर के अलग ही बहस छेड़ देते थे। उनके लिए शहर न तो हिंदू, मुसलमानों और सिक्खों में बंटा हुआ था और नही मुहल्लों में। उन्होंने अपना मुहल्ला बनाया था और वे जहां भी जाते थे अपना मुहल्ला बसा लेते थे। कभी पोपलर के किनारे बहती नहर के पास पहुंच जाते और हल्के से लहराती लहरों पर कोई गाना छेड़ देते। चांद तो कैडबरी के टाइटल गीत - कुछ खास है हम सभी में’ ... कहकर छपाक से पानी धारणा के मुंह पर फेंक देता। नहर के किनारे इकलौता चायवाला भी अदरक कूटते कूटते कवितायें और शेर सुनाने लगा था।

शहर रूमानी तो नहीं था लेकिन दर्जन भर वो आंखे रूमानियत की बारिश में भीगती और इश्क के धूप में सिकतीं थी। उनकी बेपरवाही ही थी कि वो पांवधोई नाले को नदी कह देते थे। उस शहर की किसी दीवार को उम्मीद का नाम देते तो लकड़ी बाजार से काठ के कंगन और काठ की कटोरियां पर हुई पच्चीकारी को हिन्दुस्तानी तहजीब मिसाल बताते हुए किसी नृविज्ञानी की तरह जिरह करने लगते थे। वह वो वक्त था जब शेयर मार्केट में दो दूनी दस चल रहा था। लेकिन वो तो अब भी लकड़ी के पुल पर खड़े होकर आती जाती रेलगाड़ियों से दुआ मांगते थे।

ये शहर है कि जानेमन हिन्दुस्तान आधे सिख, आधे हिन्दू, और आधे मुसलमान फिर गुगाल का मेला उसके पहले घर घर जाकर जोहारवीर के झंडे लेकर लोग ढ़ोल बजाते हैं फिर नौगजा पीर। चांद को जब से सोनी से प्यार हुआ उसे अपने शहर की हर चीज से प्यार हो गया था। हाट-बाजार से लेकर निहारी का ऐसा बखान करता मानों हिन्दुस्तान का दिल सहारनपुर में और ये शहर उसकी सोनी में और सोनी उसके दिल में खिलखिला रही हो।

तेरे इश्क में कुछ भी कम नहीं है किसे फिक्र थी ब्रांडेड कपड़ों की, यहां तो जनाब ये गैंग फटे कपड़े भी पहन के घूम ले तो लोगों की निगाहें टंग जाती है। और फिर धारणा तो गजब की जिद्दी थी उसे पता था कि घर से अगर पैसा मिलना बंद हो जाय तो भी मंगलबाजार से लाये हुए टुकड़ों को जोड़ के तो पूरी चांदनी बुनी जा सकती है। लुधियाना,पानीपत से आया माल बाजार में पटा पड़ा रहता है। गली-गली कपड़ों की दुकान। मंगलवार का दिन औरतों के लिए किसी त्यौहार से कम नहीं है यहां। बाजार लगा नहीं कि औरतें शुरू हो गई। किलो के दाम में कपड़ें,पीस के हिसाब से कपड़े,औरतें चुन चुन कर मिलान कर कर के कपड़े लेती थी। कौन सा टुकड़ा कब कहां काम आ जाय, सिलने के बाद अंदाजा लगाना मुश्किल है कि पूरा पहनावा मात्र सौ या दो सौ रूपये में तैयार हुआ है। अजब गजब है ये बाज़ार सिल्क के गोटे, तमाम तरह की जरी, क्रोशिया की लेस,सटल की मजबूत बेलें जो चाहे वो सब मौजूद है। धारणा यानि सोनी को बहुत मजा आता था इस बाजार में घूमते समय। बस जाकर चांद के घर देना होता था और जाकर उसकी बहन को पटाना पड़ता था ऐसा सिलना कि बस ...


