• वंदना पुणतांबेकर

दास्तान


लखनऊ के सकरी गलियों में बसी थी। करीमगंज इलाके की छोटी बड़ी गलियां। इन गलियारो में दिनभर रिक्शों की आवाजाही साईकलो की घंटियां सुनाई देती। यह गलियां सदा शोरगुल से भरी रहती थीं। इन्हीं गलियों में मेहरूनिशा अपने अब्बू व दो छोटे भाइयों के साथ रहती थी। यह मोहल्ला बड़ा शोरगुल से भरा रहता। 10 साल की उम्र में ही अम्मी का साया सिर से उठ चुका था। अब्बू अभी 1 साल से दूसरे निकाह की तलाश में जगह-जगह मुँह मार रहे थे। घर का सारा काम निपटा कर मेहरू जरदोसी के काम के लिए जो बैठ जाती, तो तभी उठी जब उसे भूख लगती। उसके काम में इतनी खूबसूरत डिजाइन हुआ करते थे कि जो भी देखता तारीफ किए बिना नहीं रहता। मेहरू के हाथ किसी मशीन की तरह चलते थे। मेहरू दिखने में निहायत ही खूबसूरत थी। बड़ी-बड़ी आंखें, नाजुक सा चेहरा मासूम सी मुस्कुराहट सदा उसके चेहरे पर रहती। अपने गोरे-गोरे हाथों से शाम तक ढेरों काम करती। कभी अब्बू को, अपने भाइयों को उसने अम्मी की कमी महसूस नहीं होने दी, फिर भी अब्बू दूसरे निकाह की तलाश में भटक रहे थे। समय से घर का सारा काम कर सुबह 10:00 बजे से मेहरू का काम घड़ी की सुई के साथ होता था। मेरु अभी महज 12 साल की बच्ची थी। मगर क्या कला और खूबसूरती पाई थी। शायद ऊपर वाले की कोई मेहर थी। तभी तो अम्मी ने उसका नाम मेहरूनिशा रखा था। सभी आसपास के लोग उसे मेहरू ही बुलाते थे। घर के बाहर बरामदे के सामने एक मुंहबोली खाला रहती थी। खाला अकसर मेहरू का ख्याल रखती। वह अकसर ऊपर वाले से दुआ करती, "हे परवरदिगार इस मासूम को जिंदगी में ढेर सारी खुशियां और प्यार मिले," 12 साल की उम्र में 22 साल की खातून की तरह काम करती थी। हमेशा खाला की नजर में मेहरू के लिए अम्मी सा दुलार देखने को मिलता। सिवइयां बनी नहीं कि खाला सबसे पहले मेहरू को खिलाती। कहती, "काम तो होता रहेगा पहले सिवइयां खाले," खाला के अपनेपन से मेहरू हमेशा खुश रहती। अब्बू को फुर्सत कहाँ थी कि बेचारी के सिर पर कभी ममता का हाथ पैर कर कुछ पूछ ले। खाला की एक मुंहबोली बहन थी । रज्जो बानो अभी-अभी इसी मोहल्ले में रहने आई थी। उसका एक बेटा था। हमीद वह अकसर खाला के यहाँ खेलने आता। और खाला के बेटों के साथ खेला करता। दोनों तीनों बच्चे हम उम्र के ही थे। एक दिन हमीद की गेंद मेहरू निशा के तख्त के नीचे चली गई। वह भागता हुआ आया अपनी गेंद लेने। मेहरू के पास आया और पूछने लगा ,"तेरा नाम क्या है?"

"क्यों बताऊँ, कोई सरकार का हुक्म है क्या? मैं तुझे अपना नाम क्यों बताऊ, नहीं बताना।"

"ठीक है मेरी गेंदें दे।"

"मैं क्यों दूं , मैंने थोड़ी ली है गेंद जो मैं दूँ,तख्त के नीचे गई है, जा निकाल ले, मुझे अपना काम करने दे।" मेहरू ने हंसते हुए कहा।

हमीद कुछ ना बोला। तख्त के नीचे से गेंद लेकर भाग गया। हमीद का आना अब रोज ही हो गया था। लेकिन वह खाला के बच्चों के साथ नहीं खेलता, वह मेहरू के पास आकर बैठ जाता। कभी उसके साथ सितारे, कभी मोतियों को अलग-अलग कटोरी में रखता, जो नीचे गिर जाते थे। मेहरू को भी उसकी दोस्ती अच्छी लगी। कोई तो था, जो उसके साथ वक्त बिताता। अब मेहरू का काम और भी आसान हो गया। रोज दोनों उसी तख्त पर बैठकर लड़ते-झगड़ते। पर हमीद तो रोज ही आता था। बिना नागा किये।

