• सुरेश उनियाल

लौट आओ मानसी



वह सुबह रमन के लिए खास मतलब रखती थी। वह उसकी शादी की पहली एनिवर्सरी की सुबह थी। रोज की तरह सिद्धेश्‍वरी देवी की ठुमरी के खरखराते स्‍वरों ने उसकी नींद तोड़ी थी। मानसी की पुरानी आदत थी कि सुबह उठते ही शास्‍त्रीय सुरों को सुनने की। अभी पूरी तरह से जागृत होने के लिए रमन अलसाई करवटें बदल रहा था कि तभी कमर पर गुदगुदी हुई। जब तक वह चिहुंककर पलटता, बाएं गाल पर दो होंठ सरसराते म‍हसूस हुए। इससे पहले कि वह मानसी को अपने आगोश में ले पाता, वह पलटकर पीछे हो चुकी थी। साइड टेबल पर चाय रखी थी। रोज की तरह ग्रीन टी। पहला कप वही मिलता था। बगल में अख़बार भी रखा था।

‘’हैप्‍पी फर्स्‍ट एनिवर्सरी मिस्‍टर रमन रहेजा। चाय को ठंडा होने से पहले पी लेना। बाथरूम में गीजर ऑन कर दिया है। एक घंटे बाद तुम्‍हारा ब्रेकफास्‍ट मेज पर लगा दिया जाएगा। त‍ब तक तैयार होकर आ जाना।‘’ यह रोज का कार्यक्रम था। आठ बजे नाश्‍ता। उसके बाद जरूरी फोन कॉल्‍स। अकसर होता यह कि कभी पड़ोस का माथुर इस समय आ जाता या कभी रमन उसके घर चला जाता। इस बीच मानसी भी नहा-धोकर नाश्‍ता कर चुकी होती। माथुर और रमन नौ बजे साथ ही दफ्तर के लिए निकलते। दोनों के दफ्तर अगल-बदल ही थे इसलिए वे लोग कार पूलिंग कर लिया करते। लेकिन आज ऐसा कुछ नहीं होना था।

‘’आज यह सब कुछ नहीं। आज पूरा दिन मस्‍ती का होगा। नथिंग रुटीन।‘’

‘’क्‍यों, आज दफ्तर नहीं जाना क्‍या?’’

‘’नो मैडम। आज हमारी एनिवर्सरी है। नो ऑफिस, नो हैंकी-पैंकी। सिर्फ मस्‍ती।‘’

रमन ने दफ्तर में पहले ही बॉस को बता दिया था कि आज नहीं आऊंगा। ऐसा खड़ूस बॉस तो वह था नहीं कि उनकी शादी की पहली एनिवर्सरी पर छुट्टी देने से इनकार कर देता।

रमन नाश्‍ते की मेज पर बैठा ही था कि दरवाजे की घंटी बजी। मानसी ने दरवाजा खोला। हाथों में गुलदस्‍ता लिए माथुर खड़ा था।

‘’हैप्‍पी एनिवर्सरी भाभी!’’ उसने मानसी के हाथों में गुलदस्‍ता पकड़ाते हुए कहा और सीधा नाश्‍ते की मेज पर उसकी बगल में आ बैठा।

‘’अब तू नाश्‍ता भी करेगा?’’

‘’क्‍यों नहीं करूंगा। इतनी सुबह उठकर मार्किट जाकर तुम्‍हारे लिए इतना खूबसूरत गुलदस्‍ता लेकर आया हूं और इसे नाश्‍ता कराने में भी परेशानी हो रही है।‘’

‘’तुम लोग क्‍यों बेकार में झगड़ रहे हो?’’ किचन के दरवाजे पर मानसी खड़ी थी, दोनों हाथों में नाश्‍ते की प्‍लेटें लिए।