शादी का मतलब साथ कपड़े धोयेंगे, खाना बनायेंगे, घर सजायेंगे। चांद अकसर ही सोनी से कहता था।

उसी जगह, शहर में आग लग जायेगी, दंगा हो जायेगा। इतिहास के प्रोफेसर और नाटक में भी प्रोफेसर का किरदार निभाने वाले प्रो शर्मा उन्हें समझा रहे थे। तुम लोग ये बेवकूफी मत करो। वैसे भी शादी ब्याह के बाद कुछ बचता नहीं।

चांद और सोनी जोर जोर से हंसने लगे, अरे सर आप भी डरते हो। कहां तो डायलाग - मोहब्बत जिंदाबाद और कहां घबरा रहे हो। शादी ही तो करना चाहते हैं। अब क्या करें घर वाले बाहर आने जाने देने से रहे। इससे पहले की वो हमारी शादी कहीं और करें हम पहले ही शादी कर लेतें हैं। शादी हो जायेगी तो यही कहेंगे कि पहले से बर्बाद थे और बर्बाद हो गये।

तुम लोग हर चीज नानसीरयसली लेते हो।

चांद और सोनी ऐसे ही थे। चांद ने उसी रात सोनी को एक लम्बी चिठ्ठी लिखी। यह उसकी पुरानी आदत थी एक ही शहर में रह कर तकरीबन रोज मुलाकात होने के बाद भी वो खत लिखता है ... हम लोग साथ कपड़े धोंयेंगे, बाजार साथ में सब्जी लेने जायेंगे। तुम आटा गूंथना मैं रोटियां सेंकूगा। सुबह की चाय मैं बनाऊंगा। तुम मिद्दे के यहां से पापे ले आना अब पापे को एक साथ दांत से तोड़ कर आवाज करेंगे ...

चांद जैसे बचपन का वो हिस्सा जीना चाहता हो जो उससे बहुत पहले गुम हो गया था।


मगरिब की नमाज से लेकर रात की नमाज तक उसका काम अब्बू के साथ सब्जी बाजार जाना होता था। उसे फुर्सत ही नहीं मिलती थी। बस एक बार उसे मौका मिला था मोहल्ले के नसीब भाईजान जो थियेटर के पीछे पागल थे उनसे मिलने का। उनको देखकर अब्बू पालक की तरह सड़ जाते थे। उनका बस चलता तो नसीब को मोहल्ले से निकलवा देते लेकिन जोर नहीं था। क्यों कि स्कूल कालेज जाने वाले लड़के नसीब के दीवानें थे और औरतें भी न मालूम क्यों अपने लड़के लड़कियों को घर बाहर का काम सीखाने के बजाय नाटक सिखलाने में मशगूल रहती थी। बहरहाल नसीब भाई जान ने ही उसे पहला रोल दिया था। रोल था एक बच्चे का जो एक लड़के का प्रेमपत्र उसकी प्रेमिका को पहुंचाता था। एक दिन लड़की के घर वालों ने लड़के को पकड़ लिया और उसकी पिटाई करते हैं। चांद ने वो रोल इतना बखूबी किया कि दर्शकों की आंख नम हो गई। वैसे पकड़े जाने पर चांद को सचमुच लगा कि अब लोग लड़के को, लड़की को और उसको बहुत मारेंगे। और वो सचमुच माफी मांगने लगा।


इंशाअल्ला तुम्हारा लड़का गज़ब का कलाकार है।

चांद के अब्बा ने कहने वाले को तो कुछ नहीं कहा लेकिन घर में तुफान खड़ा हो गया। बदले में चांद मियां की सचमुच अपने पिताजी से पिटाई हुई और उसे बचाने लेकिन नशा तो चखा जा चुका था. अब तो बाहर में जितनी शोहरत मिलती घर में उतनी पिटाई, उतनी लड़ाई। वक्त के साथ अब्बू ने मार पिटाई तो बंद कर दी लेकिन बोलना ही छोड़ दिया था। चांद शहर के हर नाटक का मुख्य किरदार होता। कभी वो वर्दी पहने कोर्टमार्शल के कटघरे में खड़ा कोई सैनिक होता जिसके साहस का लोहा पूरा मंच मान रहा होता था तो अगले ही किसी नाटक में वो चार्वक बन कर सनातनी परम्परा पर प्रश्न खड़े कर रहा होता। धारणा नाटक में कभी बैकग्राऊंड में अलाप गाती तो कभी अमृता प्रीतम बन कर इश्क का नाम दुहराती थी। कभी वो लटिया की छोकरी बन जाती तो कभी नसीमन बन कर तीन तलाक के बदले खुद तलाक तलाक कह जाती थी। उनके नाटक सिर्फ अलग अलग विषय नहीं थे अलग अलग किरदार नहीं हर किरदार में उनके सोचने समझने का एक आयाम जुड़ा होता था।

