आसमान में छाए काले मेघ को देख कर अम्मा ने कहा-सत्या! लकड़ी उठाकर छप्पर में रख दे नहीं तो गीली हो जाएगी फिर खाना कैसे बनेगा। सत्या ने लकड़ी हटा तो दी पर वर्षा थी कि और विकराल रूप धारण कर कहर बरसा रही थी। धीरे-धीरे छप्पर से पानी टपकना शुरू हुआ फिर थोड़ी ही देर में बाईं तरफ की दीवार ढह गई। पूरी रात जागते ही बीता। दूसरे दिन सुबह कहीं पत्ता भी नहीं था जिसे जला कर खाना पकाया जा सके। अम्मा ने कहा-सत्या जा हवेली चली जा और मालकिन से खाने को कुछ माँग ला।

- न अम्मा! मैं किसी भी हाल में माँगने नहीं जाऊँगी।

- क्यों माँगने से छोटी हो जाएगी?

- छोटी होऊँ या न होऊँ पर माँगने नहीं जाऊँगी, वह भी हवेली तो बिलकुल ही नहीं।

अम्मा ने सिर पीटते हुए कहा-इसी दिन के लिए रोती थी कि एक बेटा हो जाता तो कम से कम अपनी जिम्मेदारी तो समझता!

- अम्मा! अब यह लड़का-पुराण मत शुरू कर। क्या कर लेता लड़का जो मैं नहीं कर सकती?

- तेरे नखरे ही नहीं संभलते। अरे तू ग़रीब घर में पैदा हुई छोटी जात की है। माँगने में काहे का शरम?


चाची ने सामने सत्या को देखकर आँख फेर ली क्योंकि उन्हें पता था कि वह क्यों आ रही है। सुबह से कई लोगों को भूना चना और गुड़ दे चुकी थीं। पाय लागी चाची-सत्या ने कहा तो चाची ने अपनी सुपारी काटते हुए पूछा-कैसे आना हुआ?

- तुम तो जानती ही हो चाची, कल कैसी बरसात हुई? लकड़ी तो दूर घर में एक सूखी पत्ती भी नहीं है कि जलाकर कुछ पकाया जा सके। अब तुम्हारा ही आसरा है।

चाची ने भी सोचा कि कुछ देने से पहले कुछ काम करवा लिया जाए सो कहा-हाँ हाँ, हम तो अपने खून पसीने की कमाई तुम लोगों पर लुटाने के लिए ही यहाँ बैठे हैं। जिसे देखो वही मुँह उठाए माँगने चला आ रहा है।

सत्या को चाची की कड़वी जुबान के बारे में पता था। वह वहीं ज़मीन की तरफ सिर झुकाए खड़ी-खड़ी अपने पैरों के अंगूठे से ज़मीन कुरेदती रही। चाची ने सोचा-क्यों न कुछ काम करवा लें सो बोलीं- अरे जब आई है तो कुछ काम भी निबटा दे। वह देख सामने गेहूँ की बोरी रखी है। उसे फटककर ड्रम में भर दे। सत्या ने चुन्नी किनारे रख दी और लग गई काम में। अचानक उसे लगा कि कमरे में से कोई देख रहा है। कहीं चाचा घर पर ही न हों-ऐसा सोचकर उसने चुन्नी उठा ली और गले में लपेटकर कमर में खोंसकर काम में लग गई। चाची ने कहा-सत्या ये दोनों बोरी का काम खत्म करके पीछे कमरे में से दो बोरी और खींच लाना।

- चाची! घर में बाबू बीमार हैं। कुछ भी खाने को नहीं है। बाकी का काम कल आकर कर दूँगी। आज घर जाना है।

- भूलेगी तो नहीं?

- क्या चाची! तुम्हारे अहसान को कोई भुला सकता है?

खाना बनाकर छोड़कर अचानक मुन्नी कमरे में से मालकिन-मालकिन चिल्लाती हुई निकली।

- क्या हुआ? काहे को चिल्ला रही है?

- देखो तो आकर, मालिक को क्या हुआ?

- क्या हुआ?

- अरे आओगी भरी या वहीं से पूछती रहोगी !