‘’वही तो मैं इससे कह रहा था भाभी कि नाश्‍ता बनाएगी भाभी, लाएगी भाभी। फिर तू क्‍यों बीच में ही परेशान हुआ जा रहा है।‘’ माथुर ने मानसी को मस्‍का लगाया और हाथ बढ़ाकर दोनों प्‍लेटें बीच ही में अपने हाथों में ले लीं।

रमन और माथुर दोनों बचपन के दोस्‍त थे। अब दोनों साथ ही दिल्‍ली में और वह भी पड़ोस में रह रहे थे। उनके बीच बचपन की वह चुहल बनी रहती थी। इस एक साल में मानसी को भी इस सब की आदत पड़ चुकी थी और वह भी अकसर इसमें उनके साथ शामिल हो जाती थी।

नाश्‍ता देने के बाद मानसी नहाने के लिए चली गई थी। वे दोनों नाश्‍ते की मेज पर ही गप्‍पों में मशगूल हो गए। अकसर होता यह कि नहा चुकने के बाद मानसी चाय बनाकर वहीं ले आती थी। चाय पी चुकने के बाद नौ बजे वे लोग दफ्तर के लिए निकल पड़ते थे।

वे चाय का इंतजार कर रहे थे। नौ बजने में जब सिर्फ पाँच मिनट रह गए तो माथा ठनका। यह कहकर कि मानसी को देख आता हूं, देर क्‍यों लग रही है, रमन कमरे में गया। शादी के बाद से ही ये लोग नहाते हुए गुसलखाने का दरवाजा खुला ही रखते। (मेरे खयाल से आप यह फिजूल का सवाल नहीं पूछेंगे कि ‘क्‍यों?’)

दरवाजा खोला तो बाथ टब से पानी ओरवफ्लो होकर बाहर गिर रहा था। मानसी उसमें लेटी थी, निश्‍चेष्‍ट। सिर पानी के अंदर था। रमन ने जल्‍दी से जाकर मानसी का सिर उठाकर पानी से बाहर निकाला और हिलाकर होश में लाने की कोशिश करने लगा। फिर उसे टब से बाहर निकाला। तौलिया उसके ऊपर डाला और माथुर को आवाज दी। माथुर ने नब्‍ज देखी, नाक के सामने हाथ ले जाकर सांस को महसूस करने की कोशिश की और फिर परेशान बाहर की तरफ भागा।

रमन की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। वह उसे हिलाकर होश में लाने की कोशिश कर रहा था। उसे यही लग रहा था कि मानसी किसी वजह से बेहोश हो गई है। थोड़ी कोशिश के बाद होश में आ ही जाएगी। इससे आगे की बात तो वह सोच ही नहीं सकता था। ऐसा कहीं होता है कि कोई शादी के एक साल बाद ही...

माथुर पास के क्लिनिक से डॉक्‍टर गुलाटी को बुला लाया था। गुलाटी ने नब्‍ज देखी। स्‍थैटेस्‍कोप से दिल की धड़कन परखने की कोशिश की और फिर इनकार में गरदन हिला दी।

रमन अभी तक मानसी को झिंझोड़कर होश में लाने की कोशिश कर रहा था। माथुर ने उसे खींचकर उससे अलग किया और जोर से हिलाते हुए कहा, ‘’किसको होश में लाने की कोशिश कर रहा है। मानसी भाभी हमें छोड़कर चली गई है।‘’

माथुर यह क्‍या कह रहा था। मानसी कैसे इस तरह हमें छोड़कर जा सकती है! इसका दिमाग खराब हो गया है क्‍या? रमन उसकी गिरफ्त से निकलने की भरसक कोशिश कर रहा था। मानसी को होश में लाए जाने की जरूरत थी।

