ई-कल्पना: अंतिम सम्पादकीय

ई-कल्पना एक प्रयोग था।
लेखक बनने से पहले मैं भौतिकी की शोधकर्ता जो थी।
साइड में कहानियाँ भी लिखती थी और अमरीकी साहित्यिक पत्रिकाओं में भेजती रहती थी।
2007 में मेरी एक कहानी एक प्रतियोगिता में रनर-अप हुई। छोटी-सी बात थी, लेकिन मेरे लिए नहीं। पहली बार लगा, शायद मैं इतना भी बुरा नहीं लिखती। अगले साल दूसरी कहानी ने एक और प्रतियोगिता जीत ली। तब मैं सातवें आसमान पर सवार थी।
छपने के मामले में संयम की कमी आज भी है मुझमें। कहानी स्वीकार हो जाए या कहीं नाम छप जाए, मैं बाकायदा खुश होती हूँ। बहुत खुश।
उसी जोश में मैंने अपने माता-पिता से कहा कि अब तो उन्हें मेरी कहानियाँ पढ़नी पड़ेंगी। मम्मी ने साफ़ कह दिया, “इंग्लिश में पढ़ने में मज़ा नहीं आता।”
मैंने कहानियों का हिन्दी में अनुवाद करना शुरू कर दिया।
मम्मी ने तब भी नहीं पढ़ीं।
लेकिन अब हिन्दी में पड़ी उन कहानियों का क्या करती? मैंने उन्हें भारत की हिन्दी पत्रिकाओं में भेजना शुरू किया। अधिकतर जगहों से कोई उत्तर नहीं आया। एक जगह से आया।
दिल्ली प्रैस के परेश नाथ जी का छोटा-सा निजी ई-मेल था: “क्या आप हमारे लिए लिखेंगी?”
फिर क्या था। अगले दो-तीन वर्षों तक सरिता के लिए, खासकर प्रवासी भारतीय जीवन से जुड़े विषयों पर, नियमित लेख लिखे। बदले में मैं उनके सम्पादकीय विभाग के पीछे पड़ी रही कि मेरे लेख पढ़ते हैं तो मेरी कहानियाँ भी पढ़िए। अच्छी लगें तो छापिए।
माँ ने न सही, मेरी कहानियाँ दिल्ली प्रैस के सम्पादकों ने पढ़ीं। और 2012 से 2014 के बीच मेरी कई कहानियाँ सरिता में छपीं।
तब तक एक सवाल मेरे भीतर ज़िद की तरह चिपक गया था:
हिन्दी में क्या लिखा जा रहा है? ... क्यों न हिन्दी की एक ऑनलाइन लिट-मैग शुरू करूँ? एक दरवाज़ा खोलूँ और बस इतना कहूँ: अच्छी रचना भेजिए। देखें, उस दरवाज़े से क्या आता है।
2014 में मेरा पहला उपन्यास The Thugs and a Courtesan सृष्टि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। और फरवरी 2016 में मैंने वह दरवाज़ा खोल दिया।
ई-कल्पना शुरू हुई।
शुरू के वर्ष रोमांचक थे। अच्छी रचनाएँ आईं।
दो वर्षों के भीतर चार ऐसे लेखक मिले जिनके लेखन ने मुझे इतना प्रभावित किया कि उनकी एक-दो रचनाएँ ई-कल्पना में छाप देना काफी नहीं लगा। ई-कल्पना की एक प्रकाशन शाखा बनी, ई-कल्पना किताब, और हमने उनकी पुस्तकें प्रकाशित कीं।
एक और विश्वास था, और आज भी है: लेखन का मूल्य है, इसलिए उसका मेहनताना भी होना चाहिए। एक छोटी स्वतंत्र पत्रिका बहुत नहीं दे सकती थी, लेकिन थोड़ा देना भी कुछ न देने से बेहतर था। इसलिए ई-कल्पना ने अपने लेखकों को मानदेय देना शुरू किया।
इन दस वर्षों में ई-कल्पना ने अपने लेखकों को लगभग सात लाख रुपये का मानदेय दिया।
और एक वजह मेरी अपनी भी थी। छपने पर मुझे जितनी खुशी मिलती थी, वैसी ही खुशी मैं दूसरे लेखकों को भी देना चाहती थी।
दस वर्षों तक मुझे मेज़ की दूसरी तरफ बैठने का मौका मिला। रचनाएँ पढ़ीं। उन्हें चुना। प्रकाशित किया। लेखकों को मानदेय दिया। कभी किसी रचना से शुरू हुई पहचान को एक पूरी किताब तक पहुँचाया।
अब मेज़ से उठकर अपने काम पर वापस जाने का वक्त आ गया है। मेरा अपना काम मुझे बुला रहा है।
प्रयोग समाप्त हुआ।
इस सितम्बर के साथ ई-कल्पना में नई रचनाओं का प्रकाशन बंद हो जाएगा। लेकिन इन दस वर्षों में यहाँ प्रकाशित रचनाएँ गायब नहीं होंगी। ई-कल्पना का पूरा संग्रह ऑनलाइन उपलब्ध रहेगा। संग्रह का नया पता मिलते ही इस पृष्ठ पर जोड़ दिया जाएगा।
अंत में, धन्यवाद उन लेखकों को जिन्होंने अपनी रचनाएँ ई-कल्पना को सौंपीं। उन पाठकों को जो यहाँ आए, पढ़ा, और फिर लौटकर भी आए। और उन सभी को जिन्होंने इन दस वर्षों में किसी न किसी तरह इस प्रयोग में हिस्सा लिया।
अच्छा हुआ, उसे मैंने खोला था।
अब उस दरवाज़े को बंद करते हैं।
शायद फिर मिलें… कहीं किसी कहानी में।
मुक्ता सिंह-ज़ौक्की और मीरा मालिनी





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