"ये बता तू इतनी जल्दी- जल्दी यह सब कैसे कर लेती है।

"जैसे तू पतंग उड़ाता है, वैसे ही।"

कभी दोनों खूब लड़ते ,तो कभी खूब हंसते ,बचपना जो था। वक्त गुजरता गया। आज मेहरू 16 साल की अल्हड़ उम्र में कदम रख चुकी थी। बचपन की दोस्ती कब प्यार में बदल गई, मेहरू को पता ही ना चला। मेहरू रोज हमीद का इंतजार करती। कभी आता, कभी ना आता। मेहरू का तो दिन काटना ही मुश्किल हो गया। हमीद पहले की तरह खुलकर मिलता भी न था। वह भी बड़ा हो चुका था। उसके अब्बू उसे ज्यादा मटरगश्ती नहीं करने देते थे। हमेशा किसी ना किसी बहाने दुकान पर बैठाये रखते थे। इधर मेहरू का मन भी अब जरदोसी के काम में पहले जैसा नहीं लगता था। अब्बू हमेशा खा जाने वाली नजरों से घूर-घूर कर देखते और डांटते रहते।

"काम नहीं करेगी तो पैसा कहां से आएगा?"

मेहरू पास के कारखाने से बुर्के के कपड़े पर जरदोजी का काम बचपन से ही करती आई थी। थोड़े बहुत पैसे मिल जाया करते। पर अब उसका मन जरा भी ना लगता। एक दिन हमीद पास आकर बोला, "मेहरू मेरा एक काम करेगी क्या?"

"हां करूंगी न, क्यों नहीं," मेहरू एकदम चहकते हुए बोली, "क्या काम है?"

"मेरी टोपी पर थोड़ा सा जरदोजी का काम कर दे, अच्छी महंगी टोपी बन जाएगी, जब नमाज पढ़ने जाऊंगा, इस टोपी को पहन कर जाऊंगा।"

वह पूछना चाहती थी कि तू अब क्यों नहीं आता, क्या बचपन की दोस्ती भूल गया। मगर मेहरू कुछ ना बोल सकी। खामोशी से सिर हिलाकर बोली, "हां कर दूंगी, कब चाहिए?”

"जब बन जाए, तब दे देना, ठीक है।" मेहरू सब काम छोड़कर पहले हमीद की टोपी पर कढ़ाई कर उसका इंतजार करने लगी। एक दिन खाला के यहां से शाम को खूब चिल्लाने की आवाज आ रही थी। समझ नहीं पाई कि क्या माजरा है। आज अखबार में 12वीं क्लास का नतीजा आया था। खाला के बच्चों ने भी इसी क्लास का इम्तिहान दिया था। हमीद के अब्बू की आवाज सुनाई दे रही थी , "नामाकूल फेल हो गया, सारी उम्र छाती पर बैठ कर खाएगा, निकम्मा कहीं का।"

खाला ने कहा, "शांत हो जाओ भाई जान, बच्चा है अभी ,अगले साल निकल जाएगा, इतना मारोगे तो नहीं पढेगा।"

शायद आज हमीद को मार पड़ी थी। उसके अब्बू खाला के यहां आकर जोर से चिल्ला कर बता रहे थे। मेहरू की आंखें अचानक नम हो गई। हमीद फेल हो गया, आज अब्बू ने उसे मारा। उसे लगा कि यह घाव हमीद पर नहीं, उस पर हुए हैं । काफी दिनों में हमीद की कोई खबर नहीं थी। हमीद ने आना बंद कर दिया था। खाला को भी उसका ना आना अखरता था। एक दिन मेहरू ने खाला से पूछा। "क्या बात है खाला, आजकल हमीद दिखाई नहीं देता, क्या हो गया?"

"मुझे क्या मालूम, तेरा दोस्त है। तू नहीं पूछ सकती, बस बचपन की इतनी सी दोस्ती है तेरी," खाला ने गुस्से से डाटा।

एक दिन दोपहर को अचानक हमीद खाला के यहाँ दिखाई दिया। हमीद को देखकर मेहरू को बड़ी खुशी हो गई। वह भागता हुआ सीधा उसी के पास आया। "ला जल्दी से मेरी टोपी दे, जल्दी कर, अब्बू ने देख लिया तो जान पर आ जाएगी।" "तुम रुको, मैं अभी लेकर आती हूं," कहकर मेहरू अंदर चली गई। सुंदर सी कढ़ाई करी हुई टोपी हमीद को देकर पूछने लगी, "सुना है, तू फेल हो गया, तेरे अब्बू ने तुझे बहुत मारा।"

"हां, सब तेरी वजह से ... "

"मेरी वजह से?"