कमरे में पहुँचते ही चाची ने घबरा गईं और परेशान होकर बोलीं - अरे मुन्नी! जा भागकर जा, वैद्य जी को बुला ला।

थोड़ी देर तक चाचा जी तड़पते रहे। बार-बार चाची का हाथ पकड़कर यही कहते रहे - लगता है हमारा तुम्हारा साथ यहीं तक था। तुम अपना ख्याल रखना। चाची उनके मुँह पर हाथ रखकर कहतीं - ऐसा अशुभ न बोलो। अभी वैद्य जी आते होंगे। तुम ठीक हो जाओगे। चाची ने समय गँवाना उचित नहीं समझा, अतः सत्या से कहा - जा, तू भागकर जा और ड्राइवर से कह कि गाड़ी निकाले। मालिक को अस्पताल लेकर जाना है। चाचा ने हाथ हिलाते हुए कहा - नहीं मुझे मत ले जाओ, खड़े होने तक का सामर्थ्य नहीं है। तुम्हीं जाओ, जाकर डॉक्टर को बुला लाओ। मेरी चिंता न करो। सत्या है न यहाँ।

उस समय चाची को कुछ नहीं सूझ रहा था। सत्या के आगे हाथ जोड़ती हुई बोलीं-जब तक मैं न आऊँ, यहीं रहना। हाँ मैं खाना माली के हाथ तेरे घर भिजवा दे रही हूँ।

कार की आवाज़ के दूर जाते ही चाचा का दर्द गायब हो गया। सत्या की समझ में कुछ आता उससे पहले चाचा ने अपना दाँव खेलना शुरूकर दिया था। इतना बड़ा घर, घर में वह अकेली। फड़फड़ाती तो कितना फड़फड़ाती। पिंजरे में बंद चिड़िया की तरह उसके पंख टूटते रहे और वह चीखती रही।

घर पहुँची तो अम्मा ने कहा - कैसे हैं मालिक? दीनू बता रहा था कि मालिक की तबियत खराब थी। जरूर ठीक हो गए होंगे! ऐसे मालिक हर गाँव में होने चाहिए।

वह कुछ नहीं बोली। बोलती तो क्या बोलती? खाली-खाली आँखों से अम्मा की तरफ देखते हुए सोच रही थी कि क्या अम्मा को कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा है? पता नहीं दिखाई नहीं दे रहा या अम्मा देखकर भी देखना नहीं चाहती है। सत्या ने कुछ बोलने के लिए मुँह खोला कि अचानक अम्मा बोल पड़ी - देखा! कितने अच्छे हैं हवेली वाले! एक मुट्ठी माँगों तो थैली भरकर देते हैं।

वह सोचने लगी - कौन दाँव खेल रहा है? अम्मा? जो जानकर भी अनजान बनने की कोशिश कर रही है? या चाची? क्या उन्हें अपने पति के चरित्र के बारे में कुछ भी नहीं पता? या ईश्वर?




लेखक श्रद्धा पांडेय – परिचय




श्रद्धा पांडे .कहानी कार, कथा वाचिका


प्रकाशित पुस्तकें-

1 सतरंगी दुनिया के अठरंगी सपने

2-समय की रेत पर

3-झिलमिल तारे आँखों में सारे

4-हाथी मेरे साथी

5-वाद-विवाद एवं संभाषण

6-कही अनकही

7-बाइस्कोप


सम्मान गोमती –

गौरव सम्मान, शब्द शिल्पी सम्मान, वामा सम्मान, अखिल भारतीय अणुव्रत व्यास सम्मान, शिक्षक साहित्यकार सम्मान, हिंदी विकास मंच द्वारा शिक्षक प्रतिभा, सम्मान रीति रेखा सम्मान, Teacher Par Excellence Award


प्रकाशित कहानियां- नवनीत में, बालभारती में, नंदन में, बाल प्रहरी में, बाल वाणी में, एन•बी•टी• रीडर्स क्लब बुलेटिन में, मॉडर्न एजुकेशन रिव्यू में, साहित्य गंधा में, साहित्य अमृत में, गुफ्तगू में, नवनीत में, तथा सखी में


shradha.pdy@gmail.com




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