 

लकड़ी का पुल टूट गया, रंगमंच की इमारत ढ़ह गयी

क्या शहरों की कोई उम्र होती है। अगर इस धरती की उम्र है और कुछ तो कहते हैं कि इस पूरी कायनात की एक उम्र है तो इस शहर की उम्र हो गयी कहूं तो क्या गलत होगा। शहर जवान हो रहा है या बूढ़ा, यह नजर का फेर है। लकड़ी के पुल पर गाड़ियां नहीं जाती थी शहर को बहुत सारी गाड़ियों की जरूरत आ पड़ी थी नया पुल बनने लगा। जिस पुल पर कभी कोई आदमी किसी दुर्घटना में नहीं मरा उसकी लकड़ी की खप्पचियां निकलने पर कोई बचाने नहीं आया। पुल की खप्पचियां निकल रही थी। धीरे धीरे वो गरीबों का पुल हो गया। उस पुल पर किसी ने इश्तिहार तो नहीं लगाया कि जाना मना है पुल गिरने वाला है लेकिन पुल खुद में इश्तिहार बन गया था। साइकिल सवार इस पुल पर साइकिल चढाकर पार उतारने में ज्यादा सुरक्षित महसूस करते थे। शहर में एक नया माल बन गया उस पर तरह तरह की दुकाने थी। कल तक जो लोग लकड़ी का पुल पार करके काठ के सामान की दुनिया में जाते थे वो बस अब माल में सजी एक लकड़ी की दुकान से समान लेने लगे। कभी कभार कोई बाहरी लकड़ी के सामान की दुकानों को देखने की मंशा में जाता था। गुघाल का मेला अब गरीबों का मेला था ज्यादातर गरीब हिन्दु मुसलमान वहां जाते थे किसी पढे लिखे को अब वहां घबराहट होती थी। नाटक करने का मतलब अब बम्बई की तैयारी थी। ज्यादातर लोग रंगमंच छोड़ कर जा चुके थे।

रंगमंच की इमारत ढ़ह सी गयी थी। पिक्चर हाल तो पहले भी थे शहर में लेकिन लोग नाटक देखने जाते थे तकरीबन पांच सौ को एक साथ बिठाकर नाटक दिखाने वाला रंगमंच सियासी नाटक का शिकार हो गया। कभी किसी नेता ने वादा किया कभी किसी नेता ने लेकिन कोई भी उसके नवीनीकरण पर को तैयार नहीं हुआ। उलटे उस जगह पर कईयों की निगाह टंग गयी। शहर में बारिश कभी कभी आती थी और पावधोई नदी कबके पूरी तरह से नाला बन चुकी थी उसका पानी घरों में घुस आता था। शहर में बनी पेपर मिल और गन्ना मिल जो कभी रोजी रोटी और सम्पन्नता लेकर आयी थी अब नये लोगों को उसकी गंध गले तक भर आती थी।

आधे हिन्दु आधे मुसलमान आधे सिख वाले शहर में दंगा हुआ था।

वनिता शहर में दंगे के बाद माहौल कवर करने अपने चैनल की टीम के साथ आयी थी। पूरा शहर आग में जल रहा था। तरह तरह के वीडियो और मैसेज आ रहे थे। अगर आप हिंदू हैं तो अपने घर के आगे भगवा लगा ले आप के घर को कुछ नहीं होगा। अगर आप मुसलमान हैं तो हरे झंडे लगा ले ..कहीं जलती हुई बस थी तो कहीं भगदड़ में छूट गई बच्ची। उसको भी लोग जूम करके देख रहे थे कि वो किस धर्म की है। हाथ में बंदूक थामें कोई जै श्रीराम के नारे लगा रहा था। हाथ में रोली और चावल लिए एक सेना घूम रही थी और सवाल कर रही थी आप हिंदू हैं या मुस्लिम। तिलक लगवा लो भाई आसानी होगी। शहर टोपी और तिलक में बंट गया था। चारो तरफ लूट और आगजनी। लकड़ी के लट्ठे अब तक जल रहे थे, लुटेरों की टोलियां घूम रही थी। पुलिस हाथ बांधें खड़ी थी।