‘’तू समझने की कोशिश क्‍यों नहीं कर रहा है। यह सिर्फ मानसी भाभी का शरीर है। उनकी आत्‍मा हमें छोड़कर जा चुकी है। यह मैं नहीं कह रहा हूं, डॉक्‍टर गुलाटी कह रहे हैं।‘’ माथुर ने उसका चेहरा मानसी की तरफ से हटाकर जबर्दस्‍ती डॉक्‍टर गुलाटी की ओर घुमाते हुए कहा। डॉक्टर गुलाटी सहमति में सिर हिला रहे थे। लेकिन रमन यह सब नहीं देख पा रहा था। उसका मन कहीं से भी यह स्‍वीकार करने के लिए तैयार नहीं था कि मानसी उसे इस तरह छोड़कर जा सकती है। अभी उसने दुनिया में देखा ही क्‍या है। अभी उनका वैवाहिक जीवन शुरू हुआ था। अभी तो उनके बहुत से सपने थे। उन सपनों को पूरा करना था।

रमन किसी तरह इस बात के लिए तैयार हुआ कि मानसी को अस्‍पताल ले चलते हैं। उसे होश में लाने के लिए यह जरूरी था।

मानसी में कुछ बचा होता तो अस्‍पतालवाले थी कुछ करते। वहां तो कुछ भी नहीं था। इतना जरूर पता चला कि मानसी की मौत ब्रेन हैमरेज से हुई। वह डायबिटिक थी। इनसुलिन लेती थी। डॉक्‍टरों का अनुमान था कि पिछले दिन किसी कारण शायद रात में खाना नहीं खाया होगा, इस वजह से शुगर लो हो गई होगी और मानसी इस और ध्‍यान देने के बजाय घर के काम में लगी रही होगी। शुगर ज्यादा लो होने पर ब्रेन हैमरेज हो गया। और तो कोई कारण नजर नहीं आ रहा था। रमन अगर शॉक में न होता तो वह बताता कि वास्‍तव में हुआ क्‍या था लेकिन वह तो कुछ बोलने की स्थिति में था ही नहीं।

अस्‍पताल की औपचारिकताएं पूरा करने में एक घंटा लग गया। सब काम माथुर ही करवा रहा था। रमन तो बबुए की तरह जहां माथुर कहता साइन कर देता, जो कुछ वह करने के लिए कहता, कर देता। उसे अपना कोई होश नहीं था। उसके लिए समय वहीं रुका हुआ था जहां वह और माथुर नाश्‍ते की मेज पर बैठे थे और मानसी नहाने के लिए गुसलखाने गई थी।

रमन के जिन रिश्‍तेदारों, दोस्‍तों के नंबर माथुर के पास थे, उन सबको उसने फोन कर दिए। अंतिम संस्‍कार की सभी औपचारिकताएं उसी ने पूरी की और रमन से पूरी करवाईं। चिता को अग्नि देने से लेकर कपाल क्रिया तक की सभी क्रियाएं हालांकि रमन हाथों हो रही थीं लेकिन वह तो जैसे इस सब को अपने सामने सिनेमा के परदे पर घटते देख रहा था। इस सबमें शाम हो गई।

घर लौटे। लगा वह घंटी बजाएगा और मानसी आकर दरवाजा खोल देगी। इसलिए रमन के हाथ अपनी जेब से चाबी निकालने के बजाय घंटी की तरफ बढ़े। घर की एक चाबी माथुर के पास भी रहती थी, उसने दरवाजा खोला।

रमन को लगा जब दरवाजा खुलेगा, मानसी सामने से आती हुई दिखेगी। लेकिन ऐसा भी कुछ न हुआ। अंधेरा होने लगा था। मानसी को अंधेरा जरा भी बर्दाश्‍त नहीं होता था। शाम ढलते ही पूरे घर की लाइटें वह ऑन कर देती थी।

‘क्‍या मानसी नहीं है?’ रमन ने खुद से सवाल किया।

‘हां, मानसी नहीं है। अभी तो हम उसका अंतिम संस्‍कार करके लौट रहे हैं।’ रमन खुद को यकीन दिलाने की कोशिश कर रहा था।