"हाँ... हाँ, " कहते हुए बिना कुछ कहे, हमीद वहां से चला गया। मेहरू कुछ समझ नहीं पाई। हमीद ने ऐसा क्यों कहा। वक्त बीतता गया। आज मेहरू 18 साल की हो गई थी। हमीद के लिए उसके दिल में बेहद प्रेम था। वह रोज हमीद के आने का इंतजार करती। हमीद आता तो था। लेकिन बिना मिले, बिना बात किए ही चला जाता। मेहरू को उसका यह बर्ताव अच्छा नहीं लगता। इधर अब्बू ने उसका निकाह तय कर दिया था। मेहरू को यह बात अच्छी नहीं लगी। उसने अब्बू को हमीद के बारे में कई बार बताना चाहा पर वह बता ना सकी। अपनी उम्र से दस साल बड़े आदमी से मेहरू का निकाह तय कर दिया। उसका नाम अनवर था। उसी मोहल्ले में उसकी कसाई की दुकान थी। मेहरू तो जैसे टूट चुकी थी। वह हर बात अपने दिल की हमीद को बताना चाहती थी। मगर जैसे ही हमीद को मेहरु के निकाह की बात पता चली, उसने वहाँ आना ही छोड़ दिया। जैसे सारा दोष मेहरू का हो। निकाह के बाद मेहरू अपने शौहर के साथ उसी मोहल्ले में रहने लगी। 1 साल में एक बच्चे की अम्मी बन गई, अनवर की दूसरी शादी थी । पहली बीवी किसी बीमारी की वजह से चल बसी। दूसरी बीवी, अपने से आधी उम्र की मेहरू से शादी करके, 2 साल में दो बच्चों की अम्मी बना डाला। मेहरू के अब्बू ने मोटी रकम लेकर जानबूझकर अपनी प्यारी सी सुंदर मेहरू को जल्लाद कसाई के हाथों बोटियों के लिए उसका निकाह कर दिया। बिचारी मेहरू दिल के अरमां दिल में रह गए थे। दिल में हमीद की मोहब्बत थी। ऊपर से इस परिवार के जिम्मेदारियां घुट-घुट कर जी रही थी। मेहरू का दूसरा बेटा काफी बीमार रहता। बहुत इलाज करवाया नीम हकीम सब कुछ सब के सब बेकार। जब डॉक्टर को दिखाया तो पता चला उसके सीने में छेद है। अब क्या? डॉक्टर बोले इसे तो दिल्ली ले जाना पड़ेगा इलाज के लिए। अनवर अपने छोटे मियां को लेकर दिल्ली भागा हालत नाजुक हो चुकी थी। अपनी दुकान मकान बेचकर दिल्ली में ही बसना पड़ा। बेटे का इलाज में जी जान लगाकर पैसा फूंका। मेहरू ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी उसकी सेवा करने में। परवरदिगार को जो मंजूर था, वही हुआ। छोटे मियां चल बसे। उसके बाद सारा दोष मेहरू पर लगाया गया। तेरी वजह से मेरा बेटा मर गया। तू मनहूस है। अब अनवर के तेवर मेहरू के लिए और भी तीखे हो गए थे। मेहरू को दिल्ली जरा भी रास नहीं आई। अब अनवर अपने एक पुराने दोस्त के साथ मिलकर दिल्ली में ही पांव जमाना चाह रहा था। मेहरू के प्रति उसका रवैया दिन ब दिन बेकार होता जा रहा था। वह मेहरू को हर बात का जिम्मेदार ठहराता। शाम हुई नहीं कि दोस्तों के साथ शराब और कबाब में रात गुजारता। दिन साल गुजरते गए अनवर मियां ने अपना छोटा-मोटा धंधा दिल्ली में ही जमा लिया था। मेहरू को पैरो की जूती बना कर रखा था। आज मेहरू का पहला बेटा 16 साल का हो चुका था। दिल्ली के अच्छे कान्वेंट स्कूल में पढ़ता था। जब से वह दिल्ली आई थी, इतने सालों में कभी भी लखनऊ नहीं गई थी। अनवर मियां ने इसकी जरूरत भी नहीं समझी। मेहरू के अब्बू को भी कभी मेहरू की याद नहीं आई कि 2 दिन के लिए ही सही, अपनी बेटी का मुंह तो देख ले। अचानक एक दिन सुबह-सुबह खबर मिली कि मेहरू के अब्बू का इंतकाल हो गया। तो मेहरू घबरा गई। आखिर था तो बाप ही ना। ममता उसमें नहीं तो क्या। मेहरू तो दिल की नेक थी।

वह अनवर से बोली, "मेरे अब्बू का इंतकाल हो गया है, मैं उसकी आखरी दीदार करना चाहती हूं।"

"ठीक है, तेरा टिकट करवा देता हूं।"