आग और नफरत की दुनिया की ताबीर भी झूठ से हुई थी एक अखबार में खबर छपी थी कि एक लड़की को मुसलमान लड़का भगा ले गया है। और उसने उससे जबरदस्ती निकाह कर लिया है। उसके बाद जो लव जेहाद का खेल शुरू हुआ कि क्या कहें। वनिता चुपचाप रिपोर्ट लिखती जा रही थी इस भरोसे के साथ कि एक दिन वो लड़की बतायेगी कि कैसे उस पर झूठ बोलने का दबाव है। तभी फोन आया कि वो लड़की तो प्रेस के सामने बयान दे रही है कि कुछ लोगों ने उसे झूठ बोलने के लिए धमकाया था। वनिता ने मन ही मन गहरी सांस ली। लेकिन आग तो लग चुकी थी किसे फर्क पड़ता है कि उसकी चिंगारी झूठ से शुरू हुई। उसके लिखने कहने से कहां फर्क पड़ता है वैसे भी जरूरी नहीं कि वो खबर भी इतनी जोर शोर से चले जितनी झूठ की खबर चली थी। उसका सरदर्द बढता जा रहा था लग रहा था कि दिमाग के एक हिस्से में गर्म लावा बह रहा है और उसकी चौंध आंखों के आगे बार बार आ रही है। अचानक उसके जेहन में एक चेहरा कौंधा। लगा कि ठंडी पट्टी किसी ने रख दी है। वह पूरे दस साल बाद दुबारा इस शहर में आयी थी।

उसके साथ का कैमरामैन बोलता जा रहा था, नया नया लड़का था। वनिता को अपने अनुभव बता रहा था कि यहां तो चारो तरफ लव जेहाद की बातें हैं। कालेज के बाहर, कोचिंग के बाहर, पुलिस की गाड़ी चक्कर काटती रहती है। लड़कों की खैर नहीं थी, खासतौर पर मुसलमान लड़कों की। ऐसे लग ही नहीं रहा है कि हम आजाद हिन्दुस्तान में रह रहे हैं. जानती है कल मैं पार्क के पास खड़े होकर अपनी एक दोस्त से बात कर रहा था, तभी वर्दी में एक महात्मा आये। उन्होंने मेरी दोस्त से पूछना शुरू कर दिया, हां बेटा ये कौन है? आप शाम को घर क्यों नहीं गई। उसने झिड़क दिया। बोली - क्या मतलब अंकल? मैंने तो आप से कोई शिकायत नहीं की। दोस्त है मेरा। हम बात कर रहे हैं। क्या नाम है तुम्हारा कहां पढ़ते हो? मैंने बताया, भाई मैं प्रेस हूं, जिवेन्द्र नाम है।

पुलिस वाले का रुख नरम पड़ गया। अरे तो भई तुम लोग सड़क पर क्यों खड़े होकर इतनी देर से बात कर रहे हो?भले घर के लड़के हो, इतना बड़ा बाल रखा है और दाढी भी मुसलमानों जैसे बढा रखी है। मुझे लगा ... आजकल लौंडे बहुत टहल रहे हैं समझ ही रहे हैं आप।

मेरी दोस्त उसके ऊपर खूब चिल्लाई, अंकल बहुत हो गया आप अपने घर के लड़के लड़कियों को ये सब समझायें।

पुलिसवाले को अगर यह नहीं पता चल गया होता कि ये खाते पीते हिन्दू घर से हैं तो वो मुझे पक्का पीट देता। दांत पीसता हुआ वो वहां से चला गया।