‘क्‍या सचमुच? या फिर यह कोई एक लगातार चलनेवाला सपना था जिसमें मैंने यह सब होते देखा था।’ उसका मन अब भी ऊहापोह में था।

माथुर के साथ सोफे तक आया और दोनों बैठ गए। रमन हवा में कहां घूर रहा था, इसकी उसे भी खबर नहीं थी। माथुर पानी का गिलास ले आया और रमन की तरफ बढ़ा दिया। उसने मशीनी ढंग से गिलास पकड़ा और पानी पीने लगा।

‘माथुर पानी का गिलास क्‍यों लाया?’ रमन खुद से पूछ रहा था।

‘इसलिए कि मानसी नहीं है। वह अब इस दुनिया से जा चुकी है। हम अभी उसका अंतिम संस्कार करके लौट रहे हैं।’ रमन खुद को बार-बार बताकर यकीन दिलाने की कोशिश कर रहा था कि मानसी इस दुनिया को छोड़कर जा चुकी है। अब वह उसके सामने कभी नहीं आएगी।

लेकिन मन था कि उसके किसी कोने में आस छिपी बैठी थी कि मानसी भला ऐसे कैसे जा सकती है। मजाक है क्‍या!

फिर भी ऊपर से उसे यही दिखाना था कि मानसी नहीं रही।

शोक प्रकट करने के लिए परिचित आ रहे थे। हालांकि माथुर ही उनसे ज्‍यादा बात करने की कोशिश कर रहा था लेकिन रमन भी अपने आप को सामान्‍य दिखाता हुआ, अब बात करने लगा था। वे लोग नाश्‍ते की मेज पर बैठे थे, मानसी नहाने गई और टब में ही न जाने कब उसने देह त्‍याग दी। अस्‍पताल भी ले गए लेकिन कुछ न हुआ। यह कहानी हर आगंतुक के सवालों के जवाब में वह सुना रहा था। लगभग मशीनी ढंग से। कुछ दूर के रिश्‍तेदार जो दिल्‍ली में ही रहते थे, आए। अपनापा दिखाने के लिए गल से लग कर उसे सांत्‍वना दे रहे थे। कायदे से तो ऐसे में रमन की आंखें तर होनी चाहिए थीं लेकिन उसका चेहरा भावहीन और आंखें सूखी थीं। सबको यही लगा मानसी की मौत ने उसे आघात पहुंचाया है और उसे इस तरह से भावहीन बना दिया है।

काफी देर तक लोग आते रहे। घर में कोई ऐसा न था जो किसी को चाय के लिए भी पूछता। कुछ परिचितों की पत्नियां उनके साथ आई थीं तो उन्‍होंने बाकी लोगों को पानी पिलाया। फिर धीरे धीरे लोग जाने लगे।

लोगों का जाना उसे राहत दे रहा था। उनके सवालों और सांत्‍वना ने उसे परेशान कर दिया था। जब सब चले गए तो माथुर ने पास के एक रेस्‍तरां में फोन करके खाना मंगवा लिया। दोनों ने ही लंच नहीं किया था। भूख लग आई थी।

रात में माथुर ने रुकने की इच्‍छा जताई तो रमन ने कहा, ‘’इसकी जरूरत नहीं है। मैं अपने आप को संभाल लूंगा। वैसे भी मैं कुछ देर अकेला रहना चाहता हूं ताकि अपनी स्थिति का एक जायजा ले सकूं। अब मुझ अकेले ही तो बाकी जिंदगी रहना है।‘’

जिस समय रमन माथुर से यह बात कह रहा था, वह खुद नहीं जान रहा था कि ये शब्‍द उसके मुंह में कहां से आए थे और कैसे निकल रहे थे।