अनवर ने मेहरू का लखनऊ जाने का टिकट करवा दिया। जाकर उसे स्टेशन छोड़ आया। बोला, "मैं जा रहा हूं, इसी प्लेटफॉर्म पर गाड़ी आएगी। ये रख टिकिट पहुंचने पर खबर भिजवा देना। "

तेज गति से बाहर निकल गया। मेहरू उसे दूर तक जाते हुए देख रही थी। स्टेशन की भागा दौड़ी गाड़ियों की आवाजाही शोरगुल से मेहरू का सिर चकरा रहा था। उसने पर्स से एक गोली निकाल कर खाली। तभी माइक पर किसी महिला की आवाज सुनाई दी। "लखनऊ जाने वाली ट्रेन अपने निर्धारित समय से 1 घंटा 50 मिनट लेट है। सभी यात्री ध्यान दें, मेहरू ने काले रंग का बुर्का पहन रखा था। उसने अपना टिकट संभाल कर पर्स में रख लिया अभी उसे ट्रेन के लिए काफी इंतजार करना था। वहीं सामने बनी बेंच पर बैठकर ट्रेन का इंतजार करने लगी। तभी वहां एक खूबसूरत सा इंसान अंग्रेजी बाबू की तरह मंहगे जूते, हाथ में बैग, अंग्रेजी अख़बार लेकर आया। बोला, "मोहतरमा क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूं?"

वह शक्स उसी बेंच पर थोड़ी दूरी बना कर बैठ गया।

"कहां जा रही हैं आप मोहतरमा?"

"जी लखनऊ।"

"वह गाड़ी तो एक घंटा 50 मिनट लेट हो गई है, आप लखनऊ की हैं क्या?"

"जी नहीं मैं दिल्ली की हूं।"

मेहरू ने बुर्के में से ही जवाब दिया।

"तो आप लखनऊ क्यों जा रही हैं।"

"जी मेरे अब्बू का इंतकाल हो गया है, आखरी दीदार के लिए जा रही हूं।"

सारे सवाल उधर से ही आ रहे थे। मेहरू उसे जवाब दे रही थी।

"लखनऊ में कहां की रहने वाली हो?"

"जी करीमगंज।"

"अच्छा, किस गली से?”

"गली नंबर 14 से।"

"ओह ... तो आप वसीम जी को जानती हो?"

"जी जानती हूं।"

"उनकी एक बेटी भी हुआ करती थी, बड़ी खूबसूरत और नेकदिल थी, क्या नाम था उसका? अच्छा सा नाम था, मेहरू....निशा, हां, हां याद आया, मेहरू निशा।"

मेहरू ने बुर्के की जाली से उस शक्स को ध्यान से देखा। और पहचानने की कोशिश करने लगी। बचपन के चेहरे उम्र के साथ बदल ही जाते हैं । पर हमीद ज्यादा नहीं बदला था। बस वो नबाबों वाला सलीका नहीं था। दाढ़ी टोपी कुछ भी नहीं। एकदम अंग्रेजी शहरी बाबू लग रहा था। उसे देखते ही मेहरू बुर्के के अंदर ही अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश करने लगी। हमीद ने फिर सवाल किया। "मुझे तो याद नहीं कि मेहरू की कोई सहेली भी हुआ करती थी।"

घबराकर, "जी ... वो ... जरदोजी का काम लाती थी ना, मैं वहां उसे मिला करती थी।"

"अच्छा? बड़ी बेवफा थी, न जाने कब दिल चुरा कर ले गई, बिना मिले कुछ कहे ही चली गई, किसी अनजान से निकाह कर लिया ... खैर।", मेहरू को आज यह जानकर बहुत ही ज्यादा दुख हो रहा था कि हमीद उसे बेवफा कह रहा था। उसे नहीं मालूम था कि वह उससे क्या सुनना चाहती थी। क्या कहना चाहती थी। ये निकाह उसके अब्बू का फैसला था, उसका नहीं। वह तो सारी जिंदगी उसे याद करके ही जी रही है। और वह उसे आज बेवफा कह रहा है। मेहरू का दिल चाह रहा था। कि वह बुर्खा उठाकर उससे अपने सभी सवालों का जवाब मांगे। तब तू कहां था। जब मैं तेरा इंतजार कर रही थी। एक बार भी झूठे मुँह निकाह की बधाई देने नहीं आया। आता तो तुझे सारी बातें बताती जो सिर्फ तुझे ही बताना चाहती थी। लेकिन वह ऐसा कुछ भी ना कर सकी। बुर्के में ही रोती रही। सारा पर्स आँसुओ से भीग चुका था। हमीद के दिल में उसके लिए जो बेवफाई का जहर था। उसे कैसे समझाती कि वह