जिवेन्द्र की बातें सुनकर वनिता की घबराहट और बढ़ गयी। उसके दिमाग में सिर्फ एक नाम बार बार आ रहा था कि किसी तरह चांद और सोनी को देख ले। रह रह कर कई आशंकायें उसे घेर ले रही थी। सोनी और वनिता ने महाराज सिंह कालेज से पढ़ाई की थी। यहीं पर उसे वो प्रोफेसर मिले थे जिनकी क्लास में उन्होंने जाना की तैरूत जबूर इंजिल एक ही बात के कई सिक्वेल है। यहीं पर उसने जाना कि हिन्दु और मुसलमान का बंधन इतना बड़ा नहीं की एक दूसरे को न समझा जा सके। वनिता को शहर से निकले कई साल हो चुके थे पुराने नम्बर कब के गुम हो गये थे। प्रोफेसर शर्मा को कैंसर लील चुका था। उसने कई लोगों को फोन किया उससे कुछ भी पता नहीं चला। तभी कहीं से पता चला कि धारणा पठानपुरा में रहती है। पठानपूरा की गलियों को वो खूब पहचानती थी। उस संकरी सी गली में दोनो ओर नालियां खुली थी। उसी के किनारे दो बहनें जिन्होंने कभी दहेज न देने की कसम खाकर दुकान खोली थी अपनी दुकान में खड़ी रहती थी। संघर्ष और जीवन का एक बड़ा हिस्सा जैसे एक डमी में कैद होकर वही ठहर गया हो। उससे थोड़ा दूर बड़ा सा मकान था। वनिता ने मन ही मन राहत की सांस ली। तो धारणा यहां रहती है। खिड़की के ऊपर एक चिक लगी हुई थी। दरवाजे से अंदर जाने पर पता चला कि ये मकान नहीं मुहल्ला मकान है। तलघर से लेकर दुछत्ती तक किरायेदार रहते हैं।

-धारणा यहीं रहती हैं?

- जी,ऊपर।

और ऊपर जाने पर पता चला कि सीढ़ी से कट करके जो दो सीढ़ी उतरती है वो दुछत्ती में जाती है धारणा वहीं रहती है। एक छोटा सा कमरा जिसके किनारे एक स्टेज नुमा जगह बनी थी बस सहुलियत यह थी कि कमरे में एक बड़ी सी खिड़की थी जो बाहर की ओर खुलती थी उस पर एक चिक डला था। टायलेट बाथरूम नीचे शेयर्ड था।

दोनों दस साल बाद मिल रहे थे। गंगा-जमुना में न मालूम कितना पानी बह चुका था।

- तुम परेशान न हो जाना, मैं यही रहती हूं और बिल्कुल सही सलामत हूं।

- चांद कहां है? वनिता ने सिर्फ डरते डरते इतना पूछा उसका दिल घबरा रहा था बहुत दिनों से बुरी खबरें सुनते सुनते सवालों की शक्ल में कुछ भी पूछना और जवाब देने से ही दिल की घड़कन बढ़ जाती थी।

सोनी ने हलके से हंसते हुए कहा, डरो नहीं सब्जी मंडी गया है। शाम तक वापस आ जायेगा।

- अरे चांद मंडी में काम करने लगा?

- तो क्या करता दुर्रानी तलवार चलाता।

हमेशा की तरह चाय चढ़ा दी गई थी। कमरा ऐसे लग रहा था दो लोगों के एक साथ कब्र में लेटने की जगह हो। ऐसे लग रहा था कि थोड़ा और उचकी तो छत से सिर टकरा जायेगा।

धारणा ने दो तीन वाक्यों में पिछले दस सालों का सिलसिला रख दिया। हमने कोर्टमैरेज की घर ने पूरी तरह से निकाल दिया। चांद के घर वाले निकाह चाहते थे मैंने वो भी नहीं किया और उसके अब्बू तो पहले से ही हमसे चिढ़ते थे उन्होंने कुछ भी देने से मना कर दिया। मेरे घर से कोई सहारा मिलने का सवाल ही नहीं था। हमने सोचा कि बच्चों को नाटक सिखायेंगे लेकिन वो बहुत दिन चला नहीं। शहर बदल चुका है। शर्मा जी की कैंसर से मौत हो गई और जो बाकि दोस्त थे वो मुम्बई चले गये।

हम लोग मुम्बई नहीं गये चांद की भी जिद थी और मैं भी सोचती थी कि यहीं रह कर इस शहर में काम करेंगे। लेकिन हालात बहुत बदल गये हैं। अब मोहब्बत लव जेहाद कही जाती है। देखो न हम रोज सोचते हैं कि इस पर नाटक लिखेंगे लेकिन अब थियेटर करने वाले लोग भी हिंदू मुसलमान हो गयें है। ग्रुप के कई लोग इधर उधर हो गये। अंशुमान तो ड्रिंक करने लगा। तुम तो पहले ही ग्रुप छोड़कर जा चुकी थी। और बताओ

तभी बाहर एक वैन की पी पी सुनाई दी - अरे मेरी बेटी आई होगी स्कूल से।

सलामवालेकूम आंटी, कहकर एक छोटी सी बच्ची आ गई ।

वालेकुमअस्लाम, तो आप कौन हैं?