वह एकांत चा‍हता जरूर था लेकिन क्‍यों चाहता था, यह वह नहीं जानता था।

माथुर चला गया था।


रमन अंदर जाकर बिस्तर पर जाकर लेट गया।

अपनी स्थिति वह अच्‍छी तरह समझ रहा था। जो कुछ उसके सामने घटा था, वह कोई सपना या मतिभ्रम नहीं था। मानसी सचमुच जा चुकी थी। अब वह लौटकर नहीं आएगी। इस बात को उसे अपने ऊपरी मन से ही नहीं, मन के भीतर के गहरे कोनों से भी स्वीकारना होगा। सचाई को स्‍वीकार करना जरूरी है क्‍योंकि आगे की जिंदगी एक भ्रम के साथ नहीं जी जा सकती। जिंदगी एक जगह ठहर भी नहीं सकती। वह तो निरंतर आगे बढ़ेगी। और सचाई को स्‍वीकार किए बिना ऐसा नहीं हो पाएगा।

वह आज दिन की घटी हर घटना को पूरी ऑब्‍जेक्टिविटी के साथ अपनी आंखों के सामने घटते हुए याद करने लगा। वह लगातार अपने आप को मानसी के न रहने का यकीन दिला रहा था। वह चाहता था कि सोने तक अपने भीतर के हर कोने के विश्‍वास दिलवा दे कि कल सुबह ज‍ब वह सोकर उठेगा तो मानसी नहीं होगी। वह अकेला होगा। उस समय ऐसा कुछ नहीं होगा जो मानसी के होते होता था। कोई शास्‍त्रीय सुर उसके कानों में नहीं गूंजेगा, कोई होंठ अलसाते रमन को जगाने के लिए उसके गालों पर नहीं सरसराएंगे। उसकी साइड टेबल पर कोई चाय का कप और अख़बार नहीं रखेगा। उसके नहाने के लिए गीजर ऑन करने वाला भी कोई नहीं होगा। अपने लिए जो भी करना होगा, वह खुद उसे ही करना होगा।

और आगे भी अकेला ही रहेगा।

अजीब बात थी, मानसी के न रहने की बात पर जितना वह खुद को विश्वास दिलाने की कोशिश करता, उतना ही उसे अपने प्रति अविश्वास होने लगता।

सोने से पहले मानसी पानी का एक गिलास ढककर साइड टेबल पर रख देती थी। आदतन रमन ने उस तरफ देखा। पानी का गिलास न पाकर रसोई में जाकर खुद अपने लिए पानी ले आया।

लाइट ऑफ की और सोने की कोशिश करने लगा। अचानक खयाल आया, घर की बाकी लाइटें तो जल रही हैं। उन्‍हें सोने से पहले मानसी ही ऑफ करती थी। सिर्फ एक एल.ई.डी. ऑन छोड़ देती थी ताकि घर एक दम से अँधेरा न हो जाए। लेकिन अब रमन का मन बाहर जाने का नहीं हो रहा था। वह लेटा रहा।

और पता नहीं कब उसे नींद आ गई।


सुबह उठा तो भीमसेन जोशी के गायन के सुर पूरे घर में गूंज रहे थे। अभी पूरी तरह से जागृत होने के लिए रमन अलसाई करवटें बदल रहा था कि तभी कमर पर गुदगुदी हुई। जब तक वह चिहुंककर पलटता, बाएं गाल पर दो होंठ सरसराते म‍हसूस हुए। इससे पहले कि वह मानसी को अपने आगोश में ले पाता, वह पलटकर पीछे हो चुकी थी। साइड टेबल पर चाय रखी थी। रोज की तरह ग्रीन टी। बगल में अख़बार भी रखा था।

‘’चाय को ठंडा होने से पहले पी लेना। बाथरूम में गीजर ऑन कर दिया है। एक घंटे बाद तुम्‍हारा ब्रेकफास्‍ट मेज पर लगा दिया जाएगा। त‍ब तक तैयार होकर आ जाना।‘’