हम सारा सोनी हैं।


थोड़ी देर में चांद आ गया। वही पुराना अंदाज उधड़ी सी जीन्स और एक हल्की झर सी गयी टी शर्ट पहने। हमेशा की तरह मुस्कुराता हुआ। मोहब्बत के इस रंग में घर की माली हालत भले खराब हो लेकिन दिल की दौलत उतनी ही मालामाल थी। वनिता जैसे चांद से कहना चाहती हो यहां रहता है हिन्दुस्तान का दिल। ये ख्याल आते ही इस जलते शहर की तस्वीर पर मानों किसी ने ठंडा पानी छिड़क दिया हो और उसके दिमाग में बहता लावा ठंडा सा हो गया। ऐसे लगा जैसे नैसोडाम की गोली उसके दिमाग में घुल रही है और दिप दिप करता उसका दिमाग शांत हो रहा हो।


 

लेखक डॉ सविता पाठक – परिचय


अध्यापन के पेशे से जुड़ी सविता पाठक साहित्य की अलग-अलग गतिविधियों में शामिल रही हैं। उन्होंने ‘अम्बेडकर के जख्म’ नाम से उन्होंने ‘वेटिंग फॉर वीजा’ का हिन्दी अनुवाद किया। पत्रिका ‘रविवार डाइजेस्ट’ के लिए विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक लेखों का उन्होंने नियमित तौर पर अनुवाद किया है। वेटिंग फॉर वीजा का हिन्दी अनुवाद बाद में ‘फारवर्ड प्रेस’ से भी प्रकाशित हुआ। सविता पाठक ने पियेद्रो पेयत्री, निकोला डेविस, लिजली कुलसन, इनामुल ओर्तिज आदि कवियों की चुनिंदा कविताओं का अनुवाद साहित्यिक पत्रिका ‘पल प्रतिपल’ के लिए किया। विश्व के अलग-अलग देशों के कवियों की कविताओं का उनके द्वारा किए गए अनुवाद पिछले कई अंकों से पल प्रतिपल पत्रिका के संपादकीय का हिस्सा रहे हैं। क्रिस्टीना रोजोटी के अनुवाद ‘गोबलिन मार्केट’ पर हिन्दी नाटक अकादमी से प्रायोजित नाटक ‘माया बाजार’ का मंचन प्रख्यात रंगकर्मी प्रवीण शेखर ने एनसीजेडसीसी इलाहाबाद में किया। ‘कथन’ और विभिन्न डिजिटल साइट के लिए सू लिज्ली की कविताओं का अनुवाद उन्होंने किया जो काफी चर्चा में भी रहा। ‘रचना समय’ पत्रिका के लिए उन्होंने सिमोन द बोउआर के लेख का अनुवाद किया। इसके अलावा, उन्होंने साहित्य अकादेमी, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस और गार्गी प्रकाशन के लिए भी लेख और कविताओं का अनुवाद किया है। सविता पाठक की कहानियां और लेख नया ज्ञानोदय, कादंबिनी, वर्तमान साहित्य, पूर्वग्रह आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आकाशवाणी और भारत भवन जैसे संस्थानों में परिचर्चा और कहानी पाठ भी किया है। सविता पाठक ने अंग्रेजी साहित्य में वीएस नॉयपाल के साहित्य और जीवन संबंध पर वर्ष 2008 में पीएचडी की है। सविता पाठक का जन्म 02 अगस्त 1976 में उत्तर प्रदेश के जौनपुर शहर में हुआ। पढ़ाई-लिखाई अलग-अलग शहरों में हुई है। फिलहाल वे दिल्ली विश्वविद्यालय के अरविंद महाविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन कर रही हैं। drsavita.iitm@gmail.com

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